Friday, February 13, 2026
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भक्त की जिम्मेदारी

Amritvani


नरसी भक्त की कृष्ण भक्ति को कौन नहीं जानता। कहा जाता है कि जन्म से गूंगे बहरे नरसी मेहता को वाणी का वरदान प्रभु श्री कृष्ण से ही प्राप्त हुआ। माना जाता है कि नरसी भक्त को भगवान श्री कृष्ण के 52 बार साक्षात दर्शन हुए। एक बार की बात है, नरसी मेहता की जाति के लोगों ने उनसे कहा कि तुम अपने पिता का श्राद्ध करके सबको भोजन कराओ।

इससे तुम्हारे पितृलोक में बैठ पितृ प्रसन्न होंगे और तुम्हे पुण्य मिलेगा। नरसी जी ने भगवान श्री कृष्ण का स्मरण किया और देखते ही देखते सारी व्यवस्था हो गई। श्राद्ध के दिन कुछ घी कम पड़ गया और नरसी जी बर्तन लेकर बाजार से घी लाने के लिए गए।

रास्ते में एक संत मंडली को इन्होंने भगवान श्री कृष्ण का संकीर्तन करते हुए देखा। नरसी जी भी उसमें शामिल हो गए। कीर्तन में यह इतना तल्लीन हो गए कि इन्हें घी ले जाने की सुध ही न रही। घर पर इनकी पत्नी इनकी प्रतीक्षा कर रही थी। पर भक्त को अपने प्रभु का गुणगान करने वालों की संगति में घर का कहां होश रहता? भक्त वत्सल भगवान श्री कृष्ण ने नरसी का वेश बनाया और स्वयं घी लेकर उनके घर पहुंचे। ब्राह्मण भोज का कार्य सुचारू रूप से संपन्न हो गया।

कीर्तन समाप्त होने पर काफी रात्रि बीत चुकी थी। नरसी जी सकुचाते हुए घी लेकर घर पहुंचे और पत्नी से विलम्ब के लिए क्षमा मांगने लगे। इनकी पत्नी ने कहा, ह्यस्वामी! इसमें क्षमा मांगने की कौन-सी बात है? आप ही ने तो घी लाकर ब्राह्मणों को अच्छे से भोजन कराया है। नरसी जी ने कहा, भाग्यवान! तुम धन्य हो, वह मैं नहीं था, भगवान श्री कृष्ण थे। प्रभु भक्ति में सर्वस्व समर्पण करने वाले भक्त की सारी जिम्मेदारी स्वयं प्रभु को उठानी पड़ती है।

प्रस्तुति: राजेंद्र कुमार शर्मा


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