
बीते दिनों दिल्ली नगर निगम के चुनाव होने थे जिसके लिए सभी प्रत्याशियों की सूची तैयार हो गई थी व अन्य बाकी भी तैयारियां जोरों-शोरों पर हो गई थीं, लेकिन एन मौके पर चुनाव आयोग ने तीनों निगमों को पुन: एक करने की बाद कहकर चुनाव टाल दिए। इस मामले पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा, पिछले आठ साल से केंद्र में बीजेपी की सरकार है और यदि केंद्र सरकार को तीनों एमसीडी का एकीकरण करना था तो अभी तक क्यों नहीं किया। चुनाव की तारीख घोषित करने से एक घंटे पहले अचानक अब तीनों एमसीडी को एक करने की बात क्यों कही,स्पष्ट है कि चुनाव टाल दिए जाएं। तीनों एमसीडी को एक करना तो एक बहाना है, असली मकसद तो चुनाव टालना है। आम आदमी पार्टी का कहना है कि हमारी लहर को देखते हुए बीजेपी को अपनी हार का डर सता रहा था और इसके चलते चुनाव टाल दिए गए। इस घटनाक्रम पर चुनाव आयोग ने कहा है कि दिल्ली नगर निगम के चुनाव तय समय पर होने हैं या नहीं, यह अब तक तय नहीं किया गया है। इसके लिए 18 अप्रैल तक इंतजार करना होगा। अगर उससे पहले तीनों निगमों को एक करने पर फैसला नहीं लिया जाता है तो चुनाव तय समय पर कराए जाएंगे। दिल्ली में 22 मई तक निगम चुनाव पूरे कराए जाने हैं। इसके लिए अभी अंतिम फैसला लिया जाना बाकी है। इसके अलावा बीजेपी ने कहा है कि केजरीवाल को इतनी जल्दी इसलिए है उन्होंने जिन प्रत्याशियों को टिकट बेचा है वे केजरीवाल की जान को आफत कर रहे हैं।
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बहरहाल, यह तो राजनीति के बाण हैं, जो चलते ही रहते हैं लेकिन यदि इस प्रकरण को गंभीरता से समझा जाए तो यहां चुनाव आयोग घेरे में आ रहा है। चूंकि जिस काम को करने के लिए केंद्र सरकार के पास अच्छा खासा समय था तो वह ठीक चुनाव के समय ही यह बात क्यों सामने आई? इस प्रकरण को लेकर आयोग व एजेंसी पर सरकार को तोता होने का आरोप लगाया जा रहा है। इस शब्द का निर्माण 2013 में कांग्रेस के कालखंड में पड़ा था। ज्ञात हो कि कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला मामले में सीबीआई जांच की प्रगति रिपोर्ट में सरकार के हस्तक्षेप पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और जांच एजेंसी दोनों को कड़ी फटकार लगाई थी और इस मामले में सरकार को कहा था कि किसी एजेंसी को अपने तरीके से संचालित न करें।
स्पष्ट है कि यदि देश को संचालित करने वाली ऐसी एजेंसी व आयोग भी इस तरह का काम करेंगी या शक के घेरे में आएंगी तो यह लोकतंत्र के लिए एक बहुत बड़ा खतरा माना जाएगा। यदि हमारे देश के चुनाव आयोग की बात करें तो वह समय के अपडेट व अपग्रेड नहीं माना जा रहा। हम आज भी एक साथ पूरे देश में चुनाव कराने असफल हैं, देश तो छोड़िए एक राज्य में एक साथ चुनाव कराने में चुनाव आयोग के हाथ-पांव फूल जाते हैं। सरकार के अनुसार हमें ‘मेक इन इंडिया’ व ‘डिजिटल इंडिया’ में प्रवेश किए हुए लगभग आठ वर्ष हो चुके हैं, लेकिन उस हिसाब से संचालन प्रक्रिया की उन्नति व धरातल पर सच्चाई शून्य सी लगती है। मोदी सरकार में भारत की तस्वीर बदलने की हुंकार जितनी जोरो-शोरों पर सुनाई दी थी, वह उतनी ही जल्दी हल्की पड़ती नजर आई। लगातार चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल खड़े होना यह भविष्य की राजनीति के लिए एक बडा और बेकाबू होने वाला खतरा बन सकता है। सरकार चाहे किसी की भी हो, हर किसी को अपनी ताकत दुरुप्रयोग करने की चाह हमें कमजोर बनाती है। सरकारों के पास सिस्टम की पारदर्शिता के नाम पर सिर्फ बातें हैं, लेकिन उसको साबित करने के लिए कुछ नहीं, क्योंकि तंत्र में घुसने और सच जानने की अनुमति किसी को नही दी जाती।
दरअसल सरकारों को यह लगता है कि विशेषज्ञ व जनता खेल को समझ नहीं पा रही, लेकिन यह मात्र उनकी भूल है। अब हर कोई गणात्मक प्रणाली के आधार पर बातों को समझता है। सरकार कुछ भी करे या कहे, उसको सामने वाला क्यों माने, यह बात सरकार को समझने में कहां समस्या आ रही है? एक आम हिंदुस्तानी आज भी इस तर्ज पर अपने आप को सुरक्षित समझता है कि उसे कहीं इंसाफ नही मिलेगा तो कोर्ट से मिलेगा और लगभग मिलता भी है, लेकिन कुछ लोग इस मिसाल को आर्थिक व शक्ति प्रकरण से भेदना चाहते हैं। कहते हैं कि राजनीति की कोई जात व रंग नही होता, जहां जिस पार्टी व नेता को फायदा नजर आता है, वो वहां वैसा ही चोला ओढ़ कर अपनी रोटी सेंकने लगता है। इस बात को इस कहावत के आधार पर समझिए ‘जहां देखी तवा परात वहीं बिताई सारी रात’। लेकिन अब इन चीजों को बदलना होगा क्योंकि कहानी दुनिया के सबसे बड़े देश की है। हमारे यहां की प्रतिभाओं को दुनिया ने जाना है। जिस रफ्तार से हम परिवर्तन की ओर बढ़ रहे हैं, वह सरकारों के कुछ कृत्य से बिगड़ न जाए। यदि सभी पार्टियों ने ऐसा करना सीख लिया तो लोकतंत्र की धज्जियां उड़ जाएंगी। अब राजनीतिक पार्टियां समन्वय व संधि के आधार पर नही चलती। अपने आप सबसे सर्वश्रेष्ठ बनाने व दिखाने के लिए कोई किसी भी हद तक जाता है।
हम बीते समय से ईवीएम में गड़बड़ी की बात सुनते आ रहे हैं। हालांकि प्रमाणिकता के नाम पर कुछ भी हत्थे नहीं लगा, लेकिन यहां एक बात यह समझने की है कि जो देश युवाओं का है, कहीं वह लोकतंत्र के प्रति बागी न हो जाए और यदि युवाओं ने ऐसी चीजों को देखते हुए चुनावों में रुचि लेना बंद कर कर दिया तो स्थिति अच्छी नहीं होगी। हमारा देश सबसे अधिक युवा वर्ग का देश है। वर्ल्डोमीटर्स के मुताबिक, इस समय दुनिया की कुल जनसंख्या सात अरब 87 करोड़ है। इस आबादी में युवाओं की जनसंख्या करीब सौलह प्रतिशत है। दुनिया के 57 फीसदी युवा मात्र दस देशों में रहते हैं और इन सभी में भारत प्रथम स्थान पर आता है। हमारा देश युवा शक्ति के मामले में दुनिया का सबसे लीड करने वाला देश है और कुल आबादी का 18 फीसदी युवा हैं। बीते वर्षों में युवाओं के मामले में हमने चीन को भी पछाड़ दिया जिसका हम बेहतर तरीके से फायदा उठा सकते हैं। बनते-बिगड़ते हाल की तस्वीर के सबसे बड़ा गवाह भारत है। लगातार राजनीति में ऐसी बातों का होना कुशलता को व्यर्थ करता है। इसलिए देश को संचालित करने वालों को यह बात समझनी होगी कि तंत्र प्रणाली के साथ छेड़छाड़ न करें। खेल बिगड़ गया तो संभाले नही संभलेगा। सरकारें तो बदलती रहेंगी, लेकिन नियम-कानून व लोकतंत्र वहीं रहता है।


