- अपने वतन लौटने लगे परिंदे, इस सीजन में करीब 10 हजार विदेशी मेहमानों से हस्तिनापुर सेंचुरी रही गुलजार
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: सर्दी का मौसम लगभग विदाई की ओर है, गर्मी की आहट के साथ ही हस्तिनापुर सेंचुरी में प्रवास कर रहे विदेशी परिंदों ने अपने वतन लौटना शुरू कर दिया है और इसके साथ ही परिंदें आ अब लौट चले…की तर्ज पर इस बार के शीतकालीन सीजन में करीब 10 हजार विदेशी परिंदों ने हस्तिनापुर सेंचुरी में प्रवास किया है। फरवरी के आखिर और मार्च की शुरुआत में हस्तिनापुर सेंचुरी में प्रवास करने वाले विभिन्न प्रजातियों के परिंदे अपने-अपने वतन लौटना शुरू हो जाते हैं। इस बार भी ठीक ऐसा ही हो रहा है।

फरवरी के आखिरी सप्ताह में मौसम में काफी परिवर्तन महसूस किया गया है। सर्दी की विदाई और गर्म मौसम की आमद के साथ ही परिंदों ने अपने-अपने देश लौटना शुरू कर दिया है। हालांकि इस क्रम की अभी शुरुआत है और सभी परिंदों को लौटाने में मार्च माह का समय लगने की संभावना है। नवंबर माह की आमद के साथ ही विभिन्न प्रजातियों के प्रवासी पक्षी हस्तिनापुर वन्य जीव विहार की बूढ़ी गंगा नदी की झील, भीमकुंड झील, जलालपुर जोरा समेत गंगा के दलदले टापुओं पर डेरा डाल लेते हैं। हर साल आने वाले यह विदेशी मेहमान यहां लगभग चार माह तक वातावरण को अपने कलरव से गुंजायमान करते रहते हैं।
विदेशी परिंदों की प्रजातियां में मुख्य रूप से पाइड एवोसेट, कोटन टील, गेडवेल, मलार्ड, नोर्दन स्वालर, नोर्दन पटेल, गागेर्नी, कामन पोचार्ड, टपटेड पोचार्ड समेत अन्य प्रवासी पक्षी शामिल होते हैं। बर्ड स्पेशलिस्ट डा. रजत भार्गव के अनुसार उन्होंने अपनी टीम के साथ चार बार हस्तिनापुर सेंचुरी पहुंचकर परिंदों की संख्या जानने का प्रयास किया। उनका अनुमान है कि इस बार करीब 10 हजार विदेशी परिंदे मेहमान बनकर हस्तिनापुर सेंचुरी क्षेत्र में पहुंचे हैं।

डा. रजत भार्गव का कहना है कि हर साल यहां पहुंचने वाले पक्षी भारी बर्फबारी वाले क्षेत्र पोलियरटिक यूरोप, मध्य एशिया व साइबेरिया आदि देशों से हजारों किलोमीटर का सफर तय करके आते हैं। इन देशों में सर्दी के मौसम में झीलें और समुद्र जम जाते हैं। वन विभाग के अनुसार विदेशी पक्षियों की पसंद का हर भोजन यहां झील में मौजूद रहता है। इस समय जैसे-जैसे मौसम गर्म होने लगा है, उसे देखते हुए परिंदे अपने देश लौटना शुरू हो गए हैं। अनुमान यही है कि मार्च माह में सभी परिंदे अपने-अपने वतन लौट जाएंगे।

