मैं ‘आर्यन’ उर्फ ‘आर्यन ओपी’ को समझा रहा था कि भाई, अपने इस नए स्टार्टअप के ‘लॉन्च इवेंट’ में इतना पैसा मत फूँको। रेंटेड लेम्बोर्गिनी और फाइव स्टार होटल के बुफे से बिजनेस नहीं चलता। पर आर्यन के भीतर का ‘इंटरप्रेन्योर’ जाग गया था। बोला, ‘ब्रो, आप ओल्ड स्कूल बातें कर रहे हो। मार्केट में ‘रिज’ मेंटेन नहीं की, तो इन्वेस्टर भाव नहीं देंगे। रिश्तेदारों और फॉलोअर्स में ‘नाक’ कट जाएगी।’ उसकी नाक काफी ‘लॉन्ग’ थी, वैसे ही जैसे किसी स्कैम का अंत होता है। मेरा ख्याल है, नाक की हिफाजत हमारे यहां ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ से भी ज्यादा की जाती है। और या तो नाक बहुत ‘सेंसिटिव’ होती है या इंटरनेट का ‘कैंसिल कल्चर’ बहुत तेज, जिससे एक ‘मिम’ बनते ही नाक कट जाती है। छोटे ‘क्रिएटर’ की नाक बहुत नाजुक होती है—वह इसे ‘प्राइवेसी सेटिंग’ में छिपाकर क्यों नहीं रखता?
कुछ ‘बड़े इन्फ्लुएंसर’, जिनकी हैसियत ‘ब्लू टिक’ वाली है, वे अपनी नाक पर ‘स्टील की कोटिंग’ करवा लेते हैं। क्रिप्टो स्कैम में जेल हो आए हैं, खुलेआम दूसरे का ‘कंटेंट’ कॉपी करके रील पेल रहे हैं, स्पॉन्सरशिप का पैसा डकार चुके हैं। लोग ‘कीबोर्ड’ लिए उनकी नाक काटने को उत्सुक हैं। मगर काटें कैसे? नाक तो ‘अनकैंसिलेबल’ है! चेहरे पर वैसी ही ‘फिल्टर’ लगाकर फिट है और बायो में ‘अंत्रप्रेन्योर’ लिखकर शोभा बढ़ा रही है।
कुछ और भी ‘प्रो’ लेवल के खिलाड़ी हैं, वे अपनी नाक को ‘क्लाउड स्टोरेज’ में रखते हैं। तुम सारे सोशल मीडिया पर ढूँढो, नाक ही नहीं मिलती। हजारों फॉलोअर्स का पैसा खा चुके हैं, ‘डार्क वेब’ पर पकड़े जा चुके हैं, पर नाक मिलती ही नहीं। वह तो ‘इन्कॉग्निटो मोड’ में है! कोई ‘एथिकल हैकर’ अगर नाक की तलाश भी कर दे तो वर्चुअल नाक काटने से क्या होता है? नाक तो ‘फेस-कैम’ पर कटे, तो कुछ मतलब निकले।
खैर, बात मैं उन ‘आर्यन’ की कर रहा था जो मेरे सामने बैठकर ‘फंडिंग’ आने से पहले ही ‘सक्सेस पार्टी’ का प्लान बना रहे थे। पहले वे ‘मिडिल क्लास’ थे, अब ‘स्ट्रगलिंग फाउंडर’ थे। बिगड़ा हुआ ‘टेक-ब्रो’ और ‘क्रैश’ हुआ सर्वर, दोनों एक जैसे होते हैं—दोनों का कोई भरोसा नहीं कि कब आपको ‘लॉन्ग प्रेस’ करके डिलीट कर दें। आदमी को बिगड़े हुए रईस और ‘बैटरी लो’ वाले स्मार्टफोन, दोनों से दूर रहना चाहिए। मैं तो जरा सा ‘कंटेंट क्रिएटर’ देखते ही ‘एयरप्लेन मोड’ लगा लेता हूँ—बड़े भाई साहब आ रहे हैं, इनका आदर करना चाहिए वरना ‘टैग’ कर देंगे।
तो ये ‘आधुनिक बुजुर्ग’ (उम्र 24 साल) प्रोग्रेसिव थे। एआई और ब्लॉकचेन की बातें कर रहे थे। पर विरोधाभास यह था कि लॉन्च इवेंट ‘रॉयल’ करना चाहते थे। मैंने समझाया, ‘जब जेब में ‘बिटकॉइन’ के नाम पर चवन्नी नहीं है, तो ‘क्रेडिट कार्ड’ स्वाइप करके इवेंट क्यों कर रहे हो? जब इतना नया कदम उठाया है कि ‘स्टार्टअप’ कर रहे हो, तो लॉन्च भी ‘डिजिटल’ तरीके से करो। जूम कॉल पर मीटिंग करो और ‘लिंक्डइन’ पर पोस्ट डाल दो।’

