
आनंद कुमार अनंत |
प्रत्येक व्यक्ति को तंदुरूस्ती चाहिए। शारीरिक एवं मानसिक तंदुरूस्ती एक ऐसी अद्भुत वस्तु है जिसकी सहायता से मनुष्य जीवन भर सुख, आनन्द और आत्मिक प्रसन्नता की अनुभूति कर सकता है। इन सुखों में बाधक होता है वृद्धावस्था या बुढ़ापा। मूल प्रश्न यह है कि आज मनुष्य उम्र के पूर्व ही वृद्धावस्था को क्यों प्राप्त कर लेता है? मनुष्य में असमय ही बुढ़ापे के लक्षण क्यों घर कर जाते हैं? कारण सीधा और साफ है कि आज का जीवन इतना व्यस्त हो गया है कि लोग अपने शरीर एवं मन को ठीक तरह से संभाल ही नहीं पाते। स?यक् भोजन की उपेक्षा, सम्यक जीवनशैली की उपेक्षा तथा सम्यक श्रम की उपेक्षा के कारणों से ही आज हम समय से पूर्व ही वृद्धत्व को पा लेते हैं।
बुढ़ापे के मुख्य लक्षणों में समय पूर्व बालों का पकना, कान से कम सुनाई देना, चाल डगमगाने लगना, त्वचा पर झुर्रियां पड़ना, शरीर पीड़ाग्रस्त रहना, पाचनतंत्र की गड़बड़ियों का बने रहना, ब्लडप्रेशर का हाई होना, जोड़ों में दर्द की शिकायत का होना, मानसिक स्तर पर निराशा, हताशा, चिड़चिड़ापन, स्मृतिदौर्बल्य, थकान, बेचैनी, चिंता, भय, अनिद्रा आदि रोगों से ग्रस्त रहने लगें तो बुढ़ापे और जवानी में कोई अंतर दिखाई नहीं देता।
असमय बुढ़ापे से बचने के लिए यह आवश्यक है कि बिना भूख के कभी न खाए। जब जोरों की भूख लगे, तब ही खाना स्वास्थ्यप्रद होता है। समय से पूर्व किया हुआ भोजन विजातीय तत्वों के रूप में शरीर को विषाक्त बना डालता है। चबा-चबाकर खाने से आंतों पर व्यर्थ का भार नहीं डलता। चबाकर खाने से वह सुपाच्य बन जाता है, अत: युवावस्था को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि भोजन को चबा-चबाकर खाना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि भोजन करते समय चित्त प्रसन्न हो। चिंतायुक्त चित्त से खाया गया भोजन भी (अमृत होते हुए भी) जहर का रूप ले लेता है। जो चौबीस घंटे चिंता में ही डूबे रहते हैं, उनका भोजन पेट में ठीक से नहीं पचता और वे पेट की अनेक परेशानियों से ग्रस्त हो जाते हैं।
सम्यक श्रम करते रहने से भी असमय बुढ़ापे का आगमन नहीं होता। कसरत या व्यायाम करते रहने से आप थोड़े ही समय में नया जोश, नयी ताकत, तथा नयी शक्ति को पा सकते हैं। इससे आत्मविश्वास की वृद्धि होती है तथा मन शांत होता है। कसरत या व्यायाम करते रहने से स्मरण-शक्ति में वृद्धि होती है, पाचन की शक्ति बढ़ती है तथा हृदय, फेफड़े, जोड़ आदि अधिक कार्यशील होते हैं। कसरत किसी भी उम्र में की जा सकती है।
प्रतिदिन सुबह टहलने की आदत डालें। टहलने से निष्क्रिय पड़े शरीर में नये प्राण का संचार होता है। गर्मी के मौसम में घूमने निकलने से पहले पानी पी लेना स्वास्थ्यवर्द्धक माना जाता है। अगर प्रात: काल टहलने की फुर्सत न मिले तो शाम को ही टहलने का कार्यक्र म बनायें। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि टहलना स्वास्थ्य के लिए संजीवनी के समान ही होता है।
भोजन में अंकुरित अन्न, हरी सब्जियां एवं फलों को भी उचित मात्र में स्थान देना आवश्यक है। आज के समय में फास्ट फूड का प्रचलन बहुत अधिक बढ़ता जा रहा है। फास्ट फूड स्वादिष्ट अवश्य हो सकते हैं किंतु वे स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त ही हानिकारक होते हैं।
जन्म के साथ ही चिंता का भी आगमन हो जाता है। चिंता से चिन्तित होकर चित्त को चंचल बनाना ही वृद्धत्व की रूप-रेखा को तैयार करना होता है। चिन्ता एक संघर्ष है और मानव जीवन की एक परीक्षा भी। चिंतामुक्त होकर अपने उद्देश्य के प्रति लगा रहना ही मानव का सार्थक जीवन है।
उचित आहार, उचित विहार एवं उचित जीवनशैली को अपनाने वाला व्यक्ति शतायु होता है। इतिहास हमें श्रीपाद् सातवलेकर का उदाहरण प्रस्तुत करता है जिनके जीवन में अनेक कठिनतम संघर्ष आए, फिर भी उन्होंने अपनी एक सौ सात वर्ष की आयु को युवावस्था के समान ही व्यतीत किया।


