जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) में बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा है, यह स्पष्ट करते हुए कि प्रक्रिया में देरी का मुख्य कारण अत्यधिक मुकदमेबाजी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में कहा कि प्रस्तावित संशोधनों में इस दुरुपयोग को रोकने के लिए दंडात्मक प्रावधान शामिल किए जाएंगे।
इन्सॉल्वेंसी आवेदन की समय सीमा
वित्त मंत्री ने बताया कि नए बिल के तहत, किसी कंपनी में डिफॉल्ट होने के बाद इन्सॉल्वेंसी आवेदन को अनिवार्य रूप से 14 दिनों के भीतर स्वीकार करना होगा। इससे मामलों का निपटान तेजी से होगा और लंबित मामलों का बोझ कम होगा।
आईबीसी प्रक्रिया में श्रमिकों का संरक्षण
सीतारमण ने कहा कि आईबीसी प्रक्रिया श्रमिकों के हित सुरक्षित रखती है और उनके बकाया भुगतान को प्राथमिकता दी जाती है। प्रस्तावित संशोधन इस सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करेंगे।
12 संशोधन का प्रस्ताव
लोकसभा में पेश किए गए प्रस्ताव के अनुसार, आईबीसी में कुल 12 संशोधन किए जाएंगे। इनमें ग्रुप इन्सॉल्वेंसी और क्रॉस-बॉर्डर इन्सॉल्वेंसी के लिए सक्षम प्रावधान शामिल हैं, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मामलों में भी स्पष्टता आएगी।
आईबीसी का उद्देश्य
वित्त मंत्री ने कहा कि आईबीसी का उद्देश्य बैंकिंग सेक्टर की सेहत सुधारना है, न कि सिर्फ कर्ज वसूलना। इससे कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग में सुधार हुआ है और बैंकों ने समाधान प्रक्रिया के माध्यम से आधे से अधिक एनपीए वसूल कर लिए हैं।
सरकार ने 12 अगस्त 2025 को लोकसभा में आईबीसी में संशोधन के लिए विधेयक पेश किया, जिसमें दिवालियापन समाधान आवेदनों की स्वीकृति में समय कम करने के प्रावधान शामिल थे। इसे लोकसभा की चयन समिति को भेजा गया, जिसने दिसंबर 2025 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। अब तक आईबीसी में सात बार संशोधन हो चुका है।

