- गूगल, कपूर, नागकेसर, ब्रह्मबूटी, कत्था और गूगल नाम का पेड़ है यहां
- ऐसा पेड़ फल-फूल आते ही हो जाती है जिसकी मौत
- 222 एकड़ का चौधरी चरण सिंह विवि परिसर
- बॉटनी विभाग के पास हैं 550 प्रजातियों के पौधे
- धरती पर पहला फल देने वाला पेड़ है यहां, तपोवन
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर के बॉटनी विभाग के पास जैव जैव विविधता का अनमोल खजाना है। पेड़ पौधों की भारत में मौजूद 18500 में से 550 प्रजातियां यहां हैं। यहां बटरफ्लाई गार्डन उत्तर भारत के सर्वश्रेष्ठ गार्डन में से एक है। यहां आकर आप देख सकते हैं धरती का पहला फल देने वाला पेड़। ऐसा पेड़ जिसका नाम गूगल है। ऐसा पौधा जिस फल फूल आते ही जिसकी मौत हो जाती है। ऐसा पेड़ जो वहीं उगता है जहां मिटटी के नीचे सोना दबा होता है।

याददाश्त बढ़ाने वाली ब्रह्मबूटी, पान में लगन वाला कत्था, कपड़े आदि में रखने के लिए इस्तेमाल होने वाले कपूर का पेड़।
बॉटनी विभाग के हेड प्रोफेसर विजय मलिक बताते हैं कि बटरफ्लाई गार्डन में देश विदेश से लाकर दुर्लभ पौधे सहेजे गए हैं। यहां मौजूद हर पेड़ की अपनी एक कहानी है। जब से यहां पेड़ पौधों की प्रजातियों की संख्या 500 के पार गई है तब से यहां तितलियों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

यहां बांस की विशेष प्रजातियां हैं जिनके झुरमुट की वजह से हिंदी उर्दू विभाग की ओर जाने वाले रास्ते का लुक बेहद शानदार हो गया है। बांस के पौधे पर जब फल या फूल आता है तो उसकी मौत हो जाती है। अधिकांश पौधे ऐसे हैं जिनमें औषधीय गुण हैं। ब्रह्मबूटी का प्रयोग याददाश्त बढ़ाने की औषधियों के बनाने में होता है।

जंगल जलेबी का फल जलेबी की तरह ही घुमावदार होता है। करौंदा अचार बनाने के काम आता है। चाइनीज शहतूत भी यहां मौजूद है। अर्जुन की छाल का प्रयोग अजुर्नारिष्ट बनाने में होता है। कपूर, गोल मिर्च पारस पीपल का पेड़ भी विशेष अहमियत रखता है। यहां केले और अदरक की भी विशिष्ट प्रजातियां सहेजी गई हैं।
मैग्नोलिया है सबसे पहले फल देने वाला पेड़
बटरफ्लाई गार्डन में मौजूद मैग्नोलिया को धरती पर सबसे पहले फल देने वाला पेड़ माना जाता है। जीवित जीवाश्म कहे जाने वाले जिंगोबाइलोबा की चीन में पूजा की जाती है।
महुए का बनता है पव्वा
गार्डन में महुए के पेड़ भी हैं। महुआ शराब बनाने के काम आता है। यहां लेमन ग्रास भी है और मीठा नीम यानि करी पत्ता भी है।
टच मी नॉट, किस मी नॉट, फोरगेट मी नॉट
प्रोफेसर मलिक बताते हैं कि आमतौर पर पौधे तीन तरह के होते हैं। पहला टच मी नॉट, यानि छुई मुई जैसे पौधे जो कहते हैं मुझे मत छुओ। किस मी नॉट यानि मुझे किस न करें वरना कांटा चुभ जाएगा। तीसरा फोरगेट मी नॉट यानि इनका फूल इतना सुंदर है कि एक बार देख लें तो भूल नहीं पाएंगे।
हरबेरियम-म्यूजियम में अद्भुत संग्रह
बॉटनी विभाग में वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उपयोग किए जाने वाले सरंक्षित पौधों के नमूनों और संबंधित डेटा का अद्भुत है। सूखे रूप में कागज की शीट पर लगाकर यह संग्रह किया गया है। यहां संग्रहालय में पांच हजार के आसपास जीवाश्म और स्पेसीमेन हैं। विभाग के पास दो लैब भी हैं।
पांच साल में 20 से ज्यादा पीएचडी
प्रोफेसर मलिक बताते हैं कि पांच साल में बॉटनी विभाग से 20 से ज्यादा पीएचडी अवार्ड हुई हैं। इस समय विभाग से अर्चस्वी त्यागी, विवेक कुमार, पूजा जैन, रितिका गोयल, अमन अग्रवाल शोध कर रहे हैं।
पांच साल में बेटियां ही रहीं टॉपर
बीते पांच साल में बॉटनी विभाग में बेटियों ने ही हर बार टॉप किया। छह में से पांच टॉपर बेटियां ही रहीं। पांचवे स्थान पर एक छात्रा और छात्र साथ-साथ रहे।
तपोवन में है जंगल का नजारा
विश्वविद्यालय परिसर का उत्तरी छोर अब्दुल्लापुर की जेल की चाहरदीवारी से सटा है। दारा सिंह कुश्ती स्टेडियम के आगे खेल का ग्राउंड है और सबसे अंत में शहीद मातादीन वाल्मीकि तपोवन है। शहीद मातादीन 1857 के क्रांतिकारी थे। इस जंगल में विभिन्न प्रजातियों के घने पेड़ हैं।
वॉकिंग ट्रैक है और मोर, कबूतर, कौवे, गिलहरी, सांप जैसे कई तरह की बड़ी छिपकलियां और अन्य जीव जंतु भी हैं। आप यहां टहल सकते हैं, लेकिन किसी जीव-जंतु को डिस्टर्ब न करें। सीसीएसयू के तपोवन में ये नजारा अपने आपमें वाकई अद्भुत है।

