अपना देश महान है। यहां पर जिस भी राज्य में चुनाव होता है, वहां पर गहमा गहमी ऐसे बढ़ जाती है, जैसे त्योहारी सीजन में ट्रेनों में भीड़-भाड़ बढ़ जाती है। धक्का मुक्की एक दूसरे से लड़ना भिड़ना सब होता रहता है। हर कोई लटक कर भी अपना पहला पड़ाव टिकट तक पहुंचना चाहता है। चाहे चुनाव की सीट हो या ट्रेन की सीट हो दोनों के लिए खूब मारा मारी होती है। लेकिन मिलता उसी को है। जिस पर किस्मत मेहरबान होती है।
मेवा लाल के अंदर भी चुनावी मौसम देखकर चुनावी कीड़ा कुलबुलाने लगा। जैसे खाट में यदि खटमल हो तो मनुष्य को चैन नहीं पड़ता है और वह बेचैन होकर करवटें बदलता रहता है। जैसे नेता के दरवाजे पर ईडी हो तो वह बेचैन होकर पगलाने लगता है। इसी प्रकार की बेचैनी, पागलपन, टिकट पाने के लिए मेवालाल को ही हो रही थी। मेवा लाल के ऊपर जनता का सेवा करने का एकदम से भूत चढ़ गया था। इंसान हो या भगवान जहां भी माथा पटकना पड़े बेचारे पटक रहे थे।
मेवा लाल अपने जुबान में गुड़ की मिठास भर भर के रख लिए थे। जनता के बीच उठने-बैठने का प्रतिदिन नियम बना लिए। दो-चार चमचे पाल लिए। चुनाव जीतने के लिए तो चमचे बहुत जरूरी होते हैं। तो उन्होंने भी चमचों को पाल लिया और अपनी गरदन को हमेशा झुकाने को तैयार रखते हैं। कोई मिला नहीं कि लपक के उसके पांव पकड़ लेते। जिन गंदी बस्तियों के नाम पर उन्हें उबकाई आती थी और उन में वह कार से भी यात्रा करना पसंद नहीं करते थे, उनमें अपनी पैदल यात्राएं रखवाईं। अब इससे ज्यादा वह क्या ही कर सकते थे। उन बस्तियों के लोग तो उन्हें अपने बीच देखकर ही निहाल हो जाते थे।
उन्होंने अपने जाति वालों को यकीन दिलाया था कि उनके जीतते ही बस कुर्सी पर वह बैठेंगे। बाकी आप लोग अपने आप को ही मंत्री समझना। जात बिरादरी के तरफ से भी निश्चित हो गए थे। बस पार्टी की अग्नि परीक्षा बाकी थी। आपने वह गाना तो सुना होगा.. जब तक ना पड़े दिलबर की नजर.. श्रृंगार अधूरा रहता है। और नेता बनने के लिए तो किसी भी पार्टी की बिना नजर के हार, सिंगार, पटार सब कुछ अधूरा ही रहता है।
इतना सब करने के बाद उन्हें पक्का यकीन हो चला था कि मुख्यालय से कैंडिडेट के रूप में उनका ही नाम पार्टी की तरफ से सिलेक्ट किया जाएगा। जहां भी पत्रकार देखते तो लपक कर उनके सामने पार्टी के मुखिया को भगवान समान बताने लगते। उन्होंने अपनी सारी श्रद्धा और निष्ठा पार्टी के लिए समर्पित कर दिया है, यह बताने से वह कहीं भी चूकते नहीं थे। पार्टी के उबाऊ भाषणों को भी वह सुमधुर संगीत जैसा सुनते थे। लेकिन जब पार्टी के तरफ से कैंडिडेट के नाम की घोषणा हुई तो उनके सारे स्वप्न धूल धुसरित हो गए। दूसरे कैंडिडेट ने मेवाराम के सेवा करने के सपने को पार्टी को मेवा खिलाकर अपने नाम कर लिया था। और मेवाराम बातों की जिलेबिया छानते ही रह गए और असली जलेबी कोई और उड़ा कर ले गया। और अब यह गीत गाते हुए घूमते रहते हैं …दिल जबसे टूट गया कैसे कहें कैसे जीते हैं।

