गालिब की शायरी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह महज इश्क की हदों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें इंसानी जज्बातों की गहराई, तन्हाई की चुभन, तकदीर से बगावत, खुदा से सवाल और जिÞंदगी की कठोर सच्चाइयों की गूंज भी थी। उनकी गजलों में मोहब्बत की बेपनाह शिद्दत थी, तो जुदाई की कहर बनकर टूटने वाली पीड़ा भी। उनके अल्फाजों में वह आग थी, जो दिलों को झकझोर देती थी, सोचने पर मजबूर कर देती थी।
मिर्ज़ा गालिब (मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान)—एक ऐसा नाम, जो उर्दू शायरी की रूह में समाया हुआ है। वे केवल एक शायर नहीं, बल्कि एक युग, एक विचारधारा और एक अद्वितीय क्रांति थे, जिन्होंने उर्दू और फारसी साहित्य को ऐसे शिखर पर पहुंचा दिया, जहां तक पहुँचने की कल्पना भर करना भी अधिकांश शायरों के लिए एक असंभव स्वप्न जैसा है। 15 फरवरी 1869 को यह अजीम सितारा इस फानी दुनिया से रुखसत हो गया, मगर उनके लफ़्जों की चमक आज भी दिलों में वही उजाला भरती है। उनकी शायरी सिर्फ़ अल्फाज की जादूगरी नहीं थी, बल्कि वह जीवन का दर्पण थी, जिसमें मोहब्बत की मासूमियत, दर्द की गहराई, तकदीर की सख़्ती, बगावत की आग और दर्शन की बेमिसाल ऊंचाइयां समाई हुई थीं।
गालिब की शायरी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह महज इश्क की हदों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें इंसानी जज्बातों की गहराई, तन्हाई की चुभन, तकदीर से बगावत, खुदा से सवाल और जिंदगी की कठोर सच्चाइयों की गूंज भी थी। उनकी गजलों में मोहब्बत की बेपनाह शिद्दत थी, तो जुदाई की कहर बनकर टूटने वाली पीड़ा भी। उनके अल्फाजों में वह आग थी, जो दिलों को झकझोर देती थी, सोचने पर मजबूर कर देती थी। उनका हर शेर सिर्फ़ अल्फाजों का खेल नहीं, बल्कि जिंदगी की सुलझी-अनसुलझी पहेलियों को ऐसा बयान करता है कि पढ़ने वाला सहसा ठिठक जाता है—क्या यह सिर्फ़ शायरी है, या उसकी अपनी ही अधूरी दास्तान का आईना?
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?
गालिब का जीवन भी उनकी शायरी की तरह जटिल, गूढ़ और दर्द से तराशा हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया, और निष्ठुर हालात ने उन्हें वक्त से पहले ही परिपक्व बना दिया। मुफलिसी और तंगहाली की कड़वी मार उन्होंने ताउम्र झेली, मगर उनकी रूह कभी टूटी नहीं। उन्होंने अपने दर्द को कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसे अपनी कलम की धार बना दिया। यही कारण है कि उनकी शायरी महज लफ़्जों की बाजीगरी नहीं, बल्कि हर उस टूटे हुए इंसान के दिल का सच्चा मरहम है, जो जिदगी के थपेड़ों से जूझ रहा हो।
गालिब ने उस दौर की शायरी को एक नई दिशा दी, जब उर्दू अदब महज इश्क और हुस्न की वादियों में भटक रहा था। उन्होंने अपने अशआरों में ऐसी बेमिसाल गहराई और दार्शनिक ऊँचाई भरी, जिसे समझने के लिए केवल भाषा का ज्ञान काफी नहीं था, बल्कि एक संवेदनशील हृदय और चिन्तनशील मस्तिष्क भी आवश्यक था। उन्होंने तकदीर को ललकारा, खुदा से सवाल किए और मोहब्बत को एक नई परिभाषा दी, जो केवल पाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि खोकर भी अमर रहने की जुस्तजू थी।
बाजीचा-ए-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शबो-रोज तमाशा मेरे आगे
गालिब की रचनाएं सिर्फ़ गजलों की सीमा में बंधी हुई नहीं थीं, बल्कि उनके लिखे खत भी उर्दू अदब की बेमिसाल विरासत हैं। उनके खतों में महज औपचारिक संवाद नहीं, बल्कि एक बेचैन शायर का दर्द, एक असहाय इंसान की बेबसी, एक बागी की तल्खी और एक दार्शनिक की गूढ़ सोच समाई हुई थी। उनकी बातों की सहजता और भावनात्मक गहराई ने उर्दू साहित्य को नई दिशा दी, जहाँ खत सिर्फ संदेश नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति बन गए। उनकी हर लिखित पंक्ति एक अलग दुनिया को उजागर करती थी, जहाँ शब्द भावनाओं से लबरेज होकर बोलते थे।
गालिब अपने समय से कहीं आगे की सोच रखते थे, लेकिन अफसोस कि उन्हें अपने दौर में वह पहचान नहीं मिली, जिसके वह असल हकदार थे। उनका अंदाज उस समय के पारंपरिक शायरों से अलग था, उनकी सोच अधिक व्यापक और विद्रोही थी, इसलिए समकालीन आलोचकों ने उन्हें समझने के बजाय नकारने की कोशिश की। मगर वक़्त की कसौटी पर सच्ची कला कभी फीकी नहीं पड़ती। आने वाली पीढ़ियों ने उनकी शायरी की कद्र की, उन्हें सिर-आँखों पर बिठाया। आज जब कोई इश्क में डूबता है, तकदीर से टकराता है या खुदा से शिकवा करता है, तो गालिब के अशआर अनायास उसकी जुबान पर आ जाते हैं, जैसे सदियों से उस दर्द के लिए लिखे गए हों।
यह न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतजार होता।
आज जब उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण किया जाता है, तो यह महज एक औपचारिकता नहीं होती, बल्कि आत्ममंथन का एक अनमोल अवसर होता है। यह उनकी शायरी की गहराइयों में उतरकर खुद को खोजने, अपने एहसासों को टटोलने और दुनिया को देखने के एक नए दृष्टिकोण को अपनाने का क्षण होता है। गालिब को पढ़ना सिर्फ़ लफ़्जों से गुजरना नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं, अपने संघर्षों और अपनी जिज्ञासाओं को एक नई रोशनी में देखने जैसा है।
गालिब महज एक नाम नहीं, बल्कि एक अजीम एहसास हैं, जो हर तन्हा दिल की धड़कनों में, हर खामोश आँसू की नमी में और हर बगावती सोच के सवालों में अब तक जिंदा हैं। उनकी शायरी ने वक़्त की सरहदों को पार कर हर दौर में अपनी अहमियत बनाए रखी है। वे उर्दू अदब के आकाश पर ऐसा दैदीप्यमान सितारा हैं, जिसकी रोशनी कभी मद्धम नहीं हो सकती। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन, जिन्होंने शब्दों को ऐसा जादू बख्शा, जो युगों-युगों तक इंसानी जज्बातों को रोशन करता रहेगा।
मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले