Sunday, March 29, 2026
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भारतीय संस्कृति में प्रधानता रही है यज्ञ की: डॉ. आरके सिंह

जनवाणी संवाददाता |

मोदीपुरम: “नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वी के जो भी नेता है, उन पितरों को हमें प्रणाम करना चाहिए। “ पितृ स्तोत्र, मार्कंडेयपुराण। रुड़की रोड स्थित डीएमजी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. आरके सिंह ने बताया कि बुधवार से श्राद्ध शुरू हो गए। भारतीय संस्कृति में यज्ञ की प्रधानता रही है।

शास्त्रों में भगवान विष्णु को यज्ञ का देवता कहा गया है। यज्ञों में भी पंचयज्ञ की विशेष प्रतिष्ठा हैं। पितृ यज्ञ इसी पंचयज्ञ के अन्तर्गत आता है, इसका हमारे जीवन में अत्यंत महत्व है।

उन्होंने बच्चों को ऑनलाइन जानकारी देते हुए आगे बताया कि श्राद्ध अपने पूर्वजों के प्रति हमारी श्रद्धा और कृतज्ञता का ज्ञापन है, जिन्होने हमें बहुत कुछ दिया है। आज हमारे पास जो कुछ भी है, उसकी हम कद्र नहीं करते हम उसे बहुत मामूली समझते है।

हमें यह समझना चाहिए कि हमसे पहले जो पीढ़ियां इस धरती पर आई हैं, उनके योगदान के बिना कुछ भी सम्भव ना था। उनके बिना हमारा धरती पर वजूद ही ना होता, दूसरे उनके योगदान के बिना वह सभी चीजें ना होती जो आज है, इसलिए अपने पूर्वजों (स्वर्गवासी माता-पिता, दादा-दादी, परदादा-परदादी आदि) के योगदान को नजर अंदाज करने की बजाए इस दिन हमें उन्हें याद करना चाहिए। उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करनी चाहिए।

वैसे तो अपने स्वर्गवासी माता-पिता को श्रद्धांजलि देने के लिए यह सब एक रस्म के तौर पर किया जाता है। हमारी संस्कृति में महालया अमावस्या के दिन पूर्वजों की आत्मशांति के लिए कुछ विधि-विधान (कर्मकांड) करने का रिवाज है, परन्तु वास्तव में देखा जाये तो इस दिन हमें तमाम पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और आभार व्यक्त करना चाहिए। इन 15 दिनों की अवधि में केवल सात्विक भोजन ही करना चाहिए। पितृ पक्ष के बाद ही हम नवरात्रि, विजयदशमी और दीपावली जैसे त्यौहारों के जश्न मनाने की शुरूआत करते हैं।

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