Friday, March 13, 2026
- Advertisement -

क्या आपको भी होती है स्लीप साइकल में दिक्कत, पढ़ें यह विशेष…

जनवाणी ब्यूरो |

नमस्कार दैनिक जनवाणी डॉट कॉम वेबसाइट पर हार्दिक स्वागत और ​अभिनंदन है। आज हम बात करने जा रहे है, स्लीप साइकल के बारे में, जिसमें हम आपको बताएंगे की नींन कितने प्रकार की होती है। इसमें क्या होता है। तो चलिए शुरू करते है।

​एक रिसर्च के मुताबिक स्वस्थ व्यक्ति की नींद 7 से 9 घंटे होनी चाहिये लेकिन, बुरे सपनों के कारण अजीबोगरीब व्यवहार से नींद 4-5 घंटे ही रह जाती है। इसकी वजह है स्लीप साइकल में गडबडी।

मेडिकल साइंस के मुताबिक स्लीप साइकल के दो भाग हैं, नॉन रैपिड आई मूवमेंट और रैपिड आई मूवमेंट। नींद का 75% समय नॉन रैपिड आई मूवमेंट फेज में आता है और नींद की शुरूआत भी इसी से होती है। इसमें व्यक्ति सोने के लिये बिस्तर पर लेटता है और धीरे-धीरे आसपास के माहौल से अन्जान होता हुआ सो जाता है।

इस दौरान बॉडी तामपान कम तथा सांस और धड़कन धीमी होकर नेचुरल रिद्म में आती है। इसके बाद शुरू होती है गहरी नींद यानी डीप स्लीप। इसमें सांस धीमी और ब्लड प्रेशर कम होने से मांसपेशियां पूरी तरह रिलेक्स हो जाती हैं। ब्लड फ्लो बढ़ने से ग्रोथ हारमोन रिलीज होता है जिससे शरीर के टिश्यू खुद को रिपेयर करने लगते हैं।

पैरासोमनिया से कुछ लोग नींद में चलते, दांत पीसते, कराहते, बिस्तर गीला करते और कुछ साथ सो रहे व्यक्ति को लात-घूंसे मारते हैं। यह सब होता है स्ट्रेस, एंग्जॉयटी, डिप्रेशन, पीटीएसडी, ड्रग्स लेने, अलग-अलग शिफ्ट्स में काम करने, बहुत कम सोने और पार्किन्सन जैसी न्यूरोलॉजिकल कंडीशन से।

गहरी नींद के 90 मिनट बाद शुरू होता है स्लीप साइकल का दूसरा फेज यानी रैपिड आई मूवमेंट। यह 90 मिनट पर रिपीट होता है। इसमें बंद पलकों के पीछे आंखें तेजी से घूमती हैं और दिमाग जागृत अवस्था की तरह एक्टिव हो जाता है। इस फेज में सांस, हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर, जागने वाले स्तर तक बढ़ता है।

रैपिड आई मूवमेंट के दौरान सबसे ज्यादा सपने आते हैं। ऐसा रात में कई बार हो सकता है। इसमें नींद के बाबजूद दिमाग और शरीर एक्टिव रहता है जिससे एलर्टनेस महसूस होती है लेकिन हाथ-पैर अस्थायी रूप से पैरालाइज हो जाते हैं ताकि सपने शारीरिक रूप से पूरे न हों।

स्ट्रेस, एंग्जॉयटी या डिप्रेशन की वजह से स्लीप साइकल डिस्टर्ब होने से कुछ लोग डरावने सपनों के अलावा बड़बड़ाने, रोने-चिल्लाने या नींद में चलने लगते हैं लेकिन जागने पर उन्हें कुछ याद नहीं रहता। ऐसे में व्यक्ति न खुद आराम से सोता है और न ही पास के लोगों को सोने देता है। जिससे पास सोने वालों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। विशेष रूप से तब, जब उन्हें पता ही न हो कि साथ सो रहा व्यक्ति पैरासोमनिया पीड़ित है।

ज्यादातर बुरे सपने, रैपिड आई मूवमेंट के दौरान आते हैं लेकिन सोते-सोते डर से जागना यानी स्लीप टेरर जैसी घटनायें नॉन रैपिड आई मूवमेंट फेज में होती हैं। स्लीप टेरर में ऐसा महसूस होता है जैसे किसी भयानक परिस्थिति से गुजरे हों। जागने पर रोना-चिल्लाना, धड़कन तेज और पसीना आने लगता है।

कुछ लोगों की त्वचा लाल और चेहरा तमतमा जाता है। लेकिन इसमें कोई डरावना सपना नहीं आता। कुछ लोग सोते समय बड़बड़ाते हैं। कभी-कभी यह बातचीत की पूरी सीरीज होती है। ऐसा स्लीप साइकल के किसी भी फेज में हो सकता है।

पैरासोमनिया से कुछ लोग नींद में चलते, दांत पीसते, कराहते, बिस्तर गीला करते और कुछ साथ सो रहे व्यक्ति को लात-घूंसे मारते हैं। यह सब होता है स्ट्रेस, एंग्जॉयटी, डिप्रेशन, पीटीएसडी, ड्रग्स लेने, अलग-अलग शिफ्ट्स में काम करने, बहुत कम सोने और पार्किन्सन जैसी न्यूरोलॉजिकल कंडीशन से।

पैरासोमनिया का असर बड़ों की तुलना में बच्चों पर ज्यादा होता है। स्ट्रेस तथा कम सोना, बच्चों में इस समस्या को बढ़ाता है। जागने-सोने का क्रम अनिश्चित होने से दिमाग भ्रमित रहता है। वे सोते हुए डरकर रोने लगते हैं। ज्यादातर बच्चों में सुबह कन्फ्यूजन में जागना, जागकर भ्रमित रहना कि कहां हैं, रात को क्या किया-क्या खाया याद न आना, शरीर पर खरोंचें, सोते हुए बार-बार पासे पलटना, दिन में सुस्ती और थकावट जैसे लक्षण उभरते हैं।

अगर बच्चों में ऐसे लक्षण ज्यादा नजर आ रहे हैं तो क्रोध करने के बजाय इस बात पर ध्यान दें कि उनका बिस्तर गीला या गंदा तो नहीं या उन्हें ज्यादा सर्दी-गर्मी तो नहीं लग रही। वैसे अधिकतर बच्चों का पैरासोमनिया, किशोरावस्था में प्रवेश करते ही ठीक हो जाता है।

अब सवाल ये कि डरावने सपनों या नींद में असमान्यव्यवहार का इलाज क्या? तो इससे मुक्ति के लिये सबसे पहले स्लीप साइकल ठीक करने का प्रयास करें। यानी दिन में सोना बंद और रात को समय से सोयें। सुबह स्वाभाविक उठने के टाइम से 15 या 30 मिनट पहले उठें। इससे निश्चित पैटर्न पर चलने की आदतें छूटेंगी। नाइट टेरर और स्लीप वाकिंग से मुक्ति का यह आसान उपाय है।

सोते समय लैपटॉप और सेलफोन जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण दूर रखें और कैफीन युक्त पेय पदार्थों का सेवन न करें। बिस्तर साफ-सुथरा, बेडरूम का माहौल डार्क और हल्का ठंडा रखें। स्ट्रेस कम करने के लिये मेडीटेशन और डीप ब्रीद को लाइफस्टाइल का हिस्सा बनायें।

याद रखें, बुरे सपनों और अच्छी नींद न आने से मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। घरेलू उपचार से फायदा न होने पर साइकियाट्रिस्ट के पास जायें और उसके बताये ट्रीटमेंट प्लान को फॉलो करें। यदि समस्या ड्रग्स से है तो कुछ महीनों के लिये रिहैब में भरती करायें।

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

छोटे बच्चों की करें उचित परवरिश

नीतू गुप्ता साफ-सुथरा, हंसता मुस्कुराता बच्चा सभी को अच्छा लगता...

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

सही कहा है, दूसरों को उपदेश देने वाले एक...

मराठा कूटनीति के चाणक्य नाना फड़नवीस

मराठा साम्राज्य का संदर्भ आते ही आंखों के सम्मुख...

नीतीश कुमार का अंतिम दांव

बिहार की राजनीति में बहुविध हलचल है। मुख्यमंत्री नीतीश...
spot_imgspot_img