Sunday, March 22, 2026
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मॉल संस्कृति में उलझा भारतीय उपभोक्ता

Nazariya


RAJENDRA KUMAR SHARMAहाट से मॉल कल्चर तक के सफर को हमने एक लंबे समय में तय किया है। याद करिए वो समय जब अलग-अलग समान के लिए हमें अलग- अलग दुकानों पर जाना पड़ता था। धीरे-धीरे दुकानों की जगह सुपर बाजार या सुपरमार्केट ने ली जो हमारे जमाने के जनरल स्टोर की तरह होता था, जिसमें घर की सभी छोटी-मोटी चीजें एक ही जगह पर मिल जाती थीं। धीरे-धीरे ये ही सुपर बाजार ही मॉल में परिवर्तित हो गए। मॉल कल्चर वास्तव में लोगो की मानसिकता को ध्यान में रखकर लाया गया है। मॉल को पूरी तरह से लोगों के आकर्षण का केंद्र बनाकर ही इसकी योजना की गई है। मॉल के बाहर ही खाने-पीने की स्वादिष्ट गर्म, ठंडे, चटपटे व्यंजन ग्राहक को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। मॉल अपने नाम के अनुसार हर छोटी चीज को बड़ा और ग्लैमर के साथ दिखाता है। यहां तक कि अपने नाम को भी बड़े बड़े अक्षरों में अंकित करवाता है ताकि लोग दूर से पढ़ सकें और जान सकें कि यहां आसपास कोई मॉल है।x

एक और महत्वपूर्ण बात जिस पर कम ही लोग गौर करते हैं, वो है मॉल में समय देखने के लिए घड़ी न होना। कोई भी मॉल मे घड़ी नहीं होती है। इसका कारण है ग्राहक को समय की बंदिशों से दूर ले जाना, ताकि आप जब भी मॉल में जाएं तो आपको समय का आभास ही न हो और आप शॉपिंग करना तब तक जारी रखें, जब तक आपकी जेब खाली न हो जाए। कभी अनुभव कीजिए, अगर आपको सौ रुपये का सामान लेना है तो आप मॉल में हजार रुपये खर्च करके आ जाते हैं। आप ऐसे समान भी खरीद लेते हैं, जिसकी आपको जरूरत नहीं होती पर उस पर लिखे कम मूल्यों को देखकर आप थोड़ा लालच में आ जाते हैं और ये सोचकर खरीद लेते हैं कि भविष्य में काम आएगी। अर्थात आप अपनी एक नई जरूरत भविष्य के लिए तैयार कर लेते हैं। जो आज तक आपकी जरूरी चीजों की सूची में नहीं थी।

मॉल कैसे ग्राहक को जेब से पैसा निकालते हैं और कैसे 100 रुपए की वस्तु को 200 रुपए में बेच देते हैं या आप खरीदने एक पेंट जाते हैं, जबकि खरीद के 3-3 पेंट शर्ट आते हैं। इसे भी समझने की जरूरत है। कोई सामान आपको बाजार मे 400 रुपये में मिल सकता है। मॉल में उसकी कीमत 1000 रुपये दर्शाई जायेगी। साथ ही उस पर एक 50 प्रतिशत छूट का टैग लगा दिया जाएगा। इससे उसकी कीमत 500 रुपये हो जाएगी। आप छूट के इस जाल में आसानी से आ जाएंगे। इसी प्रकार एक वस्तु खरीदो तो एक फ्री पाओ या तीन पेंट या शर्ट खरीदो बदले में 2 पेंट या शर्ट फ्री पाओ। कुछ ऐसे टैग देखकर कोई भी व्यक्ति आसानी से जाल में फंस जाए और होता भी यही है। ग्राहक समझ ही नहीं पाता है कि कोई भी ब्रांड अपनी चीजें फ्री में नहीं देता और बिना मुनाफे के भी नहीं देता है। मॉल के इस कल्चर से ब्रांड को मुनाफा तो होता ही है साथ ही उसकी सेल में वृद्धि होती है। क्योंकि एक शर्ट की जगह दो शर्ट खरीदी जाती हैं। इस प्रकार यह सामानों की बिक्री की एक विपणन नीति होती है, जिसमें उच्च स्तरीय मंहगे सामानों को सस्ते में खरीदने की लोगों की मानसिकता का लाभ उठाया जाता है। इसीलिए मॉल कल्चर लोगों को खर्चीला बना रहा है। और लोग भी स्टेटस के नाम पर आंख मिचकर पैसे खर्च कर देते हैं। रही सही कसर क्रेडिट कार्ड देकर बैंक प्रणाली ने पूरी कर दी। जेब में पैसा नही है, तब भी कोई चिंता की बात नहीं। प्लास्टिक मनी आपको ‘आज खर्चों, कल भरो’ का आॅप्शन देती है। पर कितना खर्चों, इसकी मॉल में जाने के बाद कोई सीमा नहीं होती।

भारत, आध्यात्मिकता और रहस्यवाद की भूमि है ।विकास के लिए तत्पर है। मॉल संस्कृति इसका एक छोटा सा उदाहण है। ये कमर्शियल भवन न केवल अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के लिए युद्ध का मैदान बनते हैं, बल्कि लोगों को अपने स्वयं के मानस और मूल्य प्रणाली के साथ कुश्ती करने के लिए भी प्रेरित करते हैं। उपभोक्तावाद और खुदरा क्रांति की अस्थिर धारा में बहकर, आम आदमी को पूरी तरह से निहत्था बना दिया जाता है। उसे वह लेने के लिए तैयार किया जा रहा है, जिसे वास्तव में ‘मीठा जहर’ कहा जाना कोई अतिशयोक्ति न होगी। जो एक तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है, लेकिन दूसरी तरफ मर्यादाओं का पालन नहीं करने पर दैनिक जीवन से आनंद और निश्चिंतता को चुरा लेता है।

बिना किसी संदेह के, हम यह कह सकते हैं कि मॉलों ने भारतीयों की खरीददारी के अनुभव को पूरी तरह से बदल दिया है। सूरज की तेज गर्मी में खरीददारी करने के स्थान पर अब लोग मॉलों के अन्दर एसी में रहकर शॉपिंग करना अधिक पसन्द करते हैं। युवा इन्हें एक प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में देखते हैं। मॉलों में खरीदारी करने से, ग्राहकों की, बेहतर गुणवत्ता वाले ब्रांडेड उत्पादों को खरीदने की इच्छा पूरी हो जाती है, जिससे उन्हें संतुष्टि मिलती है। कुछ किशोर दिखावे के लिए भी मॉलों में जाते हैं। निश्चित रूप से शॉपिंग मॉलों ने भारत में एक नई संस्कृति को जन्म दिया है, जो कि खरीदारी से संबंधित हमारी पारंपरिक संस्कृति से बिल्कुल अलग है। भारत, आय में वृद्धि होने के कारण बाजार के क्षेत्र में लोगों को कार्य करने के अत्यधिक अवसर प्रदान कर रहा है, जिससे मध्यम वर्ग के परिवारों की जीवन शैली में काफी सुधार और बदलाव आया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में बने सभी मॉलों ने उपभोक्ताओं की जीवन शैली को पूरी तरह से बदलने का कार्य किया है तथा फुटकर क्षेत्र को और अधिक संगठित करने में मदद की है परंतु लोगों का ज्यादा खर्चीला होना, उनके भविष्य को असुरक्षित बनाता है, जो किसी भी देश के लिए शुभ संकेत नहीं माने जा सकते।


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