
अभी 10 नवंबर को दिल्ली के लाल किले के पास धमाके के बाद से आतंकी लैब के रूप में सामने आयी फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी संदेह के घेरे में है। गौरतलब है कि दिल्ली बम धमाके का मुख्य आरोपी डॉ. उमर नब इसी यूनिवर्सिटी में चिकित्सक के रूप में कार्यरत था। दरअसल हरियाणा के फरीदाबाद में स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी की स्थापना 2014 में हरियाणा विधानसभा के अधिनियम 21 के तहत की गयी थी। इसको यूजीसी द्वारा एक्ट 1956 की धारा 2(एफ) के तहत मान्यता मिली थी। यह यूनिवर्सिटी एसोसियेशन आफ इंडिायन यूनिवर्सिटीज (एआईयू) की सदस्य भी रही है। इस यूनिवर्सिटी में यूजी व पीजी के साथ-साथ पीएच-डी स्तर के पाठ्यक्रम भी संचालित हो रहे हैं।
2025 की अधिकृत सूचना से जुड़े आंकड़ों के अनुसार देश में इस समय 1191 विश्वविद्यालय संचालित हैं। इनमें निजी विश्वविद्यालयों की संख्या 502,राज्य विश्वविद्यालय 494,केन्द्रीय विश्वविद्यालय 57 तथा डीम्ड विश्वविद्यालयों की संख्या 138 है। ये आंकड़े बताते हैं कि इस समय देश में निजी विश्वविद्यालयों की संख्या सबसे अधिक है। यूजीसी एक्ट 1956 में यह स्पष्ट अंकित है कि विश्वविद्यालय केवल तभी डिग्री प्रदान कर सकते हैं जब वे केन्द्रीय, प्रांतीय अथवा राज्य अधिनियम के तहत स्थापित हुए हों। यूजीसी अधिनियम की धारा 73 के तहत स्थापित डीम्ड संस्थान डिग्री प्रदान करने के पात्र हैं। इनके अतिरिक्त जो संस्थान संसद के एक अधिनियम के द्वारा विशेष रुप से स्वीकृत हैं वे भी डिग्री प्रदान करने के पात्र माने गये हैं।
देश में यूजीसी,एआईसीटीई व एनसीटीई जैसी नियामक संस्थाओं के द्वारा मान्यता प्रदान करने के बावजूद भी अक्सर यहां फर्जी विश्वविद्यालयों के द्वारा डिग्री दिए जाने की चर्चा खूब जोरों पर रहती है। यूजीसी हर साल ऐसे फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी भी करता है। उनमें से कुछ बंद भी किए जाते हैं। इसके बाद भी देश में आज 22 फर्जी विश्वविद्यालय संचालित हैं। इनमें 10 तो अकेले दिल्ली में ही संचालित हैं। इसके साथ अलावा यूपी में 4, आन्ध्र प्रदेश व केरल में 2-2, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पुडुचेरी व पश्चिम बंगाल में 1-1 विश्वविद्यालय फर्जी तरीके से संचाालित हैं। इनमें से अधिकांश विश्वविद्यालय छात्रों के धड़ल्ले से डिग्री बांटने से नहीं हिचक रहे हैं। कुछ विश्वविद्यालय तो अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों से संबद्धता का हवाला देकर देश में लोगों से लाखों रुपये वसूलकर पीएच-डी व डी-लिट् की उपाधि तक बांट रहे हैं।
उत्तर प्रदेश सहित कई प्रदेशों के निजी विश्वविद्यालय इस धोखाधड़ी से जुड़ी जांच के घेरे में हैं। देश में फर्जी डिग्री प्रदान करना एक गंभीर संज्ञेय और गैर जमानती अपराध हैं। इस धोखाधड़ी और जालसाजी के लिए आईपीसी की धारा 468 के तहत सात साल की सजा और जुर्माना निर्धारित है। पिछले दिनों कई निजी विश्वविद्यालयों के संचालक इस एक्ट के तहत जेल तक भेजे गए हैं और कई विश्वविद्यालयों में निर्धारित पाठ्यक्रमों से इतर जाकर अन्य देश विरोधी गतिविधियों को लेकर नियामक संस्थाओं की कर्तव्यविमुखता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
अभी पिछले दिनों इंटरपोल और रैंड कारपोरेशन की नवीनतम टेरर विहेवियर इंटेलिजेंंस रिपोर्ट से संज्ञान में आया है कि विश्व आतंकवाद अब एक नये मोड़ पर पहुंच चुका है। वहां अब हथियारों और विस्फोटकों के साथ-साथ मोबाइल फोन, लैपटॉप, एन्क्रिप्टेड चैट व डिजिटल नेटवर्क इत्यादि पर आधारित कट्टपंथ प्रशिक्षण सबसे बड़े हथियार बन रहे हैं। फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी में सफेदपोश मॉडयूल के पकड़ में आने के बाद भारतीय खुफिया एजेंंसियां की पैनी नजर होने से आतंक के विदेशों में छिपे मॉडयूल ने अब भारतीय विदेशी छात्रों को निशाना बनाने के प्रयास तेज कर दिए हैं। उनकी साजिश है कि ये छात्र भारत लौटने के बाद आतंक के ऐसे ही मॉडयूल बनकर आतंकी गतिविधियों को अंजाम दें। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली दंगों से जुड़ी सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व कर रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने भी पीठ के सामने लाल किले पर हुए विस्फोट से जुड़ी घटना की चर्चा करते हुए दलील दी कि जब बुद्धिजीवी आतंकवादी बन जाते हैं तो वे जमीनी आतंकवादियों से ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं। कड़वा सच यह है कि भारतीय छात्रों को कट्टरपंथी बनाने से जुड़े इस इको-सिस्टम से अब देश के लिए भविष्य में एक नया खतरा उत्पन्न होने के संकेत मिल रहे हैं।
देश में शायद यह पहला मौका है जब यूजीसी से मान्यता प्राप्त अल फलाह यूनिवर्सिटी के साथ-साथ कश्मीर के मेडिकल कॉलेज के डाक्टरों से जुड़ा यह जटिल सफेदपोश आतंकी मॉडयूल सामने आया है। जांच एजेंसियों को यह भी संदेह है कि जैश मॉडयूल भविष्य में गुप्त रूप से कश्मीर के अस्पतालों को जहरीले हथियार छिपाने के ठिकाने के रूप में प्रयोग कर सकता है। हाल फिलहाल अभी यह सारा मुददा् यूजीसी मान्यता प्राप्त केवल एक यूनिवर्सिटी से जुड़ा है। शेष फर्जी विश्वविद्यालयों में डिग्री बांटने के साथ-साथ अन्य क्या-क्या गतिविधियां संचालित होती होंगी इसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।
इस सच को कहने में कोई हिचक नहीं कि अगर मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय में इस प्रकार के बुद्धिजीवी आतंकी मॉडयूल पनप रहे हैं तो कहीं न कहीं यह यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई जैसी नियामक संस्थाओं की उदासीनता भी जिम्मेदार है। आज अल फलाह यूनिवर्सिटी के साथ देश में फैले निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में संचालित गतिविधियों एवं उनकी कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं तो वह इसलिए क्योंकि इन नियामक संस्थाओं के पास आज भी कोई ठोस व प्रभावी निगरानी तन्त्र नहीं है। हालांकि अल फलाह यूनिवर्सिटी का मामला सामने आने पर यूजीसी और नैक संस्थाओं ने प्रशासन को नोटिस जारी किए हैं, मगर समय रहते ये नोटिस कितने प्रभावी होंगे, यह आने वाला समय ही बताएगा। फर्जी विश्वविद्यालयों के लगातार संचालन के साथ और भी कई विश्वविद्यालयों में भष्टाचार की खबरें लगातार आती ही रहती हैं। मगर प्रभावी कार्यवाही न होने से ऐसे विश्वविद्यालयों के हौसले बुलंद ही रहते हैं। यही वजह है कि अल फलाह जैसी यूनिवर्सिटी का ढुलमुल आंतरिक तंत्र बाहर आकर सफेदपोश आतंक का ताडंव करने में नहीं हिचकता।
यूजीसी व अन्य नियामक संस्थाओं की भूमिका अब केवल शैक्षणिक गुणवत्ता और छात्र हितों की रक्षा करना ही नहीं रह गयी है, बल्कि हालिया प्रकाश में आये ज्वलंतमुद्दों के साथ में उच्च शिक्षा से जुड़े सेवानिवृत कुलपति, निदेशक, प्रोफेसर के साथ में विशेषज्ञीय आचार्यों को साथ लेकर एक प्रभावीव बहुपक्षीय सघन संवाद से परिपूर्ण निगरानी तंत्र भी विकसित हो ताकि उच्च शिक्षा से जुड़ी इन संस्थाओं के कामकाज की लगातार जांच-पड़ताल होकर भावी छात्रों का भविष्य पूर्ण सुरक्षित किया जा सके।

