Wednesday, March 25, 2026
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विश्वास निजी सत्ता नहीं

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ईश्वर है या नहीं-यह प्रश्न सदियों से मनुष्य के साथ चला आ रहा है। पर सच कहें तो यह प्रश्न जितना पुराना है, उतना ही थका हुआ भी। क्योंकि इस बहस से न तो भूख मिटती है, न बीमारी जाती है, न अन्याय रुकता है। इसलिए आज के समय में ज्यादा जरूरी प्रश्न यह नहीं है कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं, बल्कि यह है कि कुछ लोग किस आधार पर स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित कर लेते हैं, और समाज उस दावे को बिना सवाल किए क्यों स्वीकार कर लेता है। मनुष्य की जिज्ञासा स्वाभाविक है। वह आकाश देखता है, मृत्यु से डरता है, पीड़ा से अर्थ खोजता है। इन सबके बीच आस्था जन्म लेती है। आस्था अपने आप में न तो समस्या है, न समाधान। समस्या तब शुरू होती है जब आस्था को किसी संस्था, समूह या व्यक्ति द्वारा नियंत्रित किया जाने लगता है। जब कोई कहता है कि ईश्वर तक पहुंच का रास्ता सिर्फ उसी के पास है, तभी आस्था निजी अनुभव से निकल कर सत्ता का औजार बन जाती है।

इतिहास गवाह है कि जैसे-जैसे समाज में श्रम का बंटवारा बढ़ा, वैसे-वैसे विचारों का भी बंटवारा हुआ। कुछ लोग उत्पादन में लगे, कुछ लोग व्यवस्था चलाने में, और कुछ लोग अर्थ गढ़ने में। यहीं से ऐसे वर्ग उभरे जो अदृश्य शक्तियों की व्याख्या करने लगे। उन्होंने भय, आशा और अपराधबोध को एक सूत्र में पिरोकर ऐसे नियम बनाए जो आम लोगों के जीवन को नियंत्रित करने लगे। धीरे-धीरे यह नियंत्रण इतना स्वाभाविक बना दिया गया कि उस पर सवाल उठाना ही पाप मान लिया गया। वैज्ञानिक दृष्टि हमें बताती है कि मनुष्य का मस्तिष्क पैटर्न खोजने वाली मशीन है। वह अनिश्चितता से डरता है और कारण चाहता है। जब कारण समझ में नहीं आते, तो कल्पनाएं जन्म लेती हैं। यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि जैविक तथ्य है। समस्या तब आती है जब इन कल्पनाओं को स्थायी सत्य घोषित कर दिया जाता है, और उनसे सामाजिक नियम बनाए जाते हैं। विज्ञान जहां प्रश्न पूछने को प्रेरित करता है, वहीं आस्था आधारित सत्ता प्रश्न को अपराध बना देती है।

हर विचार अपने समय और परिस्थितियों की उपज होता है। जिन समाजों में संसाधनों की कमी रही, वहां परलोक का विचार ज्यादा मजबूत हुआ। जिन समाजों में शोषण गहरा था, वहां सहनशीलता को पुण्य बना दिया गया। यह सब संयोग नहीं है। विचार हमेशा भौतिक स्थितियों से जन्म लेते हैं। इसलिए जब कोई समूह यह दावा करता है कि उसके पास शाश्वत सत्य है, तो पहला सवाल यही होना चाहिए कि उस सत्य से लाभ किसे हो रहा है। यहां यह समझना जरूरी है कि सवाल किसी व्यक्ति की आस्था पर नहीं, बल्कि उस आस्था की राजनीति पर है। कोई व्यक्ति अगर किसी अदृश्य शक्ति में विश्वास करता है, तो वह उसका निजी मामला है। लेकिन जब वही विश्वास दूसरों पर थोपा जाता है, कानून, नैतिकता और सामाजिक दर्जे का आधार बनता है, तब वह सार्वजनिक मुद्दा बन जाता है।

तब यह पूछना जरूरी हो जाता है कि इस व्यवस्था की वैधता क्या है। मनुष्य के निजी जीवन में कई ऐसे क्षेत्र होते हैं जिन पर सवाल करना असभ्य माना जाता है। इसका कारण यह है कि सभ्यता ने कुछ सीमाएं तय की हैं। ये सीमाएं इसलिए हैं ताकि व्यक्ति की गरिमा बनी रहे। आस्था भी अगर निजी क्षेत्र में रहे, तो वह इसी गरिमा का हिस्सा है। लेकिन जब कोई आस्था के नाम पर दूसरों की जिज्ञासा, जीवन-शैली या विचारों की जांच करने लगे, तो वही आस्था अपनी नैतिक जमीन खो देती है।

नियंत्रण की इच्छा अक्सर असुरक्षा से जन्म लेती है। जो खुद को अस्थिर महसूस करता है, वह दूसरों के जीवन पर नियम थोप कर स्थिरता खोजता है। धार्मिक ठेकेदारी इसी मानसिकता का सामूहिक रूप है। इसमें व्यक्ति नहीं, समूह बोलता है। सवाल करने वाले को अकेला किया जाता है, और आज्ञाकारी को पुरस्कार मिलता है। धीरे-धीरे समाज में सोचने की जगह मानने की आदत विकसित हो जाती है। सत्य कोई तैयार वस्तु नहीं है जिसे किसी ने खोज कर तिजोरी में बंद कर दिया हो। सत्य तो एक प्रक्रिया है, जो अनुभव, संवाद और आलोचना से आगे बढ़ती है।

जब किसी विचार को आलोचना से ऊपर रख दिया जाता है, तो वह सत्य नहीं रह जाता, वह केवल सत्ता का उपकरण बन जाता है। इसलिए असली नैतिकता यह नहीं कि हम क्या मानते हैं, बल्कि यह है कि हम दूसरों को सोचने की कितनी स्वतंत्रता देते हैं। ब्रह्मांड किसी नैतिक एजेंडा के साथ नहीं चलता। प्रकृति न किसी को दंड देती है, न इनाम। कारण और परिणाम का एक निरंतर क्रम है। जब समाज इस तथ्य को समझने लगता है, तो जिम्मेदारी भी ऊपर नहीं, अपने भीतर खोजने लगता है।

तब अन्याय के लिए किसी दैवी योजना को दोष नहीं दिया जाता, बल्कि मानवीय व्यवस्थाओं को बदला जाता है। यही बिंदु सबसे ज्यादा असुविधाजनक है उन लोगों के लिए जो आस्था के सहारे सत्ता चलाते हैं। क्योंकि जैसे ही जिम्मेदारी मनुष्य के हाथ में आती है, वैसे ही सवाल भी आते हैं। सवाल संसाधनों के बंटवारे पर, शिक्षा पर, स्वास्थ्य पर, सम्मान पर। तब यह कहना आसान नहीं रह जाता कि सब कुछ किसी अदृश्य इच्छा का परिणाम है। तब साफ दिखता है कि बहुत कुछ मनुष्यों ने बनाया है, और मनुष्य ही बदल सकते हैं।

इसलिए आज की बहस का केंद्र यह होना चाहिए कि विचारों का ठेका किसे और क्यों दिया गया। कौन तय करता है कि सही आचरण क्या है, और गलत क्या। क्या यह तय करने का अधिकार जन्म से मिलता है, किताब से, या सत्ता से। और सबसे जरूरी, क्या किसी भी विचार को इस तरह स्थापित किया जा सकता है कि उस पर सवाल करना ही अपराध बन जाए। परिपक्व समाज वह नहीं होता जहां सब एक जैसा सोचते हों, बल्कि वह होता है जहां अलग-अलग सोचने के लिए स्पेस बचा हो। जहां आस्था हो सकती है, लेकिन उसका उपयोग डराने या दबाने के लिए न किया जाए। जहां प्रश्न पूछना असम्मान नहीं, बल्कि बौद्धिक ईमानदारी मानी जाए।

अंत में बात इतनी सी है। ईश्वर पर विश्वास या अविश्वास से ज्यादा महत्वपूर्ण है मनुष्य पर विश्वास। उसकी समझ पर, उसकी करुणा पर, और उसकी बदलने की क्षमता पर। जब तक हम यह तय करने का अधिकार किसी और को देते रहेंगे कि हमें क्या सोचना चाहिए, तब तक हम अपनी ही बनाई जंजीरों को पूजते रहेंगे। असली मुक्ति आसमान से नहीं, बल्कि उस साहस से आती है जो सवाल पूछने की इजाजत खुद को देता है।

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