Friday, March 27, 2026
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कर्मों का फल

Amritvani

महाभारत के युद्ध समाप्त होने पर सभी मृतकों को श्रद्धांजलि देने के बाद पांडवों सहित श्रीकृष्ण, पितामह भीष्म से आशीर्वाद लेने पहुंचे। तब श्रीकृष्ण को रोक कर पितामाह ने श्रीकृष्ण से पूछ ही लिया, मधुसूदन, मेरे कौन से कर्म का फल है जो मैं शरशैया पर पड़ा हुआ हूं? यह बात सुनकर मधुसूदन ने पितामह भीष्म से पूछा, पितामह, आपको कुछ पूर्व जन्मों का ज्ञान है? इस पर पितामह ने कहा, हां, श्रीकृष्ण मुझे अपने सौ पूर्व जन्मों का ज्ञान है कि मैंने किसी व्यक्ति का कभी अहित नहीं किया।

इस पर श्रीकृष्ण मुस्कराये और बोले, पितामह आपने ठीक कहा कि आपने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया, लेकिन एक सौ एक वें पूर्वजन्म में आज की तरह आपने तब भी राजवंश में जन्म लिया था, लेकिन उस जन्म में जब आप युवराज थे, तब एक बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे थे, तभी आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक गोजर (कई पैरों वाला कीड़ा) एक वृक्ष से नीचे गिरा।
आपने अपने बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया। वह बेर के पेड़ पर जा कर गिरा और बेर के कांटे उसकी पीठ में धंस गए। गोजर जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते। इस प्रकार गोजर अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, हे युवराज! जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूं, ठीक इसी प्रकार तुम भी होना।
तो, हे पितामह भीष्म! तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम पर गोजर का श्राप लागू नहीं हो पाया। लेकिन हस्तिनापुर की राजसभा में द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा और आप मूक दर्शक बनकर देखते रहे। इसी कारण आपके सारे पुण्यकर्म क्षीण हो गए और गोजर का एक सौ एक वें पूर्व जन्म में दिया गया  ‘श्राप’ आप पर लागू हो गया।

                                                                                                    प्रस्तुति: राजेंद्र कुमार शर्मा


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