Sunday, March 29, 2026
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मुफ्त की रेवड़ियां कब तक?

Samvad 1

09 13दिल्ली में अगले दस दिनों में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो सकती है। सभी दलों ने प्रत्याशियों के ऐलान शुरू कर दिए हैं। इसी के साथ लोक लुभावन घोषणाएं भी शुरू हो चुकी हैं। तीन दिन पहले आम आदमी पार्टी सरकार ने आधी आबादी को अपने पक्ष में करने के लिए मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना का ऐलान किया है, जिसके तहत पहले हर महीने एक हजार रुपये देने की बात कही गई थी परंतु अब इसे बढ़ाकर इक्कीस सौ रुपये देने की घोषणा की गई है। वित्त विभाग की आपत्ति के बावजूद चुनाव के मद्देनजर यह ऐलान किया गया है, इससे साफ है कि भाजपा ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में लोकलुभावन योजनाओं से जिस तरह महिलाओं को अपने पक्ष किया उससे प्रेरित होकर ही अरविंद केजरीवाल दिल्ली में यह योजना लेकर आए हैं। सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ फ्री कर देने की यह आत्मघाती सोच कई राज्यों पर बहुत भारी पड़ती रही है। देश के करीब एक दर्जन राज्य कर्ज के जाल में ऐसे फंसे हुए हैं कि उबर ही नहीं पा रहे हैं। राजनीतिक दलों को लगता है कि इससे एंटी इन्कंबैंसी फैक्टर की तीव्रता को तो कम किया ही जा सकता है । एक बड़े वर्ग का वोट हासिल करके सत्ता में बने रहने या वापसी को भी वो सुनिश्चित कर सकते हैं।

मध्य प्रदेश में लाड़ली योजना ने बहुत बड़ा अंतर कर दिया था, ऐसा राजनीति के जानकारों का मानना है। कांग्रेस कहना था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने और उनके बाईस समर्थक विधायकों के बगावत कर देने से जिन स्थितियों में कमलनाथ सरकार का पतन हुआ, वह सीधे सीधे भाजपा की करतूत थी । बाद में सिंधिया को केन्द्र में मंत्री बनाकर पुरस्कृत किया गया और उनके साथी विधायकों को राज्य में बनी शिवराज सिंह चौहान सरकार में मंत्री पदों से नवाजा गया। कांग्रेस का मानना था कि इस तरह की राजनीतिक सौदेबाजी को आम जनता अनैतिक मानती रही है और जब भी विधानसभा चुनाव होंगे, वह अपनी नाराजगी का खुलकर अहसास करा देगी लेकिन लाड़ली बहना योजना ने बड़ा अंतर कर दिया। जो लोग मानकर चल रहे थे कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की वापसी होगी, उन्हें यह देखकर झटका लगा कि भाजपा ने वहां प्रचंड विजय हासिल कर ली है। छत्तीसगढ़ में महतारी योजना का भी सीधा असर महिला मतदाताओं पर दिखाई दिया। अधिकांश विष्लेषकों का मानना था कि भूपेश बघेल के नेतृत्व में अच्छा कार्य हुआ है और कांग्रेस वहां निरंतरता में दूसरी बार सरकार बना सकती है परंतु वैसा नहीं हुआ और भाजपा की वापसी हो गई। उस अविश्वसनीय लगने वाली शानदार जीत में महतारी योजना की अहम भूमिका मानी गई।

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले जून में लाड़की बहना योजना लाई गई, जिसमें पंद्रह सौ रुपये महीना देने का प्रावधान किया गया। इससे पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति को बड़ा झटका लग चुका था। अड़तालीस लोकसभा सीटों में से इकत्तीस सीटों पर इंडिया अलायंस के घटक दलों की सफलता मिली थी जबकि महायुति को मात्र सत्रह सीटों पर सफलता प्राप्त हो सकी । यह खतरे का संकेत था, इसलिए भाजपा ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का जीत का फामूर्ला वहां भी लागू करने का फैसला किया । नतीजा सबके सामने है । ऐसा नहीं है कि इन तीन राज्यों में भाजपा और सहयोगी जीते हैं तो उसकी एकमात्र वजह महिलाओं के लिए लागू की गई लोकलुभावन योजनाएं ही रही होंगी । निश्चित ही जीत के दूसरे कारक भी रहे होंगे परंतु हमने देखा है कि जब भी कोई फिल्म सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करती है, तब उसी तरह की विषय वस्तु ( फामूर्ले ) पर आधारित फिल्मों की बाढ़ सी आ जाती है। ऐसा लगता है कि भारतीय राजनीति को भी अब वही रोग लग गया है । दिल्ली में केजरीवाल इस योजना के जरिए महिलाओं के बल पर सत्ता विरोधी रुझान को कुंद करके वापसी के प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

2013 से आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता में है। अधिकांश समय वही मुख्यमंत्री रहे हैं । तिहाड़ से रिहाई की जो शर्तें सुप्रीम कोर्ट ने लगाई हैं, उनके कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा । सीएम बने रहते तो यह योजना लागू ही नहीं कर पाते, इसलिए आतिशी को मुख्यमंत्री बनाकर उन्होंने योजना लागू करने का ऐलान कर दिया। यह अलग बात है कि वित्त विभाग ने जल्दबाजी में लाई गई इस भारी भरकम खर्चे वाली योजना का विरोध किया है परंतु आतिशी सरकार इसे चुनाव की घोषणा से ठीक पहले घोषित करने का मन बना चुकी थी । केजरीवाल ने इसका ऐलान करते हुए कहा कि परिणाम आने और सरकार बनने पर ही इस जमीन पर उतारा जाएगा। जाहिर है, वह दिल्ली की आधी आबादी को संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि हर महीने इक्कीस सौ रुपये चाहिए तो आम आदमी पार्टी की फिर से सरकार बनवाइए। हाल ही में एक जन समुदाय को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री आतिशी भी यह कहते हुए देखी गई हैं कि हमें पता है कि आपको पानी के बहुत अधिक बढ़े हुए बिल मिले हैं । यह माफ किए जा सकते हैं परंतु इसके लिए फिर से हमारी सरकार बनना जरूरी है। दलों की यह ऐसी युति है, जिसके बल पर वह जनता को अपने पक्ष में मतदान के लिए विवश करते हैं।

अब इसके दूसरे पहलुओं पर गौर करते हैं। लोकलुभावन योजनाओं का सिलसिला देश में नया तो बिल्कुल भी नहीं है। दक्षिण के राज्यों से इसकी शुरूआत हुई थी। धीरे-धीरे इस लाइलाज दिखाई दे रहे रोग को लगभग सभी दलों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। कोई परिवार हो, घर हो, समाज हो, तहसील-जिला या प्रदेश हो, यदि वह सब कुछ मुफ्त में बांटने के रास्ते पर चल पड़ेगा तो भले ही उसके पास अच्छी-खासी पूंजी हो, जल्दी ही दरिद्रगी की स्थिति में पहुँच जाएगा। कर्ज लेकर घी पीने वाली कहावत आपने सुनी होगी। सत्ता में बने रहने अथवा पावर हासिल करने के लिए यदि आप सरकारी खजाने पर मुफ्त की रेवड़ियां बांटकर असहनीय भार डालने की नीति पर चल रहे हैं तो इससे किसी का भी भला नहीं होता। खजाने का पैसा जनता की जेब से ही वहां पहुंचता है तरह-तरह के टैक्स कलेक्शन से। जो पैसा विकास कार्यों पर खर्च होना चाहिए, वह यदि केवल और केवल वोट हटोरने के लिए खर्च किया जाए तो इसे कोई भी तर्कसंगत और सही नहीं ठहरा सकता।

देखने में आ रहा है कि कई राज्य आकंठ कर्ज के बोझ में दब गए हैं और उनके पास कर्मचारियों को समय पर वेतन-पेंशन देने तक के लिए पैसा नहीं रह गया है, ऐसे में यह ठहरकर सोचने समझने और पुर्नविचार करने का समय है। राज्यों पर कर्ज का बोझ सिर्फ राज्यों पर नहीं, देश पर भी बोझ होता है। देश के नागरिकों के सिर पर भी स्वत: बोझ होता है। आत्मघाती नीतियां हो सकता है कि किसी को क्षणिक सफलता दिला दे परंतु उसके दरगामी नतीजे बहुत खतरनाक होते हैं।

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