Thursday, March 19, 2026
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गांधी आश्रम: माफिया के साथ खुला सेटिंग का भेद

  • आयोग के हेड आफिस से कराई गई गोपनीय जांच, डायरेक्टर और डिप्टी डायरेक्टर नपे

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: गांधी आश्रम समिति पदाधिकारियों और मंडलीय कार्यालय खादी ग्रामोद्योग आयोग के अधिकारियों के बीच सेटिंग का खेल तीन माह तक चलता रहा। इसकी भनक नहीं तो आयोग के आला अफसरों को लगी और नहीं प्रशासन को। ये अधिकारी प्रशासन को भी एफआईआर कराने के मुद्दे पर गुमराह करते रहे। सेटिंग का राज तब खुला, जब आला अफसरों ने पूरे प्रकरण में एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई जा रही हैं, इसका संज्ञान लिया।

आला अफसर लगातार एफआईआर दर्ज कराने के लिए चिठ्ठी लिखते रहे, लेकिन मंडलीय कार्यालय खादी ग्रामोद्योग आयोग के तत्कालीन डायरेक्टर राजेश श्रीवास्तव और डिप्टी डायरेक्टर बलराम दीक्षित ने एफआईआर नहीं लिखाई। आखिर आयोग के हेड आॅफिस से इसकी गोपनीय जांच पड़ताल कराई गयी, जिसके बाद ही लखनऊ के डायरेक्टर राजेश कुमार ने धोखाधड़ी कर जमीन बेचने के मामले में हजरत गंज लखनऊ कोतवाली में एफआईआर दर्ज करायी। इसके बाद ही गांधी आश्रम समिति के पदाधिकारियों को झटका लगा।

इसके बाद ही आयोग के हेड आॅफिस को जांच में जो तथ्य मिले थे, उनके आधार पर सेटिंग के खेल का पता चला। इसके बाद ही तत्काल प्रभाव से आयोग के मंडलीय कार्यालय में डायरेक्टर के पद पर तैनात राजेश श्रीवास्तव और डिप्टी डायरेक्टर बलराम दीक्षित को तत्काल प्रभाव से हटाकर दिल्ली आॅफिस मे अटैच कर दिया हैं। इनकी विभागीय जांच भी चल रही हैं। डायरेक्टर के पद पर अतिरिक्त प्रभार लखनऊ के डायरेक्टर राजेश कुमार को जिम्मेदारी दी गई हैं। राजेश कुमार तीन दिन मेरठ में कार्यभार देखेंगे।

एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की?

आला अफसरों के बार-बार चिठ्ठी लिखने के बाद भी तत्कालीन डायरेक्टर राजेश श्रीवास्तव ने भू-माफियाओं और गांधी आश्रम समिति पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर नहीं लिखी। पत्रों में ही उलझाकर तीन माह निकाल दिये। आयोग के आला अफसर यह नहीं समझ पाये कि आखिर हो क्या रहा हैं? सेटिंग हो सकती हैं, ये भी नहीं समझ सके। गांधी समिति पदाधिकारियों और आयोग के अधिकारियों के बीच सेटिंग का खेल चल रहा था, तभी तो डिप्टी रजिस्ट्रार के पत्र लिखने के बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं कराई गयी।

डिप्टी रजिस्ट्रार ने स्पष्ट पत्र लिखा था कि इसमें आयोग के अधिकारी एफआईआर करें, इसमें फर्जीवाड़ा किया जा रहा हैं। फिर भी इससे आयोग के स्थानीय अधिकारी बचते रहे? यह खेल चलता रहा। प्रशासनिक अफसरों के सामने ही पृथ्वी सिंह रावत ने सरकारी कागज फाड दिया था, इसके बाद भी एफआईआर नहीं लिखवाई गयी। इसमें एसडीएम ने भी एफआईआर कराने के लिए कहा था, लेकिन कोई एफआईआर नहीं लिखवाई गयी।

ये पूरा खेल चलता रहा। यह सब पकड़ में आयोग आयोग के दिल्ली और मुंबई आॅफिस के। वहीं से इसमें कार्रवाई आरंभ की गई, जिसके बाद ही तबादलों की कार्रवाई की गई। एक वर्ष पहले ही डायरेक्टर राजेश श्रीवास्तव और डिप्टी डायरेक्टर बलराम दीक्षित की यहां तैनाती की गई थी।

हाईकोर्ट पहुंचा मामला

भू-माफिया के खिलाफ लखनऊ के हजरत गंज में एफआईआर दर्ज कराने के बाद होश उड़े हुए हैं। अब गांधी आश्रम समिति के पदाधिकारी दर्ज एफआईआर के खिलाफ हाईकोर्ट में पहुंच गए हैं। इस एफआईआर को गलत बता रहे हैं। एफआईआर को निरस्त करने की मांग की जा रही हैं, जबकि आयोग की तरफ से हलफनामा दाखिल कर दिया गया हैं,

जिसमें भू-माफिया किस तरह से गांधी आश्रम की जमीन कब्जाने की दिशा में काम कर रहा हैं, उसके प्रमाण दिये गए हैं। जमीन पर आयोग ने अपना अधिकार जताया हैं। कहा है कि गांधी आश्रम की जमीन आयोग में मार्गेंज रखी हुई हैं, जिसको बेचा नहीं जा सकता। फिर इसके पूरे अधिकारी डीएम के पास हैं। डीएम स्तर से भी इसमें हस्तक्षेप किया जा सकता हैं।

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