जैसे कि बाजार की आदत है वह हर किसी से पहला प्रश्न यह करता ही है कि, ‘तुम्हारा बजट क्या है?’ वह वसंत के आने पर उससे भी यही प्रश्न करता है। वसंत इस प्रश्न को सुनने के बाद घबराया हुआ है। उसे तो बजट की एबीसीडी भी नहीं आती। वह बाजारू दुनिया से अलग ही रहता आया है। ऋतुओं में उसे वैसे ही कम समय दिया गया है और ऊपर से बजट की बात, उसे यह सब असहज लगाता है। लेकिन बाजार तो बाजार है! वह जन्म से लेकर मृत्यु तक बजट की भूमिका में ही रहता है। फिर वसंत किस खेत की मूली है।
आजकल प्रकृति की हर क्रिया(मूवमेंट) पर कर लग रहा है तो फिर वसंत के आने पर उससे भी बजट की बात तो बनती है। ऐसे में वसंत भ्रमित हो गया है। वह किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में आ गया है। वसंत को यह भी पता है कि मैं नहीं आऊंगा तो मेरे कितने ही प्रेमी व दीवाने दुखी हो जाऐंगे। वसंत नहीं आऐगा तो प्रेमी लोग झरते फूलों के साथ सेल्फी लेकर कैसे फिर सोशल मीडिया पर डालेंगे? बजट दुनियादारी का मामला है लेकिन वसंत ऋतु तो प्रेम व प्रकृति का विषय है। इन दोनों के बीच बाजार का यह प्रश्न;- यक्ष प्रश्न बन गया है! वसंत के लिए जवाब देना मुश्किल होता जा रहा है।
बड़े-बड़े मॉल खुल गए हैं और वसंत दिनोंदिन फेसबुक व इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंचों तक ही सीमित होता जा रहा है। वसंत आए तो आए कैसे। बाजार वसंत के आने पर चार्ज लगाना चाहता है। ओर एक चार्ज नहीं, ‘फरवरी के वेलेंटाइन सप्ताह में तो लगातार सात दिन चार्ज लगता है तब कहीं लव जैसा कुछ लगता है।’ यह चार्ज वैसे ही है जैसा सरकारी कार्यालय में कोई कार्य करवाने के लिए बाबूजी की टेबल पर देना पड़ता है। बाजार व बाबूजी दोनों एक है। या फिर यह भी कह सकते हैं कि बाजार व सरकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यह संयोग है या फिर वसंत के विरुद्ध बाजार का प्रयोग कि उसके आने के समय ही सरकार भी देश का बजट लाती है। बकायदा बाजार हलवा खाकर बजट की घोषणा करता है। ऐसी परिस्थिति में वसंत ना सिर्फ बाजार में अकेला खड़ा होकर बाजारू मौसम के कारण ठिठुरता व भीगता पर कपकपा रहा है।
इन दिनों जैसे ही प्रकृति में वसंत अपने रंग भरने लगता है, बाजार के प्रश्न वसंत को विचलित कर देते हैं। वसंत का आनंद लेने के लिए अब प्रकृति की गोद में नहीं, रिसोर्ट बुक करना होता है। यहां बजट का प्रश्न यक्ष हो जाता है। फूलों की वादियों में वसंत खिलता तो है लेकिन इन वादियों में अब टिकट लगता है। वसंत बाजारू वस्तु बनता जा रहा है। वसंत इसका विरोध भी करता है लेकिन बाजार के सामने उसकी एक नहीं चलती। लोकतंत्र के मंदिर में होती संसदीय कार्यवाही व विरोध की तरह वसंत की आवाज को फाईलों में दबा दिया जाता है।ह्ण बाजार के विकराल रूप को देखकर वसंत आजकल सिर्फ राष्ट्रीय अभ्यारण्यों व उद्यानों में खिलता है और वहीं झर जाता है। बाजार रूपी जंगल में वसंत की कोई कीमत नहीं रह गई है।

