जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: बिहार में चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने अपनी प्रारंभिक आपत्तियां रखीं। वहीं अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग की कार्रवाई संविधान के तहत अनिवार्य है और उसे संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए।
क्या है मामला?
बिहार में आगामी चुनावों से पहले चुनाव आयोग ने मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) शुरू करने का फैसला किया था। इस फैसले को लेकर कई विपक्षी दलों और नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल कीं। उनका तर्क है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर फेरबदल कर सकती है, जिससे चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
सुनवाई में क्या हुआ?
सुनवाई जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल एस ने तर्क दिया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत गहन पुनरीक्षण पूरी मतदाता सूची को खत्म कर फिर से नामांकन की प्रक्रिया शुरू करने जैसा होता है, जिससे 7.9 करोड़ मतदाता प्रभावित हो सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि अधिनियम के धारा 21 की उपधाराएं इस प्रक्रिया को नियंत्रित करती हैं:
उपधारा 1 – सामान्य प्रावधान
उपधारा 2 – संक्षिप्त पुनरीक्षण
उपधारा 3 – गहन पुनरीक्षण
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा “चुनाव आयोग जो कर रहा है, वह संविधान के तहत अनिवार्य है। आप यह नहीं कह सकते कि वे कुछ गैर-संवैधानिक कर रहे हैं।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि “आयोग ने 2003 में ऐसा किया था। उनके पास आंकड़े और अनुभव हैं, वे फिर से पूरी कवायद क्यों न करें?”
जस्टिस जॉयमाला बागची ने सवाल उठाया
“क्या आपको लगता है कि धारा 21(3) इस प्रक्रिया से नहीं जुड़ी है? हमारा मानना है कि यह एक अनिवार्य शक्ति है जो आयोग को गहन प्रक्रिया करने की अनुमति देती है।”

