रामविलास जांगिड़
थूकना अब केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं है। यह एक गहन सांस्कृतिक परंपरा, एक राष्ट्रीय कला और एक सामाजिक योग्यता है। थूक की लाल-भभूका कलाकृतियां देखकर आप समझ सकते हैं कि भारत में इस कला के पैमाने अभी भी बहुत ऊंचे हैं। थूकना अब व्यक्तिगत नहीं रहा, यह सार्वजनिक सहभागिता है। यह एक खुला मंच है, जहां हर नागरिक को थूकने के रंग भरने का अधिकार है। बिना किसी प्रशिक्षण के। जो जितना जोर से थूकता है, वह उतना ही ऊंचा दर्जा पाता है। राजनीति में भी थूकना अब ‘विचार विमर्श’ का माध्यम बन चुका है। कोई नेता जब दूसरे पर थूक की बौछार करता है, तो समझ लीजिए वह चुनावी मौसम शुरू हो गया है। थूकना अब बहस नहीं, बयान है।
अब बात करते हैं चाटने की- यह कोई साधारण काम नहीं, यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है। शरीर की लचक, जीभ की सटीकता और आत्मा की लाचारी—तीनों का अद्भुत संयोग होता है चाटने में। जो जितनी सफाई से चाटे, वह उतना ही ऊँचा पद पाता है। तलवे चाटना अब पुराने जमाने की बात नहीं, यह कॉरपोरेट स्किल बन चुकी है। इंटरव्यू में अब पूछा जाता है-‘अगर बॉस तुम्हें दो थप्पड़ मारे तो क्या करोगे?’ जवाब-‘सर, तीसरा गाल भी पेश कर दूंगा और लंच के बाद चप्पलें भी साफ कर दूंगा।’ और फिर एचआर अधिकारी ताली बजाकर कहता है-‘आपका चयन हुआ है! आपको प्रमोशन सीधा चप्पल से जूते तक मिलेगा।’
हमारे देश की उन्नति इन्हीं दो सिद्धांतों पर टिकी है। एक, जो जहां थूके वही उसकी जमीन। और दो, जो जिसको चाट ले वही उसका भगवान। थूकने के मामले में नेताओं की कोई सानी नहीं। वे वादों की थूक उड़ाते हैं और जनता उस पर विश्वास की कालीन बिछा देती है। हर चुनाव में थूक की धार थोड़ी और तेज होती है, और जनता की चाट थोड़ी और विनम्र। चाटने वालों की श्रेणी भी विकसित हो चुकी है।पहली किस्म के चाटूकार वो होते हैं जो सामने से चाटते हैं और वाहवाही लूटते हैं। दूसरी किस्म वाले पीछे से चाटते हैं और गुपचुप फायदे पाते हैं। और तीसरी किस्म के महानुभाव तो हवा में ही चाट लेते हैं, इन्हें चाटने के लिए चीज की जरूरत नहीं होती, केवल अवसर चाहिए। कुछ महान आत्माएं तो ऐसी भी होती हैं जो एक ही थूक को चाट-चाट कर अमृत बना देती हैं। हर बार जनता उसे चाटकर फिर से मतदान कर देती है।
विश्वविद्यालयों में अब पीएचटीसी (फिलोसोफी आफ थूक एंड चाट) की डिग्री शुरू होनी चाहिए। थीसिस के टॉपिक कुछ ऐसे होंगे- 1.पार्टी बदलने में थूकने की भूमिका। 2. तलवे चाटने की समकालीन तकनीकें। 3. राजनीति और थूक: एक चिपचिपा संबंध। थूकना और चाटना अब वो दो स्तंभ हैं, जिन पर हमारा लोकतंत्र टिका है। एक थूकता है, दूसरा चाटता है, और तीसरा- हम सब!ताली बजाते हैं। देश में अब कोई पायदान नीचे नहीं है, बस थूक के छींटे हैं। और कोई उपलब्धि ऊंची नहीं, बस किसी का तलवा चाटना है! इसलिए हे महान नागरिकों! थूकने में शर्म न करो, यह तुम्हारा अधिकार है।

