
यह हिसाब लगाना मुश्किल है कि लोगों द्वारा दी जाने वाली शराब ज्यादा ज्वलनशील है या हमारी राजनीति में इसे लेकर उठाने वाले बवाल, पर यह कहने में कोई मुश्किल नहीं है कि अभी दस साल पहले तक इन दोनों मोर्चों पर शराब की ‘प्रतिष्ठाह्ण इतनी न थी। भांग, गाँजा, तंबाकू, हुक्का वगैरह का चलन तो था, लेकिन ज्यादा न था और उन्हें लेकर बहुत हंगामा नहीं था। साधुओं को छोड़ दें तो आम लोगों में से जो कोई इनका सेवन करता था, वह कुछ अपराध भाव से ही करता था।