जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के दो पदाधिकारियों के खिलाफ मुंबई पुलिस की ओर से जारी तड़ीपार (इलाके से बाहर करने) के आदेशों को रद्द कर दिया। पुलिस के आदेश के तहत दोनों लोगों को एक साल के लिए मुंबई से बाहर रहने को कहा गया था। यह मामला फिरोज अब्दुल खान बनाम महाराष्ट्र सरकार और अन्य से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी प्राथमिकी के आधार पर जारी किए गए तड़ीपार आदेश कानूनी कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
जस्टिस जामदार ने कार्रवाई पर उठाए सवाल
जस्टिस माधव जामदार ने कहा कि जिन प्रदर्शनों को आधार बनाकर कार्रवाई की गई, उनमें अन्य राजनीतिक दलों के लोग भी शामिल थे। ऐसे में केवल कुछ लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि प्राथमिकी में कई राजनीतिक दलों का जिक्र है, लेकिन कार्रवाई केवल याचिकाकर्ताओं तक सीमित रखी गई। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या कांग्रेस या शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) के कार्यकर्ताओं के खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई की गई? जस्टिस जामदार ने कहा कि कानून का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से नहीं किया जा सकता और किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल उसकी राजनीतिक या वैचारिक स्थिति के आधार पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
बाबरी मस्जिद मुद्दे पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने बाबरी मस्जिद से जुड़े विरोध प्रदर्शन को तड़ीपार आदेश का आधार बनाए जाने पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि यह विचार रखना कि “अयोध्या में बाबरी मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था” राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता। किसी भी नागरिक को किसी मुद्दे पर अपनी राय रखने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की धारणा या विचार को केवल इसी आधार पर राष्ट्रविरोधी नहीं माना जा सकता।
तीन प्राथमिकी के आधार पर हुई थी कार्रवाई
याचिकाकर्ता फिरोज अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी ने 3 दिसंबर 2025 को जारी तड़ीपार आदेश को चुनौती दी थी। मुंबई पुलिस ने यह आदेश 2024 और 2025 में दर्ज तीन प्राथमिकी के आधार पर जारी किए थे। इनमें वक्फ विधेयक को लेकर हुए प्रदर्शन, चेंबूर-गोवंडी क्षेत्र में सीमेंट गोदामों से होने वाले वायु प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन और बाबरी मस्जिद मुद्दे से जुड़े विरोध प्रदर्शन शामिल थे।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं के वकील इब्राहिम हरबत ने दलील दी कि महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 के तहत तड़ीपार की कार्रवाई के लिए ठोस आधार जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि केवल प्रदर्शन या नारेबाजी के आधार पर यह साबित नहीं होता कि संबंधित व्यक्ति से जनता या संपत्ति को खतरा है। सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने भी कहा कि प्राथमिकी में केवल नारे लगाने का उल्लेख है। इनमें किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने या सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने की बात दर्ज नहीं है।
PFI संबंधों के आरोप पर कोर्ट ने क्या कहा?
सरकार की ओर से पेश मुख्य सरकारी वकील शिशिर हिरे ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ताओं के प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से कथित संबंध रहे हैं। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने इन आरोपों को खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि ये आरोप कारण बताओ नोटिस का हिस्सा नहीं थे, इसलिए इन्हें तड़ीपार आदेश को सही ठहराने के लिए आधार नहीं बनाया जा सकता।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि प्रदर्शन के दौरान याचिकाकर्ताओं के व्यवहार से सामाजिक तनाव और कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो सकती थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि केवल आशंका के आधार पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
मौलिक अधिकारों की रक्षा जरूरी: हाईकोर्ट
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को क्षेत्र से बाहर करने की कार्रवाई एक असाधारण कदम है, क्योंकि इससे उसके आवागमन की स्वतंत्रता प्रभावित होती है। कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकारों को केवल कानूनी प्रक्रिया और ठोस आधार के अनुसार ही सीमित किया जा सकता है। जिन मामलों की जांच अभी जारी है, उन्हें मात्र आधार बनाकर किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने अपने पुराने आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें SDPI के एक अन्य पदाधिकारी के खिलाफ जारी तड़ीपार आदेश को रद्द किया गया था। अदालत ने कहा था कि ऐसी कार्रवाई व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करती है और केवल सरकार की नीतियों के विरोध के आधार पर इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने आदेश किए रद्द
सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों SDPI पदाधिकारियों के खिलाफ जारी तड़ीपार आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं। अदालत ने पुलिस के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया।

