- बीएसए कार्यालय से आठ र्क्लकों को भेजा गया खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय
- शासनादेश की उड़ाई धज्जियां, सीनियरटी के आधार पर भेजा जाना था र्क्लकों को
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: बीएसए कार्यालय में पिछले काफी समय से जमे र्क्लकों में से आठ को बीआरसी में भेज दिया गया। एक साल पहले आए शासनादेश का पालन तो हुआ, लेकिन इसमें भी खेल कर दिया गया। जिन र्क्लकों को वरिष्ठता के आधार पर भेजा जाना था उनकी जगह दूसरे र्क्लकों को भेज दिया गया। इस मामले को लेकर बीएसए मेरठ योगेन्द्र कुमार से बात करने की कोशिश की गई तो उनका फोन रिसीव नहीं हुआ।
इन र्क्लकों को भेजा खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय
वरिष्ठ लिपिक प्रमोद हरित को बीआरसी रजपुरा, वरिष्ठ लिपिक धर्मेंद्र कुमार को तीन बीआरसी दौराला, सरधना व सरूरपुर, वरिष्ठ लिपिक अमित भारद्वाज को खरखौदा, वरिष्ठ लिपिक श्रवण कुमार को नगर क्षेत्र मेरठ के साथ रोहटा, परीक्षितगढ़ व हस्तिनापुर, वरिष्ठ लिपिक संदीप जैन को मेरठ ग्रामीण, वरिष्ठ लिपिक अजय शर्मा को मवाना, कनिष्ठ लिपिक अंकित अग्रवाल को जानी व कनिष्ठ लिपिक सोनू कुमार को बीआरसी माछरा भेजा गया है। इन सभी लिपिकों को सप्ताह में एक दिन शनिवार को बीएसए कार्यालय में आकर अपने कार्य का ब्योरा देना होगा।
4 जुलाई 2021 को हुए थे आदेश
परिषद सचिव प्रताप सिंह बघेल ने प्रदेश के सभी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों को आदेश जारी किए थे वरिष्ठता के आधार पर पहले आनें वाले लिपिको विकास खंड कार्यालय पर दो परिषदीय लिपिकों की व्यवस्था की जाए। साथ ही आदेश के बाद क्या कार्रवाई हुई उसका प्रमाणपत्र तत्काल परिषद कार्यालय को भेजा जाए।

लेकिन अब एक साल के बाद भी मठाधीश र्क्लक ने अपने चहेते र्क्लकों को कार्यालय में रोकते हुए आठ कनिष्ठ लिपिकों को विकासखंड पर भेजने का काम किया है।
आदेश के अनुसार यह लिपिक जाने थे विकासखंडों में
केशव राम, भारत भूषण, प्रदीप कुमार, नीरज शर्मा, मजाहिर हुसैन, पुष्पा देवी, सनब व पुलकित अग्रवाल। इन आठ लिपिकों को बीआरसी में भेजा जाना था लेकिन किस वजह से इनको रोका गया यह बड़ा सवाल है।
मार्च 1997 में सचिव बेसिक शिक्षा के आदेश को 25 सालों से नहीं माना
12 मार्च 1997 में सचिव बेसिक शिक्षा अधिकारी पवनेश कुमार ने एक आदेश जारी किया था जिसमे कहा गया था कि भविष्य में परिषदीय कार्यालय में जो भी नियुक्ति या चतुर्थ श्रेणी से कनिष्ठ लिपिक के पद पर पदोन्नति होगी वह विकासखंड पर होगी। लेकिन पिछले 25 सालों से मेरठ में इसका पालन नहीं किया गया।

