पं. पूरन चंद जोशी
सनातन धर्म में राम नवमी का महत्व अत्यंत विशेष है। राम नवमी सत्य, धर्म, मर्यादा और आदर्श जीवन के सिद्धांतों का उत्सव है। इस दिन भारतवर्ष में भक्ति और उल्लास का वातावरण देखने को मिलता है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है, घरों में भगवान श्रीराम की आराधना की जाती है और भक्तजन रामायण, रामचरितमानस तथा रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करते हैं। इस दिन भक्त भगवान राम के बालरूप की पूजा करते हैं और उनका जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।
पंचांग के अनुसार इस वर्ष राम नवमी का पावन पर्व 26 मार्च को मनाया जाएगा। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 26 मार्च को सुबह 11 बजकर 48 मिनट पर प्रारंभ होगी और 27 मार्च को सुबह 10 बजकर 6 मिनट पर समाप्त होगी। राम नवमी का मध्याह्न काल 26 मार्च को सुबह 11 बजकर 27 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 54 मिनट के बीच होगा। राम नवमी पर भगवान श्रीराम की पूजा के लिए मध्याह्न काल को विशेष महत्व दिया जाता है, कहा जाता है कि भगवान राम का जन्म मध्याह्न काल में ही हुआ था।
राम नवमी सनातन धर्म में धर्म की सत्य की स्थापना का प्रतीक पर्व है। इस दिन अयोध्या नगरी में राजा दशरथ के घर भगवान विष्णु ने राम रूप में जन्म लिया था। शास्त्रों के अनुसार जब पृथ्वी अधर्म, अत्याचार और राक्षसी शक्तियों से पीड़ित हो गई थी, तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ के निर्देशानुसार पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ की समाप्ति के बाद यज्ञकुंड से दिव्य खीर प्रकट हुई। कुंड से प्राप्त खीर को राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को वितरित का दी। इसी खीर के प्रभाव से समय आने पर चार दिव्य पुत्रों का जन्म हुआ, जिन्हें श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के नाम से जाना गया।
भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। इसका अर्थ है वह पुरुष जो जीवन की मर्यादाओं और धर्म के नियमों का सर्वोत्तम पालन करता है। उन्होंने अपने जीवन में एक पुत्र, एक भाई, एक पति, एक मित्र और एक राजा के रूप में ऐसे आदर्श स्थापित किए जो युगों-युगों तक मानवता के लिए प्रेरणा बने रहेंगे।
श्री राम, हिंदू धर्म में विष्णु के 7वें अवतार और ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ हैं, जिनका जन्म अयोध्या में राजा दशरथ और रानी कौशल्या के घर हुआ था। वे सत्य, धर्म और आदर्शों के प्रतीक हैं। अपने पिता के वचन पालन हेतु 14 वर्ष का वनवास काटा, रावण का वध कर सीताजी को मुक्त कराया और आदर्श रामराज्य की स्थापना की। भगवान राम को अपने माता पिता का सम्मान करने के लिए जाना जाता है। भगवान राम अयोध्या के राजा दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे। इसके बावजूद पिता का आदेश मिलने पर उन्होंने राजगद्दी का मोह नहीं किया। बिना कोई क्षण गंवाए उन्होंने अयोध्या नगरी का त्याग कर दिया और राजपाट छोड़कर 14 वर्ष के वनवास चले गए। वनवास के दौरान उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
लेकिन कभी भी उन्होंने अपना धैर्य नहीं खोया। हमारे जीवन में भी हमें कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में हमें भगवान राम का अनुशरण करते हुए शांत और संयमित आचरण वाला व्यवहार करना चाहिए। इससे हम जीवन में आने वाले तूफानों से आसानी से निपट सकते हैं। धैर्यशीलता का पाठ भगवान राम धैर्य के एक शानदार उदाहरण हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी भी धैर्य नहीं खोया। जिस प्रकार भगवान राम ने धैर्य का परिचय दिया था, उस प्रकार हर व्यक्ति को जीवन में धैर्यपूर्वक रहना चाहिए। निष्ठा और भक्ति भगवान श्री राम जी के भीतर निष्ठा और भक्ति भी देखने को मिलती है। उनका मां सीता के साथ रिश्ता निष्ठा और भक्ति का प्रतीक है। इन गुणों को अपने भीतर आत्मसात करने से संबंधों की नींव और भी ज्यादा मजबूत हो सकती है।
भगवान श्री राम जी एक आदर्श बेटा और पति होने के साथ ही एक आदर्श भाई भी थे। उन्होंने सदैव अपने भाई को अपने साथ रखा। साथ ही अगर मित्रता की बात करें तो भगवान राम की सुग्रीव और विभीषण के साथ मित्रता अतुलनीय है। भगवान राम ने अपने मित्रों के साथ एक आदर्श मित्र का उदाहरण पेश किया है। त्रेतायुग में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) के रघुकुल (इक्ष्वाकु वंश) में हुआ। परिवार पिता दशरथ, माता कौशल्या, और तीन भाई—भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न। पत्नी माता सीता, लक्ष्मी जी का अवतार। गुरु महर्षि वशिष्ठ। अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त की। राजा जनक की पुत्री सीता के साथ सीता-स्वयंवर में शिव धनुष तोड़कर विवाह किया। माता कैकेयी के वचन के कारण, पिता की आज्ञा से 14 वर्ष के लिए वन गए।
रावण द्वारा सीता का अपहरण, हनुमानजी और वानर सेना की मदद से लंका पर विजय और रावण का वध। अयोध्या लौटकर राजा बने और ‘रामराज्य’ यानी न्यायसंगत शासन की स्थापना की। पुत्र लव और कुश। श्री राम जी ने पुत्र, भाई, पति और राजा के रूप में आदर्श स्थापित किए। उनके जीवन पर आधारित वाल्मीकि रचित ‘रामायण’ और तुलसीदास कृत ‘श्री रामचरितमानस’ प्रमुख ग्रंथ हैं।
राम नवमी के दिन भक्त विशेष रूप से मध्यान्ह काल में भगवान श्रीराम की पूजा करते हैं। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद सूर्य देव को तांबे के लोटे से जल, अक्षत और सिंदूर डालकर अर्घ्य दें। घर के पूजा स्थान पर एक चौकी रखकर उस पर पीला कपड़ा बिछाएं। इसके बाद भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें भगवान का आह्वान करें और गंगाजल से स्नान कराकर चंदन, पीले पुष्प, वस्त्र और आभूषण अर्पित करें। इसके बाद भगवान को खीर, केसर भात, पंजीरी और मिठाइयों का भोग लगाएं। भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल करें। पूजा के दौरान राम नाम का जाप करें और यथा संभव रामचरितमानस, रामायण तथा रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करें। अंत में दीपक, धूप और कपूर से भगवान की आरती उतारें। भगवान श्रीराम जी के चरणों में नतमस्तक होकर प्रणाम करें। ग्लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं। कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ अर्थात जो समस्त लोकों को आनंद देने वाले हैं, युद्धभूमि में अत्यंत धैर्यवान और वीर हैं, जिनकी आंखें कमल के समान सुंदर हैं, जो रघुवंश के स्वामी हैं, जो करुणा के स्वरूप और दया के सागर हैं; ऐसे श्रीरामचन्द्र जी की मैं शरण ग्रहण करता हूं।

