Wednesday, March 25, 2026
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गर्मी में बढ़ रहा लोड, हो रही कटौती, विद्युत विभाग तैयार नहीं

  • ग्रामीण क्षेत्र में 48 घंटे, टॉऊन में 10 व शहर में छह घंटे में बदले जाएं ट्रांसफार्मर
  • खत्म हो चुकी उम्र वाले ट्रांसफार्मरों से लिया जा रहा काम

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: गर्मी के मौसम में तापमान बढ़नें के साथ विद्युत उपभोक्ताओं का लोड भी बढ़ जाता है। ऐसे में लाइनों से लेकर ट्रांसफार्मरों में फाल्ट आने लगते है। इस समस्या से निपटने के लिए ऊर्जा विभाग हर साल तैयारी करता है लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं होता।

इसके पीछे की वजह बेहद गंभीर है क्योंकि पहले तो विद्युत विभाग निजी कंपनियों से ट्रांसफार्मर लेता था, उन्हीं से मेटेनेंस कराता था लेकिन अब अपनी खुद की वर्कशॉप में मेटेनेंस से लेकर सभी कार्य होता है। लेकिन वर्कशॉप में संसाधनों के आभाव में ट्रांसफार्मरों का रखरखाव ठीक से नहीं हो रहा है। जबकि विद्युत विभाग खुद को तैयार बता रहा है।

पूरे जिले में कहीं भी ट्रांसफार्मर खराब होने पर उसे बदलने के लिए अलग-अलग समय सीमा तय है। जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में 48 घंटे, कस्बों 10 घंटे और शहरी क्षेत्र में छह घंटे में फुंके हुए ट्रांसफार्मर को बदला जाना चाहिए। इसके लिए गर्मी के मौसम के शुरू होने से पहले ही विभाग तैयारी कर लेता है। पहले से ही ट्रांसफार्मरों को बदलने के लिए बड़ी संख्या में ट्रांसफार्मर तैयार रखे जाते है।

लेकिन इस समय जिन ट्रांसफार्मरों को खराब ट्रांसफार्मरों से बदलनें के लिए रखा गया है उनकी उम्र पूरी हो चुकी है। विश्वसनीय जानकारों ने बताया एक ट्रांसफार्मर यदि तीन बार रिपेयर हो चुका है तो उसकी अवधि पूरी हो जाती है। लेकिन वर्कशॉप में ऐसे ट्रांसफार्मरों की संख्या अच्छी खासी है जिन्हें दस बार तक रिपेयर किया जा चुका है। सचिव ऊर्जा निगम के सख्त आदेश है कि इस बार गर्मियों के मौसम में उपभोक्ताओं को निर्बाध विद्युत आपूर्ती होनी चाहिए।

ट्रांसफार्मरों को फुंकने से बचाना जरूरी है, क्योंकि यह काफी महंगे होते है। लेकिन संसाधनों के आभाव में विद्युत विभाग कैसे इन ट्रांसफार्मरों को खराब होने से बचाएगा यह बड़ा सवाल है। ऊर्जा विभाग की वर्कशॉप विक्टोरिया पार्क के सामनें है जहां खराब हुए ट्रांसफार्मरों की मेटेनेंस की जाती है। पहले यह निजी कंपनियों से कराई जाती थी लेकिन अब इसकी जिम्मेदारी विभाग को ही दी गई है।

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लेकिन इसके लिए वर्कशॉप में संसाधन नहीं है। पहले विभाग निजी कंपनियों से ट्रांसफार्मर रिपेयर कराता था लेकिन अब यह अपनी वर्कशॉप में ही कराए जा रहें है। ऐसे में वर्कशॉप में उचित रिपेयरिंग मेटिरीयल नहीं होने की वजह से रिपेयर किए गए ट्रांसफार्मरों की विश्वसनियता पर सवाल उठ रहे है। मिली जानकारी के अनुसार निजी कंपनी से रिपेयर होकर आनें वाला ट्रांसफार्मर अपनी क्षमता से डेढ़ गुना ज्यादा लोड उठाने लायक होता है। लेकिन सीटीआर (वर्कशॉप) में रिपेयर हुए ट्रांसफार्मर आधा भी लोड उठाने में नाकाम साबित हो रहे है।

इन चीजों की पड़ती है मेटेनेंस में जरूरत

एक ट्रांसफार्मर को रिपेयर करने के लिए आॅयल, कॉपर, वाइडिंग वायर मिलाकर करीब 50 चीजों की जरूरत होती है। लेकिन ऊर्जा निगम की वर्कशॉप में अच्छी क्वालिटी व पूरी मात्रा में रिपेयरिंग के लिए जरूरी समान का आभाव है। यदि निजी कंपनियों में और सरकारी वर्कशॉप में रिपेयर किए गए ट्रांसफार्मरों को एक ही लोड पर लगाया जाए तो निजी कंपनी से ठीक हुए ट्रांसफार्मर ज्यादा लोड उठाएंगे, जबकि वर्कशॉप वाले पूरा लोड पड़ने से पहले ही खराब हो जाते है।

बिजलीघरों के जूनियर इंजीनियरों पर है दबाव

कई जूनियर इंजीनियरों ने पहचान छिपाने की शर्त पर बताया उनपर शासनादेश का पालन करने का दबाव है। किसी भी बिजलीघर के क्षेत्र में कोई भी ट्रांसफार्मर खराब नहीं होना चाहिए। साथ ही फुंके हुए ट्रांसफार्मर को समय पर बदलना जरूरी है। लेकिन जब संसाधन ही नहीं होगें तो कैसे इन बातों का पालन किया जा सकता है। जल्दी फाल्ट होने पर जेई पर कार्रवाई होने का भी दबाव है।

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