Tuesday, March 31, 2026
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बच्चों को संस्कारी बनाएं

BALWANI


बच्चे कच्चे घड़े की तरह होते हैं। कच्चे घड़े को पकाने के लिए जिस तरह सावधानी बरतनी पड़ती है, वैसी ही सावधानी बच्चों की परवरिश के मामले में भी रखनी पड़ती है। आजकल पति-पत्नी दोनों ही कामकाजी होते जा रहे हैं। वेतन में वृद्धि होती जा रही है। संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं। रहन सहन का स्तर गिर रहा है। जीवन स्तर भले ऊंचा हो रहा है किंतु मर्यादाओं का उल्लंघन तेजी से जारी है।

अनुशासन और शिष्टाचार के प्रति लोगों का रूझान घट रहा है। संयम और धैर्य तो रहा ही नहीं। सेटेलाइट चैनलों ने बच्चों को कुछ ज्यादा ही उद्दंड बना दिया है। अभिभावकों ने बच्चों की लगभग सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की आदत बना कर उन्हें कुछ ज्यादा ही सिर चढ़ा दिया है। संस्कारों का अभाव हमारी सभ्यता एवं संस्कृति पर कुठाराघात कर रहा है। बच्चे कुछ ज्यादा ही जिद्दी बनते जा रहे हैं। दोस्तों के साथ और उनकी ही मर्जी से जीने का नया अंदाज परिवार में कलह को आमंत्रित कर रहा है।

धीरे-धीरे बच्चों को किसी भी तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होता और वे मुंहजोर बनते जा रहे हैं। इसी दौर में माता पिता की चिंताएं बढ़ने लगती हैं। उन्हें डर सताने लगता है कि कहीं औलाद गलत राह चुन कर भटक न जाए। यहीं संस्कारों का अभाव खटकने लगता है। जरूरत है समय की नजाकत को समझने की। ज्यादा सख्ती यदि उचित नहीं तो ज्यादा ढील भी ठीक नहीं है। दोनों ही स्थितियों में बच्चों का भटकना स्वभाविक है। आइये बच्चे को इस संदर्भ में कुछ चिंतन मनन करें।

सही समय पर सख्ती जरूरी

बच्चों को लाड़ प्यार, दुलार जरूरी है किंतु यह ध्यान में रखते हुए कि कहीं वे उसको गलत समझ कर बिगड़ने की भूल न कर बैठें। बच्चे दुनिया को अपनी नजर से देखते हैं और हम अपनी नजर से । यह जरूर याद रखें कि कभी हम भी बच्चे रह चुके हैं। अत: वक्त से पहले जरूरत से ज्यादा उम्मीद न रखें। अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाएं और बच्चों को उनके कर्तव्यों का निर्वाह याद कराएं। बच्चों को प्यार से उनकी भूल समझाएं तथा ये भी हिदायत दें कि ऐसी गलतियों का आगे कैसा प्रभाव पड़ सकता है। समयानुसार सख्ती बहुत ही जरूरी है।

आत्मनिर्भर बनाएं

बचपन से ही बच्चों को अपना कार्य स्वयं करने की आदत डालना सिखाएं। उनका मार्गदर्शन करें किंतु हर कार्य स्वयं न करते हुए उन्हीं से करने को कहें। कभी कभी मां ही बच्चों को आलसी बनाती है। प्रारंभ में जैसी आदत डालेंगे, बच्चे उसी के आदी बनेंगे। पाबंदियां भी एक दायरे तक ही ठीक लगती हैं। बेहतर होगा कि बच्चों को आत्मनिर्भरता की प्रेरणा प्रदान करें और आत्मनिर्भर होने को प्रेरित करें याद रहे कि छह से बारह वर्ष की उम्र में मां ही बच्चे की प्रथम गुरू होती है।

नियमों को समझाएं, लादें नहीं

नियमों का निर्माण बगैर किसी उद्देश्य के कभी नहीं किया जाता है। बच्चों को भी सहज ढंग से नियम समझाएं। खिलौनों को बाक्स में कैसे रखा जाए, बाजार में या दुकानों में खरीदारी के दौरान कैसे रहा जाए। सत्संग में शोर न मचाने की बात घर पर ही समझाएं ताकि बच्चे सत्संग से लाभान्वित हो सकें। दूसरों के घर जाने पर किस तरह से उठें बैठें, रहें, यह शिक्षा भी बच्चे मां से ही पाते हैं।

अपनी बातें स्पष्ट अंदाज में कहें

बच्चे से कोई भी बात करते समय लहजा ध्यान रखें क्योंकि बच्चे आप से ही बहुत कुछ ग्रहण करते हैं। नाराजगी भरे स्वर में हर पल कहना उचित नहीं कहा जाएगा। बच्चों को यह यकीन कराएं कि आप उनकी परवाह करते हैं और वे सभी फैसले उनके भले के लिए ही लिए गए हैं। साफ-सुथरी एवं स्पष्ट बातें करना बच्चे में विश्वास बढ़ाता है और वे गलतफहमी का शिकार होने से बचते हैं।

नियम तोड़ना क्यों गलत है, उन्हें अहसास कराएं

उदाहरणों के द्वारा बच्चे को यह समझाएं कि नियमों का पालन करना कितना हितकारी है जबकि नियमों को तोड?ा कितना गलत है। नियमों को सम्मान देने की आदत बहुत फायदेमंद होती है। स्कूल जाने से पूर्व और स्कूल से घर आने के बाद कौन कौन सी बातों को गंभीरता से लेना जरूरी है, यह बात बच्चे को ठीक ढंग से समझाना चाहिए।

सच बोलने की आदत डालें

सच से नाता तोड़ने की शिक्षा भी बच्चे मां-बाप से ही प्राप्त करते हैं। मां-बाप ही बच्चों को झूठ बोलना सिखाते हैं और जब बच्चे झूठ बोलने की आदत डाल लेते हैं तब मां-बाप उन्हें ही डांटते फटकारते हैं। अच्छा होगा यदि बच्चे के सच कहने की आदत का सम्मान करना सीखें ताकि उसे सच बोलने की प्रेरणा मिलती रहे।                                                                                                                                                                                                                                                                            राजेंद्र मिश्र राज


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