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कार्यकाल दोहराने की चुनौती

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कार्यकाल दोहराने की चुनौती


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक बयान खासा सुर्खियों में है, जब एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने डंके की चोट पर स्वयं को उत्तर प्रदेश का दोबारा मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। दरअसल एक निजी समाचार चैनल पर जब उनसे यह पूछा गया कि पिछले पैंतीस सालों से यूपी के चुनावी इतिहास में कोई मुख्यमंत्री दोबारा मुख्यमंत्री नहीं चुना गया तो इसके जवाब में योगी ने कहा कि ‘वे वापस आ रहे हैं, इस बार रिकॉर्ड टूटेगा, पैंतीस सालों में जो नहीं हुआ अगले साल होगा’ कुल मिलाकर वे ये संकेत दे रहे थे कि पैंतीस सालों का चुनावी इतिहास को वे इस बार बदलने जा रहे हैं। खैर, इस मौके पर कोई भी मुख्यमंत्री होता तो शायद उसका भी यही जवाब होता, लेकिन यहां प्रश्न उनके आत्मविश्वास या अति आत्मविश्वास से बड़ा रोजगार, महिला सुरक्षा और किसानों, मजदूरों के जायज मुद्दों का है। जो इन दिनों यूपी की सियासत में हलचल पैदा कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहीं भी यह कहने से नहीं चूकते कि पिछले चार दशकों में जो न हो पाया, उनकी सरकार ने चार सालों में ही कर दिखाया।

उनके मुताबिक चाहे बात रोजगार की हो, महिला सुरक्षा की हो या मजदूर किसान की हो, सब का ध्यान रखते हुए उनकी सरकार ने सबके हितों की पूर्ति की है।

अगर उनका यह दावा सही है तो फिर मुख्यमंत्री जी बताएं कि जो युवा सड़क पर उतर कर, पढ़ाई छोड़ कर आंदोलन करने पर मजबूर हो रहा है और आप से यह पूछ रहा है कि रोजगार कहां है, तो वे कौन हैं?

लगातार प्रदेश में बढ़ रही रेप, यौन हिंसा की घटनाओं के खिलाफ महिला सुरक्षा की मांग करते हुए कई बार महिलाएं आंदोलनरत हुईं, तो बताएं आखिर वे महिलाएं कौन हैं?

गन्ना किसान आपसे कह रहा है योगी जी पिछले चार साल से आपके राज में गन्ने का दाम नहीं बढ़ा, लागत तक का पैसा नहीं निकल पा रहा, मुनाफे की तो छोड़िए, तो आखिर ये किसान आपके राज्य के हैं कि नहीं?

कोरोना काल में अपना रोजगार गंवा कर वापस आए लाखों श्रमिकों से आपने वादा किया था कि अब उन्हें दूसरे राज्यों में जाने की जरूरत नहीं, उन्हें यहीं रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा, पर जो लाखों श्रमिक रोजगार के लिए दोबारा दूसरे राज्यों में जाने के लिए मजबूर हुए, तो पुन: पलायन करने को विवश हुए वे तमाम श्रमिक आखिर कौन हैं?

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ भले ये लाख दावा करें कि उन्होंने अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में साढ़े चार लाख बेरोजगार युवाओं को नौकरियां दी हैं और दिसंबर तक और पचास हजार को नौकरियां देकर , पांच साल में पांच लाख युवाओं को नौकरियां देने का अपना वादा पूर्ण करेंगे, लेकिन भर्तियों और नौकरियों को लेकर आए दिन युवाओं द्वारा होने वाले धरना, प्रदर्शन कुछ और ही तस्वीर पेश करती हैं।

बीते 5 जून यानी योगी आदित्यनाथ के जन्मदिन के मौके पर युवा मंच व अन्य संगठनों के संयुक्त आह्वान पर आयोजित यूपी बेरोजगार दिवस पर 10 लाख से ज्यादा ट्वीट हुए और यह ट्विटर पर घंटों ट्रेंड करता रहा।

सरकारी नौकरियां कहां हैं? आए दिन लखनऊ में कभी दरोगा भर्ती कभी शिक्षक भर्ती कभी भर्ती घोटालों कभी लंबित पड़े परिणामों को लेकर युवा आंदोलन कर रहे हैं बावजूद इसके सरकार अपनी पीठ थपथपाने से बाज नहीं आ रही।

यह हम नहीं कहते बल्कि गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट कहती है कि महिला यौन हिंसा के मामले में राजस्थान के बाद उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर है।

आंकड़े झूठ नहीं बोलते पर योगी जी के मुताबिक तो उनके राज में दुष्कर्मी, अपराधी डर के साए में हैं, जबकि महिलाएं, छात्राएं, बच्चियां बिल्कुल महफूज हैं।

मुख्यमंत्री ने जब प्रदेश की मां, बहन, बेटियों को यह विश्वास दिलाया था कि उनके शासन में उन्हें पूरी सुरक्षा प्रदान की जाएगी और रेप के मामलों का निपटारा फास्ट ट्रैक कोर्ट के अंर्तगत 15 से एक महीने के भीतर निपटा दिया जाएगा तो यह एक चमत्कार होने जैसा लगा लेकिन बातें महज बातें ही रह गई।

पिछले लॉक डाउन में जब यूपी के करीब चालीस लाख प्रवासी मजदूर रोजगार गंवाते हुए लौटकर अपने घर आए तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन प्रवासी मजदूरों को भरोसा दिलाया था कि अब उन्हें दूसरे राज्यों में जाने की जरूरत नहीं हर श्रमिक का रजिस्ट्रेशन कर उन्हें उनके ही क्षेत्र में रोजगार दिलाया जाएगा। इन मजदूरों के लिए के लिए प्रवासी श्रमिक आयोग भी बनाने की बात कही।

हर कोई खुश था। स्वाभाविक है अगर किसी मजदूर को अपने ही घर में रोजगार मिल जाए तो भला इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है लेकिन पिछले दिनों विभिन्न जिलों के ऐसे कई प्रवासी श्रमिकों और उनके परिवार वालों से मेरी बात हुई जिन्होंने बताया कि रोजगार पाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा लेकिन यहां न कोई रोजगार मिला और न ही रजिस्ट्रेशन हुआ तो मजबूर होकर आखिर उन्हें दूसरे राज्य की ओर रुख करना पड़ रहा है। मनरेगा में भी इतना काम नहीं कि जीवन अच्छे से चला सके।

लेकिन मुख्यमंत्री जी तो ‘आल इज वेल’ की बात करते हुए शान से कहते हैं कि 40 लाख से ज्यादा प्रवासी श्रमिक उत्तर प्रदेश में आए थे जिनके भरण पोषण से लेकर रोजगार तक की व्यवस्था सरकार ने की। दुनिया के तमाम संस्थान यूपी के इस सफल मॉडल पर शोध कर रहे हैं।

श्रमिकों के हितों का ख्याल रखते हुए हम कोरोना की पहली लहर से पार पा सके। तो हम मुख्यमंत्री जी से पूछना चाहते है कि हैं मजदूरों को रोजगार के अभाव में पुन: पलायान करना पड़ा या आज भी कर रहे हैं क्या वे आपके राज्य के श्रमिक नहीं ।

किसानों के हित में बहुत कुछ करने का दावा करने वाली योगी सरकार से हम यह भी पूछना चाहते हैं कि यदि किसानों के लिए बहुत कुछ किया गया है तो फिर आखिर किसान आंदोलन पर मजबूर क्यों है।

क्यों गन्ना किसान आज सरकार से बेहद नाराज है, क्यों नहीं चार सालों से गन्ने का रेट बढ़ाया गया।

आवारा मवेशियों से परेशान किसान आपसे कह रहा है कि खुले घूम रहे ये पशु हमारी फसलों को चौपट कर रहे हैं, तो आखिर उनकी आवाजों को अनसुना क्यों किया जा रहा है।

बीस सितंबर को सीतापुर में हुई किसान महापंचायत में कई जिलों के हजारों किसान सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए पहुंचे।

चुनाव जीतने के लिए सरकारें यह जताने से चूकना नहीं चाहतीं कि उन्होंने अपनी जनता के लिए कितना कुछ किया और जीतने के बाद और वे क्या क्या करेंगी। यही हाल इन दिनों यूपी का है।

मुख्यमंत्री योगी अपने साढ़े चार साल की सफलताओं को जनता के बीच गिनाने में व्यस्त हैं दूसरी तरफ युवा, छात्र, महिलाएं, किसान, मजदूर का एक बहुत बड़ा वर्ग आंदोलनों की राह पर है। तो क्या यह विरोधाभास की हवा यूपी विधानसभा चुनाव का रुख बदल देगा, देखना दिलचस्प होगा।


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