Sunday, March 15, 2026
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गांधीजी ने पहली बार मेरठ में रखी थी असहयोग की योजना

  • जब बापू के सामने मौलाना शौकत अली ने नोंच फेंकी थी टाई

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: आधुनिक भारत के इतिहास में भी मेरठ का स्थान 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के उद्घोष स्थल के रूप में जाना जाता है। उसके उपरान्त भारत के स्वतंत्र होने तक यह स्थान स्वतन्त्रता संग्राम का मुख्य केन्द्र बना रहा। इसलिए समय-समय पर अनेक स्वतन्त्रता आन्दोलन से जुड़े व्यक्तियों ने मेरठ की यात्राएं कर स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों को दिशा और गति दी। इनमें मुख्य रूप से स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, गोपाल कृष्ण गोखले, पंडित मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

जाने-माने इतिहासकार कृष्णकांत शर्मा अपनी पुस्तक में महात्मा गांधीजी का मेरठ यात्रा के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं। बताते हैं कि गांधी जी का मेरठ में प्रथम बार आगमन 22 जनवरी, 1920 को हुआ। वे सुबह देवनागरी स्कूल पहुंचे थे जहां लोगों ने उन्हें फूल मालाओं से लाद दिया और उनका जोरदार स्वागत किया। इसके उपरान्त उन्हें एक बग्धी में बैठाकर जुलूस निकाला गया। जन समूह में उपस्थित मुसलमान लोग वन्दे मातरम के नारे लगा रहे थे और माथे पर चन्दन का टीका लगाया हुआ था। और हिन्दू लोग अर्धचन्द्र व सितारे के बैन्ड्स पहने हुए थे।

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यह मेरठ में हिन्दू-मुस्लिम एकता की अनूठी मिसाल थी। स्वागत जुलूस देवनागरी स्कूल से आगे बढ़ा और कम्बोड दरवाजा, जिसे वर्तमान में घंटाघर कहा जाता है वहीं रुका, यहां पर नगरपालिका की ओर से महात्मा गांधी को मोहम्मद यामीन ने एक अभिनन्दन पत्र भेंट किया। गांधी जी ने अभिनन्दन पत्र स्वीकार करते हुए कहा था कि हथियार नहीं सत्याग्रह का प्रयोग किया जाना चाहिए।

गांधी जी ने बैरिस्टर इस्माइल खां के साथ उन्होंने दोपहर का भोजन करने के उपरान्त सनातन धर्म हाल में एक महिला सभा को सम्बोधित किया। जिसमें बापू ने यहां स्त्रियों को सादा जीवन और उच्च आदर्शों का उपदेश दिया। उन्होंने स्त्रियों से दिखावा, आभूषणों और सज-धज से दूर रहने का परामर्श भी दिया। महिलाओं ने गांधी जी को एक अभिनन्दन पत्र भी भेंट किया। यहां से गांधी जी बर्फखाना मैदान में आयोजित एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करने गए। इस जनसभा में गांधी जी को दो अभिनन्दन पत्र दिये गए।

मेरठ कालेज पहुंचकर गांधी जी ने वहां पहुंचकर छात्रों से चरित्र निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। 11 जनवरी, 1920 में खिलाफत सम्मेलन का आयोजन मेरठ में हुआ था। रघुकुल तिलक के अनुसार जो उस सम्मेलन में उपस्थित थे, गांधी जी ने पहली बार असहयोग की योजना इसी सम्मेलन में रखी थी। इसी सम्मेलन में मौलाना शौकत अली ने गांधी जी के विचारों से पूर्व सहमति व्यक्त की और अपना क्रोध प्रकट करने के लिए इन्होंने बड़े नाटकीय ढंग से अपनी टाई नोच कर फेंक दी थी।

महात्मा गांधी के भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलनों में एक महत्वपूर्ण आन्दोलन असहयोग आन्दोलन रहा है और मेरठ के लोगों ने इस आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। 1921 में स्वयं महात्मा गांधी इस आन्दोलन का नेतृत्व करने के लिए मेरठ आए। यहां पूर्व की भांति उनका अभूतपूर्व स्वागत किया गया।

लगभग 50,000 लोगों के मध्य उन्होंने अपना भाषण दिया, इससे आन्दोलन को एक नई गति मिली। हजारों लोग जेल गए पुलिस यातनाओं के बावजूद लोगों ने गांधी जी के आह्वान पर विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया। मद्य निषेध एवं विदेशी वस्त्रों को बेचने वाली दुकानों पर धरना आदि कार्यक्रम को उत्साहपूर्वक चलाया।

सम्पूर्ण स्वतन्त्रता आन्दोलन में मेरठ मुख्य धारा से जुड़ा रहा। 1929 में मेरठ समस्त भारत और ब्रिटिश साम्राज्य में चर्चा का विषय बन गया। मार्च 1929 में सारे भारत के नेताओं को गिरफ्तार किया गया और मेरठ लाया गया। इसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस महासमिति के आठ सदस्य थे। मेरठ लाकर इन सभी नेताओं पर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध षड़यंत्र करने के आरोप में मुकदमा चलाया गया, जिसे मेरठ षड्यंत्र केस के नाम से जाना जाता है।

इसी वर्ष 27 अक्टूबर, 1929 को महात्मा गांधी एक बार पुन: मेरठ आए तथा यहां पांच दिन ठहरे। यहां इन्होंने बहुत सारी सभाओं को सम्बोधित किया। 27 अक्टूबर, 1929 को गांधी जी मेरठ जेल गए और मेरठ षड्यंत्र केस के आरोपियों से भेंट की। दोपहर बाद उन्होंने महिला समिति की एक सभा को सम्बोधित किया।

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गांधी जी का इस समय मेरठ में आगमन एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी। मेरठ में उन्होंने अनेक क्षेत्रों का भ्रमण किया जिससे यहां के नागरिकों में नई ऊर्जा का संचार हुआ। यहां के नागरिकों ने लगभग 36400 रुपये भेंट किए, जो किसी भी अन्य जिले से मिलने वाली राशि से कहीं अधिक थे। गांधी जी 1930 ई० में भी मेरठ से गुजरे थे। इसी वर्ष गांधी जी के स्वदेशी अपनाने के विचारों के कारण यहां गांधी आश्रम की स्थापना हुई।

मेरठ ऐसा क्षेत्र रहा है, जो सदैव राजनीति की मुख्य धारा से जुड़ा रहा। गांधी जी द्वारा चलाए गए सभी आन्दोलनों में मेरठ के लोगों ने बढ़ चढ़ कर सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। 18 अगस्त 1942 को मेरठ के ग्राम भामौरी में पांच क्रांतिकारियों का बलिदान भी गांधी जी के अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन को समर्थन का कभी न भुलाए जा सकने वाला दस्तावेज बनकर रह गया है।

गांधीजी के शब्दों में उनकी मेरठ यात्रा

महात्मा गांधी ने मेरठ की इस यात्रा के विषय में लिखा है कि शाम की गाड़ी से मैंने कानपुर छोड़ा। दूसरे दिन सुबह यानी तारीख 22 को सुबह में मेरठ पहुंचा। जीआईपी लाइन से लाहौर जाते हुए, मेरठ रास्ते में पड़ता है। मैंने वहां कुछ घंटे बिताने का वचन दिया था। मेरठ वासियों ने बड़ी तैयारी कर रखी थी। हिन्दू-मुसलमानों के बीच वहां मेरे प्रति प्रेम प्रदर्शन की होड़ चल रही थी।

उन्हें एक हिन्दू सज्जन के घर ठहराया गया था फिर मुझे मेरठ के प्रसिद्ध मुसलमान बैरिस्टर भाई इस्माइल खां के घर ठहराया गया। स्वागत समारोह में 750 स्वयं सेवक उपस्थित थे, जिनमें कई प्रतिष्ठित परिवारों के लोग थे। मोड़ों पर सवार स्वयं सेवकों का दल भी था। तीन मील लम्बे रास्ते पर झंडों से सजाये हुए खंभे लगा कर रस्सी बांधी गई थी। जुलूस रस्सियों के भीतर चल रहा था और बाहर दर्शक समुदाय था।

जुलूस में बाजे, ऊंट गाड़ियों, घुड़सवार, फैन्सी ड्रेस वाले इत्यादि थे। मेरा अनुमान है कि एक मील लम्बा रहा होगा। आसपास गांव से हजारों लोग आए थे। किन्तु व्यवस्था बहुत सुन्दर थी। मुझे नगर पालिका, खिलाफत कमेटी, साधारण जन समाज, हिन्दू स्त्रियों और मुसलमान स्त्रियों की ओर से मांग पत्र दिये गये।

स्त्रियों की एक अलग सभा आयोजित की गयी थी। उनका हर्ष और उत्साह छलक पड़ रहा था। लगभग हजार स्त्रियां आई होंगी। मैं बहुत असमंजस में पड़ गया। यह सारा प्रेम यदि मैं स्वीकार करूं तो उसे पचाऊंगा कैसे? मैंने तो सब वहीं कृष्णार्पण कर दिया।

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