Monday, April 6, 2026
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पहले पीएसी ने गोलियां चलाई फिर दंगाइयों ने

  • गोली के कारण किडनी खो चुके वकील अहमद ने बयां किया दर्द

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: उम्मीद से अलग फैसला है। क्या कर सकते हैं। जब अपने लोगों ने ही केस को मजबूती से नहीं लड़ा फिर किस पर दोष दूं। मलियाना दंगे में दो गोली लगने से बुरी तरह से घायल होने से एक किडनी खोने वाले वकील अहमद का कहना है कि पहले पीएसी ने गोलियां चलाई फिर दंगाइयों ने गोली चलाई। अगर हम कमी गिनाने लगेंगे तो कुछ लोगों को परेशानी होने लगेगी।

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पीड़ित वकील अहमद ने बताया कि न्याय में चूक हुई है। हम लोग ठीक ढंग से केस को लड़ नहीं पाए। पुलिस का दोष भी ज्यादा है। पुलिस ने कोर्ट में गवाही नहीं कराई। सबसे पहले पीएसी ने गोलियां चलाई, उस वक्त हिन्दू पक्ष खामोश खड़ा हुआ था। बाद में वो लोग भी दंगे में शामिल हो गए। कोर्ट में 35 पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज था कि पीएसी की गोली या किस किस हथियार से लोग मरे।

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मुदस्सिर, नसीर अहमद, गुलफाम और मुन्ना के सिर और गर्दन में गोलियां मारी गई ताकि मर जाए। वकील अहमद ने बताया कि वो जीने पर खड़ा था तभी गोली आई और पीठ पर लगी, दूसरी गोली हाथ पर लगी। जब गिर गया और हाथ पीछे लगाया तो हाथ अंदर घुस गया। चारों तरफ खून ही खून बिखर गया। खुद आंखों से देखा था गोलियों के शिकार लोगों को सड़कों पर गिरते हुए। एक महिला समंथरा के साथ बहुत बुरा किया था दंगाइयों ने।

36 पोस्टमार्टम रिपोर्ट, 35 इंजरी रिपोर्ट की अनदेखी

23 मई 1987 को मलियाना में हुए भीषण को लेकर याकूब की तरफ से केस लड़ रहे वरिष्ठ वकील एडवोकेट अलाउद्दीन सिद्दकी का कहना है कि अदालत के आदेश में कहा गया है पर्याप्त साक्ष्य न होने की वजह से 39 आरोपियों को बरी किया जा रहा है। वकील का दावा है कि अदालत में जो फाइल चल रही थी उसमें 36 लोगों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट, 35 लोगों की इंजरी रिपोर्ट के अलावा तमाम लोगों के बयान थे, इसके बाद भी पर्याप्त सबूत की बात कहना समझ के परे है।

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वरिष्ठ वकील अलाउद्दीन सिद्दकी ने बताया कि सवाल यह यठ रहा है कि अदालत ने 35 पोस्टमार्टम रिपोर्ट को संज्ञान में क्यों नहीं लिया। क्या मरने वाले आपस में लड़कर मरे थे। हर रिपोर्ट में दंगाइयों की दरिंदगी बयान हो रही थी। याकूब की रिपोर्ट तक गायब हो गई। 36 साल तक अदालत में लड़ाई लड़ी जाती रही। मलियाना में दंगे में मारे गए लोगों ने सर्वाधिक संख्या मजदूरों की थी। वैसे तो इनसे केस के लिये पैसे नहीं लिये गए, लेकिन गरीबी के कारण मृतकों के परिजन अदालतों में पैरवी के लिये नहीं गए। न तो सरकार और न अन्य संगठनों की तरफ से कोई आर्थिक मदद की गई।

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