Thursday, February 12, 2026
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अमृतवाणी: ध्यान की विधि

सूफी संत बायजीद अपनी कुटिया में ध्यान में लीन थे। इस दौरान कोई उनसे मिलने नहीं आता था। मगर इस बात से अनजान एक अतिथि उनसे ध्यान का तरीका सीखने उनके पास आया और उन्हें पुकारने लगा। उसने बताया कि वह जानना चाहता है कि कैसे ध्यानमग्न हुआ जाए। वह बहुत देर तक दरवाजा खुलने का इंतजार करने लगा। जब बहुत देर तक दरवाजा नहीं खुला, तो वह जोरों से दरवाजा पीटने लगा। उसे लगा शायद अंदर संत न हों। तो उसने जोर से चिल्लाकर पूछा, ‘अंदर कौन है?’ लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ। दरवाजा नहीं ही खुला। वह थक-हारकर वहीं बैठ गया और प्रतीक्षा करने लगा। शाम के वक्त जब बायजीद बाहर निकले तो वह उलाहना देते हुए बोला, ‘मैंने आपको बहुत पुकारा। कई बार आवाजें लगार्इं, पर आपने तो कोई जवाब ही नहीं दिया। कोई आपको इतना पुकारे और आप सुनें भी नहीं, यह तो अच्छी बात नहीं है।’ इस पर बायजीद मुस्कराते हुए बोले, ‘मैं तो कुटिया के भीतर ही था। पर तुम्हारे प्रश्न ‘कौन है’ का जवाब खोजने के लिए मुझे अपने भीतर जाना पड़ा। सो उसी में देर हो गई।’ अतिथि ने कुछ नहीं कहा। तब तक वहां कई लोग जमा हो गए। बायजीद का प्रवचन शुरू हो गया। लेकिन थोड़ी ही देर के बाद जबर्दस्त आंधी-तूफान आया। अफरातफरी मच गई। सब अपनी जान बचाने इधर-उधर दौड़े। वह अतिथि भी भागा। भागते समय उसने देखा कि बायजीद तो वहीं बैठे हैं, भागे ही नहीं। वह बायजीद के पास लौट आया। वह संत के चरण पकड़ कर बोला, ‘इस तूफान में सब भागे पर, आप नहीं। ऐसा क्यों किया आपने?’ संत ने कहा, ‘जब सब बाहर की ओर भागे मैं भीतर चला गया, अपने ही ध्यान में। वहां कोई तूफान नहीं था। वहां परम शांति थी।’ अतिथि ने कहा, ‘मुझे मिल गया ध्यान का तरीका।
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