Saturday, June 6, 2026
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Indira Ekadashi 2025: 17 सितंबर को मनाई जाएगी इंदिरा एकादशी, पितरों की मुक्ति के लिए खास महत्व

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिेक स्वागत और अभिनंदन है। सनातन परंपरा में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की उपासना का सर्वोत्तम दिन माना जाता है। वर्षभर आने वाली 24 एकादशियों में से हर एक का अलग महत्व होता है। इन्हीं में से अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली इंदिरा एकादशी विशेष रूप से पितरों के उद्धार और पितृदोष निवारण के लिए महत्वपूर्ण मानी गई है। पंचांग के अनुसार इस वर्ष इंदिरा एकादशी 17 सितंबर, बुधवार को पड़ रही है। इस दिन व्रत, श्राद्ध और पितृ तर्पण का विशेष महत्व रहेगा। शास्त्रों में उल्लेख है कि जो साधक श्रद्धा और नियमपूर्वक इस एकादशी का व्रत करता है, उसके पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। साथ ही पितृदोष समाप्त होकर घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। मान्यता है कि इस व्रत के पुण्य से व्रती को भगवान विष्णु के धाम की प्राप्ति भी होती है।

महत्व

धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि यदि कोई पूर्वज पाप कर्मों के कारण नरक में या नीच योनि में पड़ा हो, तो इस व्रत से उसे सद्गति मिलती है। पद्म पुराण के अनुसार, इस एकादशी पर किए गए व्रत और दान का फल पितरों को समर्पित करने से वे मोक्ष प्राप्त कर वैकुण्ठ लोक में चले जाते हैं। इस व्रत का पालन करने वाले के सात पीढ़ियों तक के पितरों को तृप्ति मिलती है।

विधि और नियम

इस दिन प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु के स्वरूप शालग्राम की पूजा करें। उन्हें पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराएं और चंदन, फूल, तुलसी पत्र, भोग अर्पित करें। दिनभर हरि नाम का जप करें, आलस्य त्यागें और पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध करें। द्वादशी को भगवान पद्मनाभ की पूजा कर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें, तत्पश्चात स्वयं भोजन ग्रहण करें।

पूर्वजों की आत्मा को भी कष्टों से मुक्त करता है

इंदिरा एकादशी के दिन किया गया व्रत केवल जीवित व्यक्ति को ही लाभ नहीं देता, बल्कि मृत पूर्वजों की आत्मा को भी कष्टों से मुक्त कर उन्हें वैकुण्ठ पहुंचा देता है। शास्त्रों के अनुसार इस व्रत से यमलोक की यातनाएं भी नहीं भोगनी पड़तीं और पितृदोष से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि यह एकादशी श्राद्ध पक्ष की सर्वश्रेष्ठ तिथि मानी गई है।

इंदिरा एकादशी की कथा

सतयुग में महिष्मतीपुरी के राजा इन्द्रसेन धर्मपरायण और भगवान विष्णु के भक्त थे। एक दिन देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि उनके पिता व्रतभंग के कारण यमलोक में पीड़ा भोग रहे हैं। पितृ उद्धार के लिए उन्हें इंदिरा एकादशी का व्रत करने का संदेश मिला। राजा ने विधि-विधान से व्रत कर पितरों को तृप्त किया, जिससे उनके पिता विष्णुधाम को प्राप्त हुए। अंततः राजा इन्द्रसेन भी अपने जीवन के बाद स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।

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