- तिरंगा बनाने वाले परिवार की हालत बदतर, गरीबी की पड़ रही मार
- गांधी आश्रम से नहीं मिलता ठेका, पुरानी दरों पर बनवाते हैं तिरंगा
- लालकिला पर पहली बार फहरा तिरंगा सुभाष नगर में बना था
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: तिरंगा आन है मेरी, तिरंगा शान है मेरी, तिरंगा जान है मेरी। अपने वतन के लिए हाजिर जान है मेरी।…पढ़ते पढ़ते रमेश चंद्र की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। वह अपनी खताएं पूछने लगे और हम बेबस लाचार बनकर उनकी आंसुओं को थामने लगे। मगर, आंसू ऐसे निकल रहे थे जो थमने का नाम ही नहीं ले रहे। रमेश चंद की रग रग में राष्ट्रभक्ति का वह खून बह रहा है, जो अपने देश की गौरवगाथा और विरासत को मुफलिसी की हालत में संभाले हुए जिंदगी से संघर्ष कर रहे हैं।
बता दें कि जब देश आजाद हुआ और लालकिले की प्राचीर से प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा फहराया था। इस तिरंगे का मेरठ से गहरा नाता है, आजादी के बाद लालकिले पर फहराया जाने वाला पहला तिरंगा मेरठ से ही गया था, लेकिन इस झंडे को नत्थे सिंह ने तैयार किया था। नत्थे सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं मगर उनकी विरासत को उनके पुत्र रमेश चंद ने संभाल रखा है। शासन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के चलते रमेश चंद का परिवार आज भी मुफलिसी की जिंदगी जीने को मजबूर है।

सुभाषनगर निवासी रमेश चंद का परिवार गांधी आश्रम से तिरंगा तैयार करने का ठेका लेता है। रमेश चंद बताते हैं कि 1947 में देश आजाद हुआ और लालकिले पर जो तिरंगा फहराया गया वह उनके पिता नत्थे सिंह ने ही तैयार किया था। अब तिरंगे तैयार करने का ठेका कम हो गया है, उनका पूरा परिवार इस काम में लगा है, लेकिन अब आमदनी न के बराबर है। महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले तिरंगे के लिए मिलने वाली मजदूरी उतनी ही है, जितनी पहले थी।
झंडे की साइज के मुताबिक जो मजदूरी मिलती है। वह 12, 14, 16 व 18 रुपये प्रति पीस है। वहीं, अगर बड़ा झंडा जिसे दो गज का कहा जाता है। उसके केवल 10 पीस ही एक दिन में तैयार हो पाते हैं। रमेश की दो बेटियां हैं, पत्नी बीमार रहती हैं उन्हें रसौली है। जिसके लिए आयुष्मान कार्ड से इलाज कराने पहुंचे तो डाक्टरों ने इतने महंगे टेस्ट लिख दिये, जो उनकी क्षमता से बाहर है।
आयुष्मान कार्ड में नाम सही होगा ही नहीं
रमेशचंद की पत्नी का नाम आयुष्मान कार्ड में गलत हो गया है। दौड़ते दौड़ते थक गए हैं कोई अधिकारी सुनवाई करने को तैयार नहीं है। हेल्थ विभाग के एक अधिकारी ने साफ साफ मना कर दिया।
अभी तक नहीं पीएम योजना से मकान
रमेश चंद ने बताया कि उनका अपना मकान नहीं है, प्रधानमंत्री आवाास योजना का फार्म भरा था, लेकिन अभी तक नहीं मिला है। कोई कुछ बताने या मदद करने को तैयार नहीं है सुनवाई करना तो दूर की बात है। ई-श्रम कार्ड भी बनवाया है, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ इसी तरह श्रम विभाग से भी कार्ड बनवाया, लेकिन कोई मदद नहीं मिली।
1947 से अब तक नहीं मिला कोई सम्मान
वार्ड के निगम पार्षद से लेकर सांसद तक किसी भी जनप्रतिनिधि ने मदद तो सपने की बात है किसी ने 26 जनवरी और 15 अगस्त पर बुलाकर सम्मानित करने तक की बात नहीं सोची। जनप्रतिनिधियों ने अपनी विरासत को कभी सम्मान देने की भूल नहीं की। क्योंकि यह रास्ता देश और राष्ट्रभक्ति का है। यहां से वोटबैंक का रास्ता नहीं बनता। सवाल उठता है कि क्या कुंभकर्णी नींद में सोए जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की जमीर जागेगी। क्या शासन स्तर पर रमेश चंद की सुनवाई सरकार करेगी।

