Friday, March 13, 2026
- Advertisement -

क्रोध की दासता

Amritvani 21


विश्व विजेता बनने का सपना देखने वाले सम्राट सिकंदर को भारत आकर अपना विश्व विजय अभियान स्थगित कर वापिस जाना पड़ा, पर जाने से पहले वह किसी ज्ञानी व्यक्ति को अपने साथ ले जाना चाहता था। स्थानीय लोगों से पूछने पर उसे एक पहुंचे हुए बाबा के बारे में पता चला जो कुछ दूरी पर स्थित एक नगर में रहते थे। सिकंदर दल-बल के साथ वहां पहुंचा। बाबा एक पेड़ के नीचे ध्यान लगा कर बैठे थे। सिकंदर उनके ध्यान से बाहर आने का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद बाबा ध्यान से बाहर निकले और उनके आंखें खोलते ही सिकंदर उनके सामने आया और बोला, मैं आपको अपने देश ले जाना चाहता हूं। बाबा बोले, मैं तो यहीं ठीक हूं, मैं यहां से कहीं नहीं जाना चाहता, मैं जो चाहता हूं सब यहीं उपलब्ध है। सिकंदर ने बाबा से कहा, मैं ना सुनने का आदि नहीं हूं, आपको मेरे साथ चलना ही होगा। बाबा बिना घबराये बोले, यह मेरा जीवन है और मैं ही इसका फैसला कर सकता हूं कि मुझे कहां जाना है और कहां नहीं! यह सुन सिकंदर गुस्से से लाल हो गया उसने फौरन अपनी तलवार निकाली और बाबा के गले से सटा दी, अब क्या बोलते हो? अगर तुम मुझे मारना चाहते हो तो मार दो, पर आज के बाद से कभी अपने नाम के साथ महान शब्द का प्रयोग मत करना। तुम तो मेरे दास के भी दास हो। तुम्हारा मतलब क्या है? सिकंदर क्रोधित होते हुए बोला। बाबा बोले, क्रोध मेरा गुलाम है। मैं जब तक नहीं चाहता मुझे क्रोध नहीं आता, लेकिन तुम अपने क्रोध के गुलाम हो। तुमने बहुत से योद्धाओं को पराजित किया पर अपने क्रोध से नहीं जीत पाए। वो जब चाहता है तुम्हारे ऊपर सवार हो जाता है, तो बताओ हुए ना तुम मेरे गुलाम के गुलाम। सिकंदर ,बाबा की बातें सुनकर स्तब्ध रह गया। वह उनके सामने नतमस्तक हो गया।
प्रस्तुति : राजेंद्र कुमार शर्मा


janwani address 7

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

भंडारित अनाज को सुरक्षित करना जरूरी

देश के कुल उत्पादन का लगभग 7 प्रतिशत अनाज...

जमाने के हमकदम होने की राह

चतुर सुजान ने जमाना देखा है। उनके सर के...

सरेंडर की मांग से भड़का संघर्ष

मध्य पूर्व अचानक संघर्ष की भयंकर आग में झुलस...

सोशल मीडिया पर तैरती फूहड़ता

डिजिटल युग ने हमारे समाज की संरचना, सोच और...
spot_imgspot_img