Wednesday, December 8, 2021
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कॉन्ट्रेक्ट फॉर्मिंग किसानों के हित में नहीं

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खेती किसानी भारत का प्राण रही है। यहां खेती कामधंधा न होकर एक संस्कृति है, जिसने अनेक बाधाओं और विभिन्नताओं के होते हुए देश को समृद्ध बनाया है। भारतीय कृषि मनुष्य की भूख मिटाने तक सीमित न होते हुए जीव जगत के पाल पोषण पर टिकी है। देश के छोटे और मध्यम जोत वाले किसानों की जमीन मां है और वर्षों से खेती करके समस्त मेहनतकश जनता का पेट पाल रहा है। यह किसान की मेहनत का ही कमाल है कि हम विदेशी आयात पर निर्भर नहीं हैं। अनुबंध खेती का कानून बनाकर किसानों को सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं और यह किसानों को छलने का प्रयास है और किसानों को स्वतंत्र न होकर कंपनियों (पूंजीपतियों) के आधीन गुलाम बनवाने की है। विदेशों की तथाकथित विकसित खेती ने हमारी खेती की जैव विविधता को नष्ट कर दिया है। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से खेती की जमीन अनउपजाऊ हो गई है। इन नीतियों के चलते आज किसान आत्महत्या कर रहे हैं और शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं।

नए कृषि कानूनों में तीसरा कानून कॉन्ट्रेक्ट (अनुबंध) खेती का कानून बनाना इसका ताजा उदाहरण है। इसमें खेती में बड़ी कंपनियों (पूंजीपतियों) को घुसाने की तैयारी हो रही है। जिसमें ये कंपनियां किसानों को बीज, रसायन बेचेंगी और किसान की उपज का खरीदार होगी। किसान अपने ही खेतों में मजदूर होकर रह जाएंगे। इन नीतियों के खिलाफ समान सोच वाले किसान संगठनों, व्यापारियों और आम आदमी संगठित होकर आंदोलन कर रहे हैं। चौधरी चरण सिंह द्वारा बनाए गए मंडी अधिनियम 1964 तथा कृषि उत्पादन मंडी नियमावली 1965 में संशोधन दरकिनार किए जा रहे हैं।

सरकार द्वारा किसानों के हित के नाम से कानून बनाए जा रहे हैं। ये कानून बनाकर कृषि को कॉरपोरेट घरानों को सौंपने की तैयारी है। अमेरिका से यदि बाजार किसानों के लाभ के अनुरूप कार्य कर होता है तो कोई कारण नहीं था कि 2007 के फार्म बिल के तहत अमेरिका अपने देश में 286 अरब डालर की अतिरिक्त सहायता कृषि रियायत पैकेज न देता। अमेरिका में खेतों में काम करने वाले मात्र सात लाख (3 फीसदी) बड़ी जोत वाले किसान बचे हैं। संसार का सबसे बड़ा पूंजीपति बिलगेट्स वहां का सबसे बड़ा किसान है। फिलीपींस, जिम्बाम्बवे, अर्जेन्टीना एवं मैक्सिको जैसे देशों में अनुबंध खेती का अनुभव ठीक नहीं रहा। थाईलैंड और अफ्रीका के देशों में बड़ी कंपनियों ने किराये पर जमीन ली थी। इन जमीनों से कम समय में ज्यादा मुनाफा कमाने चक्कर में उन्होंने जीएम बीज व रासायनिक खादों का भरपूर प्रयोग किया और 5 से 7 बार उन पर फसल लेने के बाद रफूचक्कर हो गई। जिसके चलते उर्वरा शक्ति के ह्रास से जमीन बंजर हो गई।

ठेका खेती में बदलाव करके कुछ देशों में जैव खेती को प्रोत्साहन दिया जाने लगा है। यूरोप में डेनमार्क पहला देश था जिसमें 1987 में राष्ट्रीय स्तर पर किसानों को जैव खेती के लिये प्रोत्साहन देना शुरू किया। उसके बाद जर्मनी ने जैव खेती की पद्धति को अपनाने के लिए किसानों को सहायता देनी प्रारंभ की। 1996 तक लक्जमबर्ग को छोड़कर यूरोप के देशों में जैव खेती वाले किसानों को खेती करने में सहायता देने की नीति पर अमल शुरू करा दिया है। चीन में इसके विपरीत खेती का बहुत सहूलियतें तो नहीं दी गर्इं, लेकिन पूंजीपतियों व जीएम बीजों को अपने यहां नहीं घुसने दिया। लेकिन हमारे देश में सरकार कॉरपारेट का हित साधने वाली नीति बना रही है।

पंजाब किसानों से अनुबंध खेती के बारे में सीख लेने की आवश्यकता है। यहां किसान काफी परेशान है। यहां की आम शिकायत है कि कंपनियां कई बार किसानों से समझौते तय किए गए मूल्य से किसानों को भुगतान नहीं करती। इससे कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) कानून में भी संशोधन होगा और मंडियों पर सरकार का अधिकार समाप्त हो जाएगा और उत्पादों की बिक्री के लिए अपनी स्वतंत्र मंडियां स्थापित कर सकेंगी। पंजाब में कारगिल व पेप्सी ने टमाटर की खेती कराई थी। किसानों ने जब टमाटर पैदा कर लिया तो यह कंपनियां भाग खड़ी हुईं और किसानों का टमाटर खेत में खड़ा रहकर गल गया, क्योंकि नई जाति का टमाटर को उपभोक्ताओं ने नकार दिया। देश में अनुबंध खेती का प्रयोग छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उडीसा, पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में भी अच्छा नहीं रहा।

अनुबंध खेती किसानों की मौत का वारंट है। इसका सभी किसान संगठन विरोध कर रहे हैं। इसके तहत पूंजीपति किसानों से समझौते में तय किए मूल्य के हिसाब से भुगतान नहीं करते हैं तथा वह किसानों को पूरा मूल्य नहीं चुकाते हैं, ताकि अगले वर्ष भी यह इन निवेशकों को अपना उत्पाद बेचने को मजबूर होंगे। कुछ कंपनियां ने जानबूझकर भुगतान में देरी की तथा कंपनियों द्वारा किसानों को दिए गए चेक बाउंस हो गए। कंपनियां न तकनीकि सप्लाई के नाम पर 100 रुपये की तकनीकि सलाह फीस भी वसूली, किंतु कोई विशेषज्ञ ही उनके खेतों में झांकने भी नहीं गया। पंजाब के किसान तो राजनैतिक रूप से और आर्थिक रूप से मजबूत हैं, लेकिन इन राज्या में सबसे बड़ी समस्या है कि पैदावार बढ़ाने के लिए ये कम्पनियां जो विधियां अपनाती हैं उससे भूमि

उर्वरता घटती है। कॉन्ट्रेक्ट खेती और कॉरपोरेट खेती एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अहंकारी कॉरपोरेट सरकार कृषि कानूनों को वापिस लेने को तैयार नहीं है और अपनी जिद पर कायम है। उल्टे किसानों को आंदोलनजीवी कहती है, जो सरकार की किसान विरोधी सोच को ही उजागर करती है।


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