Saturday, December 4, 2021
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किसान आंदोलन खत्म हो तो कैसे?

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तीन विवादित कृषि कानूनों को रद्द करने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा से सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के विरोधी समूहों में जैसी सुखबोध की लहर दिखी, वैसा उल्लास आंदोलनकारी किसानों और उनके संगठनों में नहीं दिखा। उनकी प्रतिक्रिया इस एलान को सावधानी और संदेह के साथ देखने की रही। इसीलिए सरकार और उसके समर्थक जमातों की ये उम्मीद पूरी नहीं हुई कि इस घोषणा के बाद किसान प्रधानमंत्री को धन्यवाद देते हुए और उनका जयगान करते हुए घर वापस चले जाएंगे। चूंकि ये आस पूरी नहीं हुई, इसलिए इसके बाद भाजपा-आरएसएस के इकॉसिस्टम से जुड़े समूहों ने फिर से आंदोलनकारी किसान संगठनों को लांछित करने का अभियान छेड़ दिया है। कहा जा रहा है कि ये संगठन किसान हित के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक मकसद से आंदोलन पर उतरे थे और इसीलिए उन्होंने मांग मान लिए जाने के बावजूद आंदोलन जारी रखा है।
फिलहाल, मौजूदा किसान आंदोलन को चला रहे संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रधानमंत्री को लिखे एक खुले पत्र में अपनी छह मांगें सामने रखी हैं।

इनमें तीन मांगें अपेक्षाकृत पुरानी हैं। जबकि तीन मांगें साल भर से अधिक समय से चल रहे इस आंदोलन के दौरान पैदा हुए हालात से उभरी हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी के लिए कानून बनाना, बिजली विधेयक की वापसी, और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में होने वाले प्रदूषण के लिए पराली जलाने वाले किसानों को दंडित करने के प्रावधान खत्म करने की उनकी मांगें पहले से मौजूद रही हैँ।

जबकि किसान आंदोलन के दौरान मरे किसानों के परिजनों को मुआवजा, आंदोलनकारी किसानों पर दायर मुकदमों की वापसी, और यूपी के लखीमपुर-खीरी में अपनी गाड़ी से किसानों को कुचल देने के आरोपी के मंत्री पिता की बर्खास्तगी आंदोलन के दौरान जन्मीं मांगें हैं।

अब यहां यह याद करना उचित होगा कि 2017-18 में भी एक मजबूत किसान आंदोलन खड़ा हुआ था। मध्य प्रदेश के मंदसौर में पुलिस फायरिंग के बाद उस आंदोलन ने एक व्यापक रूप ले लिया था, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर संचालित करने के लिए ह्यअखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समतिह्ण का गठन हुआ था। एमएसपी की कानूनी गारंटी और किसानों की समग्र कर्ज माफी तब किसान आंदोलन की केंद्रीय मांगें थीं।

वह आंदोलन कितना बड़ा था, वह इससे ही जाहिर है कि पर्यवेक्षकों ने उसे आजादी के बाद सबसे व्यापक दायरे में फैला किसान बताया था। उसके बारे में राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह आमराय बनी थी कि 2019 के आम चुनाव में किसानों का असंतोष और उनके आंदोलन की मांगें प्रमुख नैरेटिव होंगे।

लेकिन पुलवामा-बालाकोट ने बात बदल दी। बहरहाल, पुलवामा-बालाकोट के परिणामस्वरूप भाजपा को 2014 की तुलना में भी कहीं ज्यादा बड़े बहुमत से लोक सभा चुनाव को जीतने में जरूर कामयाबी मिल गई, लेकिन उससे जमीनी हालात नहीं बदल गए।

कृषि और किसानों का संकट-जिसकी वजह से उनका आंदोलन खड़ा हुआ था- अपनी जगह कायम था। इसलिए देर-सबेर किसान आंदोलन का फिर नए रूप में उठना लाजिमी ही था। इसी बीच 2020 में कोरोना महामारी के बीच सरकार ने तीन कृषि कानून बना कर किसानों में जो कुछ बचा है, उसके भी छिन जाने की आशंका पैदा कर दी।

उससे मौजूदा आंदोलन खड़ा हुआ। उन कृषि कानूनों को वापस कराना किसानों के लिए जीवन-मरण का संघर्ष था। बिजली विधेयक को वापस कराना भी उनके लिए एक ऐसा ही मुद्दा है। इस विधेयक के कानून बनने का मतलब होगा कि बहुसंख्यक किसानों की पहुंच से बिजली का दूर होना, जबकि बिजली न सिर्फ उनके जीवन की बेहतर गुणवत्ता के लिए जरूरी है, बल्कि यह खेती-किसानी का एक अहम साधन भी है।

दूसरी तरफ जिस संकट में कृषि और किसान पहुंचे हुए हैं, उनसे उनके उबरने के लिए एमएसपी की गारंटी एक बुनियादी शर्त है। मूल रूप से चार साल पहले किसान इसी मांग के लिए आंदोलन पर उतरे थे। गौरतलब है कि आज के कृषि संकट के पैदा होने के लिए जिम्मेदार सरकार की नीतियां रही हैं।

ये नीतियां सिर्फ वर्तमान मोदी सरकार की नहीं हैं। हां, यह जरूर है कि मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद अचानक संकट को और गंभीर बना देने वाले कुछ कदम उठा लिए। इसीलिए उसके शासन काल के तीन साल पूरा होते-होते देश के विभिन्न राज्यों में किसान आंदोलन उठ खड़े हुए।

मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही अपने शहरी समर्थक वर्ग को खुश रखने के लिए मुद्रास्फीति (खास कर खाद्य मुद्रास्फीति) को कृत्रिम रूप से नियंत्रित रखने की नीति अपनाई। इसके तहत राज्य सरकारों को कृषि पैदावार पर बोनस देने से रोका गया, एमएसपी में समय के साथ उचित बढ़ोतरी नहीं की गई, और खाद, कीटनाशक, डीजल आदि जैसे कृषि इनपुट (साधन) की कीमत पर रहा-सहा सरकारी नियंत्रण भी खत्म कर दिया गया।

इस वजह से इन वस्तुओं के दाम तेजी से चढ़े, जिससे खेती और अभी अधिक अलाभकारी पेशा बन गई। नवंबर 2016 में लागू की गई नोटबंदी ने ग्रामीण इलाकों में नकदी के प्रवाह को अचानक रोक कर संकट को और भीषण बना दिया।
लेकिन कृषि क्षेत्र में संकट पहले से पैदा हो रहा था।

इसका कारण 1991 में अपनाई गई नव-उदारवादी नीतियां हैं। इन नीतियों के तहत कृषि इनपुट पर सब्सिडी में लगातार कटौती की गई, कॉरपोरेट सेक्टर को बीज, खाद और कीटनाशक का उत्पादन करने और उनकी बिक्री के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिस वजह से ये चीजें महंगी होती चली गईं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए फसल पैदावार को बढ़ावा दिया गया, जिससे किसानों में कर्ज लेकर कॉरपोरेट सेक्टर में बने पेंटेन्ट कराए जा चुके इनपुट के इस्तेमाल का चलन बढ़ा। उधर फसल नष्ट होने या बाजार के उतार-चढ़ाव के कारण किसान अधिक से अधिक कर्ज के जाल में फंसने लगे। उनमें आत्म-हत्या की घटनाएं बढ़ने लगीं। ये सब पहले से हो रहा था।

मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश में तेज रफ्तार से कटौती की, तो उससे समस्या अधिक तीखे ढंग से किसानों और ग्रामीण आबादी को चुभने लगी। उसकी वजह से किसान आंदोलन पर उतरे। कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन और अर्थव्यवस्था के लगभग ठहर जाने से सूरत अब और डरावनी हो चुकी है।

अपने शासन के शुरुआती वर्षों में सांप्रदायिक भावावेश, उग्र राष्ट्रवाद, और अन्य भावनात्मक मुद्दों से किसानों के बड़े हिस्से को बहकाए रखने में सत्ता पक्ष कामयाब रहा था। लेकिन अब जो परिस्थिति है, उसमें ऐसे तौर-तरीकों का कारगर बने रहना मुश्किल हो गया है।


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