
वह शायद 1935 का साल था जब नात्सी आंदोलन धीरे-धीरे अपने उरूज पर पहुंचता दिख रहा था। उन्हीं दिनों गोया एक नया शब्द यूरोप की जुबां में दाखिल हुआ-‘घेटटो बेंचेस’। विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच ‘अलगाव/भेदभाव’ पर आधिकारिक मुहर लगाने के लिए उठाया गया यह एक कदम था, जिसके तहत यहूदी छात्रों को कक्षाओं के अंदर अलग लाइन में बैठने का निर्देश था, वरना उन्हें संस्थान से निष्कासित किया जाता। यहूदी छात्रों को शिक्षा से रोकने का वह एकमात्र तरीका नहीं था। विएना विश्वविद्यालय की वह चर्चित तस्वीर भी आप ने देखी होगी, जिसके तहत नात्सी छात्रों का समूह मानव श्रंखला बन कर खड़ा है, वहां के विश्वविद्यालय के दरवाजे पर ताकि यहूदी छात्रों को अंदर घुसने से रोका जाए। यह बात अब इतिहास हो चुकी है कि यह सिलसिला किस तरह आगे बढ़ा और कैसे उसकी परिणति यहूदियों के अपने घरों, व्यवसायों से निष्कासन, उनके यातना शिविरों में पहुंचाए जाने और उनके जनसंहार में हुई। वे तमाम बातें, इतिहास के ऐसे रक्तरंजित पन्ने, जिसे कोई आज याद नहीं करना चाहता।
बहरहाल, पिछले दिनों सूबा कर्नाटक ने अचानक घेटटो बेंचेस के सिलसिले की या यहूदी छात्रों को शिक्षा संस्थानों के दरवाजों पर रोकने के उस सिलसिले की याद ताजा की। बरसों से उस कालेज में पढ़ रहीं- हिजाब पहन की ही वहां आती जाती रही यह छात्राएं आज भी कालेज में प्रवेश से वंचित है और यह सिलसिला महज उपरोक्त कालेज तक अब सीमित नहीं रह गया है। आसपास के कई जिलों के कालेजों मे पहुंच चुका है। इतना ही नहीं, कालेज प्रशासनों के ऐसे मनमाने निर्णय के हक में और मुस्लिम छात्राओं के लिए तालीम के दरवाजे बंद रखने के हक में बहुसंख्यक समाज के छात्र भी सड़कों पर उतरे हैं और उन्होंने अपने गले में केसरिया गमछा पहने स्कूल में पहुंचने की मांग की है और दावा किया है कि यह उनकी ‘धार्मिक मांग’ है।
लाजिम है कि जिस मनमाने तरीके से मुस्लिम छात्राओं को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है, उसके प्रति जबरदस्त आक्रोश पैदा हुआ है। एक तरफ जहां लोगों की आंखें अदालत के फैसले की तरफ टिकी हैं, जहां यही उम्मीद की जा रही है कि न्यायपािलका अपने फैसले में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर अडिग रहेगी और इस विवाद को खड़ा करने के पीछे खड़ी शरारती ताकतों की कारगुजारियों को समझेगी, और कदम बढ़ाएंगी।
यह भी स्पष्ट है कि यह ताजा विवाद-जिसके तहत असमावेश के अपने चिंतन को, समुदाय विशेष को निशाना बनाने की अपनी समझदारी को स्कूलों के छात्रों-युवाओं में भी पहुंचाने में दक्षिणपंथी ताकतें कामयाब हुई हैं-एक तरह से राजनीति और समाज के बढ़ते केसरियाकरण की दिशा में एक और कदम है। चंद माह पहले कर्नाटक के नागरिक अधिकार और जनतांत्रिक आजादियों के हिमायती संगठनों, व्यक्तियों ने दक्षिण कर्नाटक-जिसमें उडुपी भी स्थित है, वहां बढ़ती सांप्रदायिक निगरानी और नफरती अपराध के घटनाओ पर केंद्रित एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसके तहत उन्होंने इलाके में जाकर तमाम लोगों से मुलाकात की थी और विभिन्न जिलो का दौरा किया था।
‘फ्राम कम्युनल पोलिसिंग टू हेट क्राइम्स: द एटैक आन अम्बेडकर्स डी्रम आफ इक्वालिटी’नामक उपरोक्त रिपोर्ट का निष्कर्ष यही था कि किस तरह विभिन्न रास्तों से हिंदुत्व वर्चस्ववादी ताकतों ने-सत्ताधारियों के सहारे- पूरे क्षेत्र को हिंदुत्व की एक प्रयोगशाला में तब्दील किया है। स्पष्ट है कि हिजाब के नाम पर विवाद खड़ा करने के पीछे भी यही ताकतें हैं। अधिक चिंताजनक मसला यह है कि इस मुददे को-जिसे दक्षिणपंथी केसरिया जमातों ने उठाया है-उसे ‘हिजाब विवाद’ कहा जा रहा है। निश्चित ही यह कोई मासूमियत भरा वक्तव्य नहीं है, क्योंकि यह विमर्श पीड़ितों को और अधिक अलग थलग कर देता है और उन्हें निशाना बनाता है और केसरिया उन्मादियों, अतिवादियों की हरकतों पर परदा डालता है।
हिजाब का मसला फिलवक्त अदालत की निगरानी में है, जिसे महज मुस्लिम महिलाओं/लड़कियों का मामला कह कर सीमित नहीं किया जा सकता। हिजाब के बहाने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश दिया जा रहा है कि वह भारत जो लगभग 75 साल पहले आजाद हुआ था, अब निर्णायक तौर पर बदल गया है; बकौल वजीरे आजम मोदी यह ‘न्यू इंडिया’ है, जिसने सर्वधर्म समभाव के अपने फैसले से दूर का सफर तय किया है। भले ही इस पर अभी कानूनन मुहर ना लगी हो, लेकिन हकीकत में यह एक हिन्दु राष्ट्र है जहां अल्पसंख्यक समुदाय बहुसंख्यक समुदाय की सहनशीलता/अनुमति/क्षमा/पर ही रहते हैं।
अगर आजाद भारत के निर्माताओं गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद, अंबेडकर और ऐसे तमाम लोगों ने एक ऐसे देश का तसव्वुर किया था जहां सभी नागरिक बराबर होंगे, देश को समर्पित संविधान के तहत जाति, धर्म, नस्ल, भाषा आदि तमाम आधारों पर किसी के साथ हर तरह के भेदभाव से समाप्ति का वायदा किया गया था, वहीं यह एक नया भारत है सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर आदि के सपनों का भारत -एक राष्ट्र, एक जन, एक संस्कृति’ की बात करता भारत।
हिजाब के बहाने हाल में खड़ा किए गए इस केसरिया विवाद और कुछ समय पहले सूर्खियां बने सुल्ली बाई/बुल्ली बाई एपिसोड में एक साझापन दिखता है। याद रहे कि सुल्ली बाई/बुल्ली बाई के बहाने ऐसी मुस्लिम महिलाओं की ‘नीलामी’ की बात कही गयी थी, जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में एक उंचा मुकाम हासिल किया है, इसके जरिए उन्हें बताया जा रहा था कि अधिक मुखर होने की उन्हें कीमत चुकानी पड़ेगी। हिजाब पहनी छात्राओं को स्कूल में पहुंचने से रोकना एक तरह से इसी दिशा का पहला कदम है। ‘न रहेगा, ना रहेगी बांसुरी’ की तर्ज पर।
अंतत: भले ही यह माकूल वक्त न हो यह सवाल उठाने का कि आखिर हिजाब के बहाने कर्नाटक सरकार कुछ आत्मपरीक्षण करने का साहस भी जुटा सकती है या नहीं? क्या स्कूलों में अध्ययनरत अन्य धर्मियों के प्रति उसका वही रवैया है, जैसा मुस्लिम बच्चियों के साथ कर रहा है। अगर उसे लगता है कि स्कूल परिसरों में धर्म की छाया तक नहीं पड़नी चाहिए तो क्या उसने अंतत: यह फैसला ले लिया है कि आइंदा स्कूल परिसर में न किसी धर्म की प्रार्थना होगी, न कोई छात्र या अध्यापक किसी भी किस्म का धार्मिक प्रतीक पहन कर दाखिल होगा? क्या आाइंदा वह केसरिया गमछा गले में डाले छात्रों को, पगड़ी बांधे सिख बच्चों के लिए भी स्कूल के दरवाजे बंद रखेगा? क्या स्कूल परिसर में अक्सर मनाए जाने वाले दिवाली, दशहरा, बसंत पंचमी, होली या क्रिसमस जैसे त्योहारों पर वह पाबंदी लगाएगी?
सुभाष गाताडे


