Saturday, May 2, 2026
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मेहमान परिंदों से गुलजार होने लगा हस्तिनापुर

  • हर साल 20 से अधिक प्रजातियों के पक्षी आते हैं हस्तिनापुर
  • पक्षियों को देखने के लिए पर्यटकों का लगता है जमावड़ा

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: मुल्कों के बीच इंसान की खींची सरहद की परवाह पंछी, नदियां और पवन के झोंके नहीं करते। यह पंक्ति हस्तिनापुर अभ्यारण्य में आने वाले प्रवासी पक्षियों पर सटीक बैठती है। सरहद और सियासी बंदिशों को लांघकर प्रवासी पक्षी अभ्यारण्य पहुंच रहे हैं। इन प्रवासी पक्षियों को देखने के लिए नए पर्यटक एवं पक्षी प्रेमी यहां हर साल पहुंचते हैं। विभिन्न देशों से कई प्रजातियों के प्रवासी पक्षियों में से कुछ प्रतिवर्ष यहां आने के लिए एक दिन में 10 हजार किमी से अधिक की दूरी तय करते हैं।

बता दें कि राज्य पक्षी सारस को वन आरक्षित क्षेत्र हस्तिनापुर की आवोहवा पसंद आने लगी है। हाल ही में अभ्यारण्य क्षेत्र में हुई सारस की गणना में इनकी संख्या में करीब 64.91 फीसदी की इजाफा दर्ज किया गया है। 2020 में वन क्षेत्र में 72 सारस थे। जबकि 2021 में इनकी संख्या बढ़कर 114 हो गई है। वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि जिले में सारस को अनुकूल वातावरण मिल रहा है।

जिले में कुल 114 सारसों में एक बच्चा भी है। प्रदेश में सारस को राज्य पक्षी का दर्जा दिया गया है। सारस परिवार में रहता है। नर और मादा सारस जोड़े में रहकर अपना कुनबा बनाते हैं। एक-दूसरे के प्रति इनमें अटूट प्रेम होता है। उड़ने वाले पक्षियों में सारस सबसे बड़ा पक्षी है। वह कभी पेड़ पर आशियाना नहीं बनाता। जोड़े में से अगर एक सारस की किसी कारण मृत्यु हो जाती है तो दूसरा सारस भी दम तोड़ देता है।

सामाजिक वानिकी और वन्य जंतु प्रभाग शीतकालीन गणना में सारस की संख्या में वृद्धि को अच्छा माना जा रहा है। हर साल ठंड के दस्तक देते ही हस्तिनापुर वन्य जीव विहार विदेशी पक्षियों से गुलजार होने लगती है। यहां का अनुकूल मौसम और प्राकृतिक वातावरण 25 से 30 हजार किमी दूर से इन पक्षियों को आने के लिए मजबूर कर देता है। हिमालय पर्वत शृंखला भी इनको आने से नहीं रोक पाती। इनके आने से सेंक्चूरी का प्राकृतिक सौंदर्य और भी अनुपम हो जाता है।

अनुकूल वातावरण में करते सुरक्षित महसूस

अधिकारियों और जानकारों का मानना है कि अनुकूल वातावरण और खुद को सुरक्षित महसूस करने के चलते जिले में सारस का कुनबा बढ़ रहा है। सारस तालाब, पोखर और झीलों के किनारे दलदली जमीन के साथ कृषि भूमि को अपना बसेरा बनाते हैं। खेतों के कीड़े मकोड़े उनका भोजन होते हैं। ऐसे में इस पक्षी को किसानों का मित्र भी माना जाता है।

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