Saturday, March 21, 2026
- Advertisement -

समय के सवालों से मुठभेड़ करता विमर्श!

 

Ravivani 34


Sudhanshu Gupta 1 2समकाल के नेपथ्य की ध्वनियों को ध्यान से सुनिए। आपको बहुत कुछ सुनाई देगा। अक्सर ये ध्वनियां मुख्य प्रतिध्वनियों में शामिल नहीं होतीं या इन्हें मुख्यधारा में शामिल होने से रोक दिया जाता है। वास्तव में इन ध्वनियों को हाशिये से निकालकर मुख्य ध्वनियों के साथ लाना एक कठिन कार्य है। बेशक कुछ लोग इस कार्य को पूरी प्रतिबद्धता से करते हैं। इन्हीं में एक नाम है डॉ.शोभा जैन का। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सम सामयिक विषयों पर लेख लिखते हुए शोभा जैन यही काम कर रही हैं। जिन विषयों को वह चुनती हैं, वह न केवल जरूरी हैं बल्कि ऐसे विषय भी हैं जिन पर बात किया जाना, जिनपर सवाल पूछा जाना जरूरी है। बेहद गंभीर प्रवृत्ति की शोभा जैन का हाल ही में एक निबंध संग्रह ‘समकाल के नेपथ्य में’(भावना प्रकाशन) पढ़ने का मौका मिला। यह जानकर आश्चर्य हुआ कि शोभा ने मौजूदा समय का शायद ही कोई जरूरी विषय हो जिसे निबंधों में अनदेखा किया हो। इन निबंधों में इतिहास है, लोकतंत्र है, निराला और मुक्तिबोध हैं, अमृता प्रीतम हैं, साहित्य में मॉब लिंचिंग है, अंतिम आदमी का जीवन है, आधुनिकता और परंपरा है, स्त्री के दुख दर्द हैं, प्रेम है, भाषा है, डिजिटल साक्षरता है, हिन्दी का भविष्य है, शिक्षा नीति है, दुनिया की नजर में गांधी को देखना है…और भी बहुत से विषय है।

शोभा जैन का कहना है, म्यूजियम बन जाने की बजाय अपनी जड़ों को संजोता नवोन्मेष जरूरी है। इसलिए ये वैचारिक स्पंदन जितना जंग छुड़ाते हैं, उतने ही समय के अनुकूल जीवन मूल्यों के लिए प्रेरित करते हैं। ये निबंध दरअसल जंग छुडाने का ही काम करते दिखाई देते हैं। प्रो. बी.एल. आच्छा के अनुसार, इन निबंधों में विचारधाराओं के सारे अक्स इन निबंधों में दिखाई देते हैं। चाहे राष्ट्रीय अस्मिता हो, उदारवाद हो, साम्यवाद हो, विस्तारवादी आर्थिक साम्राज्यवादिता के बाजार हों, सैन्यवाद हो या आतंक के गठबंधन। इन सभी के बीच जन-आक्रोश, मानवीय चिंताएं, कमतर संसाधनों वाले वर्ग की चुनौतियाँ शोर मचाती हैं। ये प्रतिध्वनियां व्यक्ति चिंता से विश्व चिंता तक जाती हैं- मनुष्य से मानवीयता तक। शोभा जैन की मूल चिंता खुमार बाराबंकवी के शब्दों में इस प्रकार प्रकट की जा सकती है: सभी कुछ हो रहा है इस तरक्की के जमाने में, मगर ये गजब है आदमी इंसा नहीं होता…। आदमी को इंसा बनाने के लिए शोभा जैन को इतिहास तक जाने में भी कोई गुरेज नहीं है। अपने एक निबंध ‘इतिहास की सिद्धि और भविष्य की ओर’ में वह लिखती हैं-हर युग में इतिहास साक्ष्य बना है, लेकिन इतिहास वही है जो हमको पीछे नहीं, आगे की ओर चलना सिखाए, जो हमको पीछे की ओर बांधे वह इतिहास नहीं है। इतिहास को लिखने का उद्देश्य दूरदर्शिता देना है। यानी इतिहास की सिद्धि उसके भविष्य में उपयोगी हो जाने पर है।

संयोग से यहां मुझे एक छोटा-सा प्रसंग याद आ गया। जर्मन के एक स्कूल में हिटलर के क्रूरतम कारनामों पर बनी एक फिल्म-शिंडलर्स लिस्ट दिखाई जा रही थी। तब स्कूल की अध्यापिका ने बताया कि यह हमारे देश का काला अध्याय है। हम सब जानते हैं कि यह हुआ। लेकिन इसमें हमारा कोई कुसूर नहीं है। न तुम्हारे पिता का न मेरे पिता का। इस पर हमें शर्मिंदा होना चाहिए और हम हैं भी। लेकिन फिल्म को देखते हुए हम किसी अपराधबोध से नहीं गुजरेंगे, बल्कि इस आत्मविश्वास से भरकर फिल्म देखेंगी कि हम उस दौर में नहीं हैं। हम एक नए दौर में हैं जो बहुत आगे निकल आया है। यह इतिहास से भविष्य की ओर देखना है, ना कि यह कि हम अपने इतिहास पर दिन रात विलाप करते रहें।

शोभा जैन अपने निबंध में यही कहना चाहती हैं। इतिहास से आगे बढ़ते हुए शोभा जैन साहित्य पर नजर डालती हैं। उन्हें साहित्य में भी मॉब लिंचिंग दिखाई देती है। अपने निबंध-साहित्य में मॉब लिंचिंग: कद बनाम पद में वह डॉ. रमेश दवे के हवाले से लिखती हैं- आजकल श्रेष्ठ रचनाकार की पुस्तकें छापने के दो ही मापदंड हैं-एक तो वह किसी बड़े पद का हो ताकि किताबों की बिक्री करवा सके या फिर इतना बड़ा कि उसकी मृत्यु के 60 वर्ष बाद कॉपीराइट फ्री हो गया हो। यह कारण है कि अब रचनाकार का कद पाठक, आलोचक, प्राध्यापक आदि नहीं नापते, अब तो प्रकाशक और पुस्तक बाजार नापते हैं। यह बात आज हर व्यक्ति महसूस कर रहा है जो इस लिंचिंग का शिकार है, लेकिन कम लोगों में यह साहस होता है। शोभा जैन में यह साहस दिखाई देता है। ‘हिन्दी साहित्य समाज के हाशिये पर क्यों?’भी शोभा जैन की चिंता का विषय है। वह साहित्य में लेखक और पाठक के बीच पर्याप्त संतुलन देखने की पक्षधर हैं और चाहती हैं कि पुस्तक प्रकाशन की संख्या से साहित्य का आकलन न करके समाज के चिन्तन और कर्म को उसने कितना विकसित किया, इस ओर गंभीरता से पुनरावलोकन किया जाए तो निश्चित रूप से साहित्य उसकी वास्तविक मांग पर खरा उतरेगा। क्योंकि अंतत: ईमानदार पाठक ही लेखक के मांग और पूर्ति के ग्राफ का निर्धारण करता है।

कुछ निबंधों से ऐसा लग सकता है कि शोभा जैन परंपराओं की पैरवी करती हैं, लेकिन यह अर्द्ध सत्य है। अपने एक निबंध ‘आधुनिकता बनाम परंपरा’में लिखती हैं कि आधुनिक ज्ञान के लिए परंपराओं का बोध होना जरूरी है। चीजों और स्थितियों के बदलने के संक्रमण काल के संदर्भ उन्हें यह भी याद आता है कि, जहां न सिर्फ 5000 वर्ष पुरानी सभ्यताएं हैं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक कलात्मकता का उत्कर्ष भी और इसके लिए वे पाश्चत्य संस्कृति के अंधानुकरण को जिम्मेदार ठहराती हैं। वे लिखती हैं-जहाँ तीज त्योहार पर मोहल्ले गली और आसपास के पूरे वातावरण में उल्लास चारों ओर झलक पड़ता था, जहां सांस्कृतिक या पौराणिक रूप से बल्कि कलात्मक या सर्जनात्मक रूप से भी मन की अनुभूतियों को अभिव्यक्त होने का अवसर मिलता था, वह अब लुप्त होता जा रहा है। उनका मानना है कि आधुनिकता के नाम पर यह उत्सवधर्मिता अब सिमटती जा रही है। शोभा जैन अपने निबंधों में विमर्श की एक खिड़की खोलती हैं। आप उनसे असहमत हो सकते हैं (बहुत से विषय ऐसे मिलेंगे), लेकिन वह अपनी कोई भी धारणा आप पर, पाठक पर आरोपित नहीं करती। बल्कि चाहती हैं कि आप इन पर विचार करें और बातचीत का, विमर्श का बंद दरवाजा खुले। कुछ निबंध ऐसे भी हैं जो आपके बहुत से सवालों के जवाब देने के साथ ही बहुत से नये सवाल आपके भीतर पैदा करेंगे और विमर्श का यही तरीका है


janwani address 4

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

Gangaur Vrat 2026: गणगौर पूजा आज, जानें समय, नियम और विधि

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत...

World News: ईरान संकट पर ट्रंप का सियासी संकेत, जंग रोकने के विकल्प पर विचार

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति चुनाव...

Punjab News: अमृतसर वेयरहाउस मैनेजर Suicide Case, मंत्री का इस्तीफा, जांच जारी, सियासत गरम

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: पंजाब वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन के अमृतसर...

Andhra Pradesh News: आंध्र प्रदेश में बस में लगी भीषण आग, विधायक समेत 37 यात्री सुरक्षित

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले...
spot_imgspot_img