दिनेश प्रताप सिंह ‘चित्रेश’
एक समय था, जब होली पूरे पांच सप्ताह का धार्मिक-सांस्कृतिक लोक अनुष्ठान होती थी। उत्तर और मध्य भारत में बसंत पंचमी के दिन होलिका दहन वाले स्थान को अच्छी तरह साफ करते थे, विधिवत पूजा-अर्चना एक बाद वहां ‘अरंड’ का एक पौधा गाड़ देते थे। इस स्थान पर आम की मंजरियाँ, टेसू की कलियां और पत्ते अर्पित करके सामूहिक ‘फाग गायन’ का श्रीगणेश होता था। पहली प्रस्तुति हनुमान जी को समर्पित होती थी-
बिनवउं मैं पवन कुमारे, राम रखवारे।
बाल समय सूरज का लीलेउ जानि मधुर पकवारे..।
लोकसाहित्य में फाग को ‘क्लासिक’ का दर्जा हासिल है। इसकी कई विधाएं हैं, यथा सवाताल, डेढ़ ताल, ढाईताल, चौताल, अठतल्ली, होरी, जोगीरा, उलारा, बेलवारा वगैरह…। सबकी अपनी ताल, लय और आलाप…गायन ढोल, मजीरा और करतल के संगीत के बीच होता था। कहीं-कहीं हारमोनियम का उपयोग भी कर लेते थे। एक शैली अवध, बुन्देल खण्ड, भोजपुरी लोक और मिथिला में प्रचलित है, जिसमें झूमते हुए नाचकर फाग गाते हैं। बसंत पंचमी की शाम को जो फाग गायन शुरू होता देर रात तक चलता था। इसके बाद रोज सांझ को अलग-अलग टोले-मोहल्ले में फाग की सुमधुर स्वर लहरियाँ गूंजने लगतीं थीं। क्या बच्चे, क्या बूढ़े सब एक पुलक भरी गुदगुदी और उमंग से आह्लादित हो उठते थे। यह सब होली तक चलता था।
होली साल में एक बार आती थी, मगर जमकर…फाग गायन और संगीत से लहराती सांस्कृतिक संध्याएं यादगार बन जाती थीं। राजस्थान में रसिया, धमाल और चंग गीत की धूम मचती थी। यहाँ के वाद्य यंत्रों में चंग और ढप भी शामिल होते थे। असम, बंगाल और ओडिशा की होली यानी ‘ढोल जात्रा’ के गीतों में पेपा, टोका, खोल और माँदल जैसे वाद्य अपनी धमक बिखेरते हैं।
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के होली गीतों के साथ माँदर, मोहरी की धुन भी अपनी स्वर लहरी बिखेरती है। इधर होली गीतों में राधा-कृष्ण की लीला, बसंत की प्राकृतिक सुषमा, जीव-जन्तु और पेड़ों-वनस्पतियों में इन दिनों पैदा होने वाले विशिष्ट भाव पर आधारित होते हैं। दक्षिण भारत में होली के गीत उत्तर भारत से अलग शिव-पार्वती, सती का पुनर्जन्म, कामदेव के दहन और पति के पुनरुज्जीवन के लिए रति के तप पर केंद्रित हो जाते हैं। यहां की होली ‘कामन हब्बा’, ‘कामुनी पुन्नमी’ और ‘मंजुल कुली’ जैसे नामों से प्रचलित है। इतिहास में जाने पर हम पाते हैं कि विजय नगर राज्य के हम्पी में ओकुली यानी होली का राजा की तरफ से भव्य आयोजन होता था। इसमें पलाश के फूलों से उतारे गए सुगंधित रंग का उपयोग करते थे।
होली मनाने के पीछे प्रह्लाद की कथा, शिवजी द्वारा कामदेव को भस्म कर देने के पौराणिक संदर्भ के अलावा भी कई प्राचीन आख्यान, ऋतु परिवर्तन, नवधान्य के प्रति हर्षाभिव्यक्ति जैसे ढेरों प्रसंग हैं। प्राचीनतम संदर्भ मनु महाराज से सम्बन्धित है। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को ‘सावर्णी मन्वादि तिथि’ की मान्यता है। लाखों वर्ष पहले मानव जाति के आदि पूर्वज ‘मनु महाराज’ अवतरित हुए थे। यहीं से मनुष्य के अस्तित्व और संघर्ष का अभियान आरम्भ हुआ था, इसी की स्मृति की सामाजिक अभिव्यक्ति का पर्व है सबको एक रंग में रंगने वाला होली! वैदिक काल में होली ‘नवसस्येष्टि’ के रूप में मान्य थी। होली ऐसे समय में आती है, जब रबी की फसल में मटर और सरसों तैयार होती हैं।
किसान गुड़ पकाने में लगे होते हैं। चना, अरहर, मसूर अधपकी होती है। अलसी, जौ, गेहूं की कच्ची फसल खेतों में झूम रही होती है। भारतीय संस्कृति में नई फसल का कुछ अंश ईश्वर को अर्पित करने की परम्परा रही है, इसलिए तब अधपके अनाज को यज्ञ कुंड में समर्पित किया जाता था और सब कोई अधभुने अनाज (होला) का प्रसाद ग्रहण करते थे।
उत्तर वैदिक काल में आज की होली ‘मदनोत्सव’ का समापन थी। तब तक इसके साथ रंग जुड़ चुके थे। मदनोत्सव भी बसंत पंचमी से आरम्भ होता था। इसमें युवक-युवती पीले वस्त्रों में कामदेव की प्रतिमा के समक्ष नृत्य-गान करते थे। कामदेव की प्रतिमा पर अबीर-गुलाल समर्पित किया जाता था। इस अवसर पर युवक अपने जीवन साथी का चुनाव भी करते थे। कालिदास के लघु महाकाव्य ‘ऋतु संहार’ के बसंत सर्ग में इस पर्व का विशद और मनोहारी वर्णन उपलब्ध है।
कालिदास उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में स्थान रखते थे। विक्रमादित्य का शासनकाल 57 बीसी से 19 एडी के बीच था, इसलिए यह माना जा सकता है कि ‘बसंतोत्सव’ दो हजार साल पहले तक तो मनाया ही जाता था, बाद में भी लंबे समय तक भारतीय सांस्कृतिक जीवन में इसकी उपस्थिति बनी रही। क्योंकि तीसरी सदी के विद्वान राजा शूद्रक के चर्चित नाटक ‘मृच्छकटिकम’ में भी इस उत्सव का निर्धन ब्राह्मण चारुदत्त और गणिका बसंतसेना की प्रेमकथा के संदर्भ में उल्लेख मिलता है। समय के चक्र में इस परम्परा की कड़ी बहुत पहले कर्मकांड के स्तर पर हमसे छूट गई, लेकिन सैकड़ों साल के बीच कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि प्रकृति में मादकता और नवजीवन के संचार ने हमें होली का आमंत्रण न दिया हो। आजकल यह शांति निकेतन में ‘दोलोत्सव’ के रूप में पुन: मनाया जाने लगा है।
होली को ऋतु परिवर्तन का पर्व भी कहा गया है। प्राचीन काल में मानव जीवन पूर्णतया प्रकृति से जुड़ा था। तब मानव ऋतु परिवर्तनों का धूमधाम से स्वागत करता था। होली जब आती है, तो सर्दी के जाने और गर्मी के आने का संधिकाल होता है। यह पूरे परिवेश में नवजीवन, फूलों-कलियों की रंगीनी और महक, धीरे-धीरे उतरती गर्माहट से खुशहाली और उल्लास का संचार हो जाता है। प्रकृति के इस बदलाव के जश्न में हम रंगा-रंग होकर बसंत का स्वागत करते थे, होली मनाने की यह भी एक कड़ी है।
होली हम सदियों से मानते चले आ रहे हैं। समय के साथ परिवर्तन होना स्वभाविक है। आधुनिक व्यस्ततम जीवन में हम पांच सप्ताह की होली को जीवन में प्रतिष्ठित नहीं कर सकते। फाग मंडलियों का स्थान कैसेट और डीजे ने ले लिया है। चरकुला, कोलाटा, भागोरिया, गैर, गीदड़, झुमरी, गंवार मार, राई जैसे होली पर आयोजित होने वाले नाच के वीडियो उपलब्ध हैं। बाकी होली पर हम रंग-गुलाल खेलने में कोई कोताही नहीं करते हैं। आज लोग नंदगांव-बरसाना, हम्पी, काशी, उज्जैन के होलिकोत्सव का दर्शन करने के लिए अच्छा खासा खर्च करते हैं, यानी होली को लेकर हमारा लगाव काम नहीं हुआ है, बल्कि बढ़ गया है। किन्तु हम जिस सामूहिकता के भाव से, छोटे-बड़े का भेद मिटाकर, पारस्परिक मनोमालिन्य भूलकर, उल्लास और मस्ती के साथ होली का त्यौहार मानते थे। क्या यह सब हमारी होली में अब भी उपस्थित हैं? इसका उत्तर सिर्फ नकारात्मक ही होगा। यानी होली वह वाली जो हो ली, सामाजिक समरसता और लोक जीवन में समता के प्राण प्रतिष्ठा का पर्व था। हम अपने आचरण में पर्व के मूल भाव को प्रतिष्ठित करें तो वही सच्ची होली होगी और इसे हम आसानी से कर भी सकते हैं।

