
जगदीप धनखड़ का इस्तीफा एक पहले बन गई है। मिजाज से हटकर उनका इस्तीफा। मीडिया भी इस्तीफे की पहेली को भेदने में नाकामी हासिल की है, राजनीति भी इसके बंद पर्दे को खोलने में नाकाम रही है। इस्तीफा देकर भागना उनका स्वभाव नहीं था। अचानक घटी अदृश्य घटनाएं इस्तीफा का कारण बनी हैं। लेकिन जितना आश्चर्यचकित करना वाला धनखड़ का इस्तीफा है उससे भी बढकर कांगेस और अन्य विपक्षी दलों का उमड़ा धनखड़ प्रेम है। धनखड को हटाने के लिए महाभियोग लाने वाली कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने धनखड के प्रति सहानुभूति जतायी है, उनके इस्तीफे के कारणों को लेकर आशंकाए भी जतायी है, पर्दे के पीछे घटी घटनाओं को जाहिर करने की मांग की है।
जगदीप धनखड के इस्तीफे के दो पक्ष हैं जिनके पास रहस्य-पहली का राज है। पहला पक्ष खुद धनखड़ हैं, जिनके पास वह सच्चाई है, जिसके कारण उन्होंने इस्तीफा दिया या फिर इस्तीफा लिया गया। जबकि दूसरा पक्ष नरेंद्र मोदी की सरकार है। नरेंद्र मोदी का थिंक टैंक ही जानता है कि धनखड़ से इस्तीफा क्यों लिया गया। पर्दे के पीछे का कारण बहुत ही कठिन है, आश्चर्यचकित करने वाले कभी नहीं हैं, क्योकि नरेंद्र मोदी ने अपने ग्यारह साल की सरकार की अवधि में किसी मंत्री को भी इस तरह से इस्तीफा देने के लिए नहीं कहा और न ही इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया।
धनखड को जिन जिम्मेदारियों के लिए कहा गया या सौंपी गई, उन का निर्वाहन में उन्होंने हीलाहवाली नहीं की थी। याद कीजिए उनकी राज्यपाल की जिम्मेदारी को, राज्यपाल की भूमिका को। राज्यपाल के रूप में उनकी जिम्मेदारी और भूमिका कोई असक्रिय नहीं थी, कोई ओझल नहीं थी, कोई रबर स्टाम्प वाली नहीं थी। वे एक सक्रिय और परिणामदायी भूमिका निभायी थी। पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध और अड़चनों और धमकियों की भी परवाह नहीं की थी और अपना कर्तव्य का निर्वहन उन्होंने चाकचौबंद ढंग से किया था। यही कारण था कि ममता बनर्जी ने एक बार नहीं बल्कि बार-बार धनखड की आलोचना की थी और संवैधानिक लक्ष्मण रेखा पार की थी। फिर भी केंद्रीय सरकार के संरक्षक के तौर पर उनकी भूमिका आईकॉन की तरह थी।
नेता और अन्य संस्कृति के लोग न्यायपालिका के खिलाफ बोलने से भागते हैं। लेकिन धनखड ने गजब की निडरता दिखाई और गजब की वीरता दिखाई। न्यायपालिका को आलोचना का वाजिब शिकार बनाया, उनकी तानाशाही को चुनौती दी, उनकी रिश्वतखोरी की मानसिकता को चुनौती दी और आईना भी दिखाया। संसद ही सर्वश्रेष्ठ है। जब संविधान को संसद ने स्वीकृति दी है तो फिर संविधान को बदलने का अधिकार भी संसद को है। धनखड़ तो यही बात कह रहे थे। यशवंत वर्मा के घर पर करोड़ों रुपए पकड़े गए, पुलिस और सुप्रीम कोर्ट की जांच में भी यह सच साबित हुआ, फिर भी यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई, सुप्रीम कोर्ट ने अपने संरक्षण से यशवंत वर्मा का बचाव किया है। संसद में महाभियोग लाना था। महाभियोग की प्रक्रिया चल रही थी। महाभियोग को लेकर धनखड़ की सक्रियता कुछ ज्यादा ही थी। धनखड़ की सक्रियता को कुछ लोग अति मान रहे थे। लेकिन न्यायपालिका की तानाशाही और निरंकुशता के खिलाफ किसी न किसी को आगे आकर बोलने का साहस करना ही पड़ेगा।
मानवीय स्वभाव की समस्या और चुनौतियां कई अहर्ताओं को प्रभावित करती है। अति उत्साह का दांव उल्टा पड़ जाता है, कभी-कभी अति सक्रियता और उत्साह में कई लक्ष्मण रेखांए टूट जाती हैं, उदासीनता की शिकार हो जाती हैं, चुनौती और वर्चस्व स्थापित करने का खेल साबित हो जाती हैं। नरेंद्र मोदी सरकार की न्यायिक चुनौतियां और धनखड़ की अति सक्रियता के बीच टकराव हुआ होगा। न्यायपालिका के सामने नरेंद्र मोदी ने पहले ही हथियार डाल चुके हैं।
न्यायधीशों की नियुक्ति और न्यायालय से जुडे प्रबंधन विधेयक को सुप्रीम कोर्ट ने मनमाने ढंग से खारिज कर दिया था। जबकि संसद के दोनो सदनों ने और कई राज्यों के विधान सभाओं ने उक्त विधेयक को पास किया था।
सुप्रीम कोर्ट सरकार की सभी नीतियों और कार्यक्रमों की समीक्षा करती है, मनमाने फैसले देती है। सुप्रीम कोर्ट से लड़ने की राजनीतिक शक्ति नरेंद्र मोदी के पास नहीं है। गलत और संविधान विरोधी, कानून विरोधी फैसले देने के खिलाफ भी केंद्रीय सरकार कोई कार्रवाई नही कर सकती है। ऐसी मजबूरी में नरेंद्र मोदी न्यायपालिका से लड़ने की जगह समझौतावादी रूख और राजनीति के सहचर बन गए। लेकिन हम धनखड़ की वीरिता, निडरता को अस्वीकार नहीं कर सकते हैं। धनखड़ की वीरता और निडरता हमेशा याद रहेगी।

