- बढ़ता प्रदूषण बन रहा लोगों की जान का दुश्मन
- प्रदूषण विभाग ने कार्रवाई के नाम पर की सिर्फ खानापूर्ति
जनवाणी संवाददाता |
मोदीपुरम: वेस्ट यूपी में लगातार बढ़ता प्रदूषण लोगों की जान का दुश्मन बना हुआ है। प्रदूषण जहां दमा और अस्थमा के रोगियों की सांसों को थाम रहा है। वहीं इस प्रदूषण को बढ़ाने में अस्पतालों की भी अहम् भूमिका है। क्योकि अस्पतालों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों के चलते जहां महानगर में लगातार प्रदूषण में इजाफा हो रहा है। वहीं, अस्पताल संचालकों को प्रदूषण विभाग कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खाना पूर्ति करता हुआ दिखाई दे रहा है।
अगर प्रदूषण विभाग के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो विभाग अस्पतालों को रिनिवल कराने के लिए सिर्फ समाचार पत्र में प्रकाशन कराकर अपनी कार्रवाई को खत्म कर लेता है। विभाग द्वारा ऐसे अस्पतालों को चिह्नित कर उन्हे नोटिस जारी नही किया गया है। जो अधिक मात्रा में अपशिष्ट पदार्थ को रोजमर्रा के कूडेÞ-करकट में फेंक देते हैं। प्रदूषण विभाग के मुताबिक, महानगर में अस्पताल, चिकित्सकों के क्लीनिक और पैथोलॉजी लैब 1200 के लगभग है। यहां से अपशिष्ट पदार्थों को निकालने के लिए प्रदूषण विभाग की गाइड लाइन के अनुसार काम करना पड़ता है।
इसके लिए तीन कैटेगिरी शामिल की गई है। जिसमें रैड, ग्रीन और येलो शामिल है। यहां से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों को सिनर्जी वेस्ट मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की गाड़ियों द्वारा उठाया जाता है और अपशिष्ट पदार्थों को अलग कूडेÞे में रखा जाता है। जबकि घरों में प्रयोग होने वाले चिकित्सा से संबंधी अपशिष्ट पदार्थों को रोजमर्रा के कूडेÞ में डाल सकते हैं। उसके लिए नगर निगम की जिम्मेदारी होती है कि वह इन अपशिष्ट पदार्थों को इस कूड़े निकालकर अन्य कैटेगिरी के कू डेÞ में शामिल करें।
अस्पतालों में ये होने चाहिए मानक
अस्पतालों में कूड़ा-करकट अधिक तादाद में निकलता है। इसके लिए अस्पताल संचालकों को अस्पताल के बाहर ही बोर्ड लगाना पड़ता है। जिसमें कूडेÞ-करकट की कैटेगिरी होती है और अस्पताल द्वारा इस कैटेगिरी के अनुसार अपशिष्ट पदार्थो को उसमें रखा जाता है। अपशिष्ट पदार्थ अस्पतालों के बाहर रखे जाते है। जिन्हे कंपनी की गाड़ियां उठाकर ले जाती है।
देहात में हो रहा खुलेआम नियमों का उल्लंघन
देहात में अस्पताल संचालकों द्वारा नियम के मुताबिक काम नही किया जा रहा है। देहात क्षेत्रों में खुले क्लीनिक और पैथोलॉजी लैब के अपशिष्ट पदार्थों को घरों के कूडेÞ-करकट में ही डाल दिया जाता है। ऐसे में बीमारी और प्रदूषण का अंदेशा बढ़ जाता है।

