
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले महीने शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के लिए कजाखस्तान की राजधानी अस्ताना में होंगे। पिछले कुछ हफ्तों में भारत-चीन संबंधों को लेकर मिले संकेत मिले-जुले रहे हैं। आस्ट्रेलिया द्वारा रणनीति में बदलाव से यह पता चलता है कि चीन के साथ व्यावहारिक सहयोग का रास्ता हो सकता है। चीन के साथ गलवान घाटी में हुई झड़प को चार साल पूरे हो चुके हैं। इसी घटना के बाद दोनों देशों के बीच संबंध खराब हो गए थे। अभी भी सीमा पर तनाव बना हुआ है। दोनों ही तरफ से 50 से 60 हजार सैनिक तैनात हैं। प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपने तीसरे कार्यकाल में चीन के साथ संबंधों को सुधारना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
एक रिपोर्ट के अनुसार दोनों नेता अस्ताना में हो रहे एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल तो होंगे, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि क्या दोनों के बीच मुलाकात होगी या नहीं। पीएम मोदी ने अप्रैल में न्यूजवीक मैगजीन को दिए इंटरव्यू में कहा था कि भारत के लिए, चीन के साथ संबंध महत्वपूर्ण और सार्थक हैं। जानकारों का मानना है कि हमें अपनी सीमाओं पर लंबे समय तक चले आ रहे गतिरोध को तत्काल सुलझाने की जरूरत है क्योकि भारत और चीन के बीच स्थिर और शांत संबंध सिर्फ दोनों देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र और दुनिया के लिए भी जरूरी हैं। मोदी ने कहा था कि मुझे उम्मीद है और भरोसा है कि हम अपनी सीमाओं पर शांति और स्थिरता बहाल करने और बनाए रखने में सक्षम होंगे।
भारत और चीन के बीच हालिया घटनाओं को लेकर विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत चीन के बातचीत के लिए तैयार हो सकता है लेकिन साथ ही खुद को मजबूत दिखाना जरुरी है है। यह नजरिया प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर के उन इंटरव्यू को आधार बनाता है जिनमें उन्होंने सीमा मुद्दे का समाधान निकालने की इच्छा जताई थी। साथ ही यह नजरिया ताइवान के साथ भारत के संबंध और दलाई लामा से मुलाकात को चीन को यह संदेश देने के तौर पर देखता है कि भारत इस क्षेत्र के अन्य देशों के साथ भी रिश्ते बनाने में सक्षम है पर कुछ जानकारों का मानना है कि भारत शायद बेहतर डील का इंतजार कर रहा है। यह नजरिया कहता है कि शुरुआत में भारत का लक्ष्य चुनाव के बाद जल्दी से सीमा मुद्दे का समाधान निकालना था लेकिन उम्मीद से कम सीटें जीतने के बाद सरकार सतर्क हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत शायद रिश्तों को सुधारने से पहले चीन से कुछ रियायतों का इंतजार कर रहा है।
हाल ही में एक कार्यक्रम में जब ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) से पूछा गया था कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक महीने के भीतर अपने चीनी समकक्ष से दूसरी मुलाकात की है। इसे कैसे देखते हैं आप? हमने यह भी जानना चाहा कि दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर पर भी वार्ता होने की खबरें हैं, क्या मोदी सरकार चीन से संबंध सुधारने की कोई पहल कर रही है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि अगर दोनों देशों के संबंध सुधरते हैं तो यह सिर्फ भारत और चीन के लिए ही नहीं बल्कि इस पूरे क्षेत्र के लिए अच्छी बात होगी। उन्होंने कहा कि लेकिन जैसा दिख रहा है या कहा जा रहा है, वह सब हकीकत में बदलना इतना आसान नहीं है क्योंकि ड्रैगन के खाने वाले दांत अलग हैं और दिखाने वाले अलग हैं। उन्होंने कहा कि वैसे यह अच्छी बात है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक महीने के भीतर दूसरी बार चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा बताया यह भी जा रहा है कि दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर पर भी हाल में वार्ता के दौर हुए हैं। उन्होंने कहा कि साथ ही यह भी पहली बार हुआ है कि एससीओ के सदस्य देशों के सुरक्षा अधिकारियों ने चीन में पहले संयुक्त आतंकवाद-रोधी अभ्यास में हिस्सा लिया है। उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में चीन के साथ संबंध सुधारने पर जोर दे रही है। लेकिन भारत सरकार अपने उस रुख पर अडिग है कि चीन को भारत के साथ पिछले समझौतों का पूर्ण सम्मान करना ही होगा।
जहां तक दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात की बात है तो लाओस में हुई इस मुलाकात के दौरान जयशंकर ने अपने चीनी समकक्ष वांग यी से साफ-साफ कह दिया कि भारत के द्विपक्षीय संबंधों में स्थायित्व लाने और पुनर्बहाली के लिए चीन को वास्तविक नियंत्रण रेखा तथा पिछले समझौतों का पूर्ण सम्मान सुनिश्चित करना ही होगा। उन्होंने कहा था कि भारत का कहना है कि जब तक सीमा क्षेत्रों में शांति नहीं होगी, चीन के साथ उसके संबंध सामान्य नहीं हो सकते। इस मुलाकात के बाद विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा है कि वापसी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए मार्गदर्शन दिए जाने की आवश्यकता पर सहमति बनी है। उन्होंने कहा कि उनके बयान में कहा गया है कि एलएसी और पिछले समझौतों का पूरा सम्मान सुनिश्चित किया जाना चाहिए। हमारे संबंधों को स्थिर करना हमारे आपसी हित में है। हमें वर्तमान मुद्दों पर उद्देश्य और तत्परता की भावना का रुख रखना चाहिए।
जयशंकर ने आसियान विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान वांग से मुलाकात के बाद सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट किया था कि सीपीसी (कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ चाइना) पोलित ब्यूरो सदस्य और (चीन के) विदेश मंत्री वांग यी से आज वियतनाम में मुलाकात की। हमारे द्विपक्षीय संबंधों को लेकर चर्चा जारी रही। सीमा की स्थिति निश्चित रूप से हमारे संबंधों की स्थिति पर प्रतिबिंबित होगी। हम आपको बता दें कि भारत का कहना है कि जब तक सीमा क्षेत्रों में शांति नहीं होगी, चीन के साथ उसके संबंध सामान्य नहीं हो सकते। वैसे जयशंकर और वांग के बीच वार्ता पूर्वी लद्दाख में सीमा विवाद जारी रहने के बीच हुई जो मई में अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर गया। जयशंकर ने कहा, ‘वापसी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए मार्गदर्शन दिए जाने की आवश्यकता पर सहमति बनी। एलएसी और पिछले समझौतों का पूरा सम्मान सुनिश्चित किया जाना चाहिए। हमारे संबंधों को स्थिर करना हमारे आपसी हित में है। हमें वर्तमान मुद्दों पर उद्देश्य और तत्परता की भावना का रुख रखना चाहिए।’
उधर, दोनों मंत्रियों की मुलाकात के बारे में विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि बैठक ने दोनों मंत्रियों को चार जुलाई को अस्ताना में अपनी पिछली बैठक के बाद से स्थिति की समीक्षा करने का अवसर दिया। मंत्रालय ने कहा, ‘उनकी बातचीत द्विपक्षीय संबंधों में स्थायित्व लाने और पुनर्बहाली के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से संबंधित शेष मुद्दों का शीघ्र समाधान खोजने पर केंद्रित थी।’ विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘दोनों मंत्री जल्द से जल्द सैनिकों की पूर्ण वापसी के लिए उद्देश्य और तत्परता के साथ काम करने की आवश्यकता पर सहमत हुए। सीमाओं पर शांति तथा एलएसी के प्रति सम्मान द्विपक्षीय संबंधों में सामान्य स्थिति के लिए आवश्यक है।’ विदेश मंत्रालय ने कहा, दोनों पक्षों को अतीत में दोनों सरकारों के बीच हुए प्रासंगिक द्विपक्षीय समझौतों, प्रोटोकॉल और समझ का पूरी तरह से पालन करना चाहिए।’


