
बादल सरोज
वर्ष 1964 में साहित्य के नोबेल को ठुकराते हुए ज्यां पॉल सात्र ने तो उसे ‘आलू के बोरे’ का दर्जा दिया था, लेकिन छह दशक बाद 2025 में वेनेजुएला की जिन मारिया कोरिना माचाडो को शांति का नोबेल दिया गया है उनके अब तक के शांति-विरोधी धतकरम आलू को भी शर्मिंदा करते हैं। क्या हैं, विश्वशांति, बल्कि अशांति के लिए किए गए उनके काम?
हर वर्ष ‘नोबेल पुरस्कार’ के नाम पर दिए जाने वाले सम्मानों के ठीक पहले घोषित होने वाले ‘आईजी-नोबल पुरस्कार’ (नोबल यानि कुलीन का विलोम इग्नोबल यानि नीच, अधम) उतना प्रचार नहीं पा पाते। दरअसल ‘नोबेल’ शुरू होने के नब्बे साल बाद, 1991 में इसकी खिल्ली उड़ाते हुए कुछ पत्रकारों, वैज्ञानिकों ने ‘आईजी-नोबेल’ का सिलसिला शुरू किया था। इन व्यंगात्मक सम्मानों से, ‘नोबेल’ की नकल करते हुए ऐसी ‘उपलब्धियों’ को सम्मानित किया जाता है जो पहले सुनने वालों को हंसाती हैं, फिर सोचने के लिए मजबूर करती हैं। वे इतनी विचित्र होती हैं कि जिन्हें मिलता है वे भी उसको ‘क्या भूलूं, क्या याद रखूं’ के पशोपेश में पड़ जाते हैं।
मसलन-इस साल 2025 का इंजीनियरिंग का ‘आईजी-नोबेल’ दो भारतीय इंजीनियरों को मिला जिन्होंने-‘बदबू मारते जूते किस प्रकार शू-रैक के प्रदर्शन को प्रभावित करते हैं’-की खोज की !! इसी साल जीवविज्ञान का ‘आईजी-नोबेल’ एक जापानी टीम की उस खोज के लिए दिया गया है जिसमें पाया गया कि गायों पर जेब्रा जैसी काली और सफेद पट्टियां बनाने से मक्खियों द्वारा उन्हें काटे जाने की संख्या आधी हो जाती है!! इससे पहले एक ऐसा ही ‘इग्नोबल’ उस ‘5 सेकंड्स के नियम’ की ‘खोज’ के लिए दिया गया था जिसने बताया था कि फर्श पर गिरा भोजन यदि पांच सेकंड के भीतर उठा लिया जाए तो वह दूषित नहीं होता! हालांकि इन ‘इग्नोबल पुरुस्कारों’ की सूची लंबी है, लेकिन इनकी शुरुआत करने वाले व्यंगकारों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक समय आयेगा जब मजाक उड़ाने वाले इनके अवार्ड्स कहीं ज्यादा गंभीर और उपयोगी लगने लगेंगे और ‘नोबल’ सचमुच में ‘इग्नोबल’-नीच और अधम-सम्मान हो जाएगा।
वेनेजुएला की मारिया कोरिना माचाडो को 2025 का शान्ति के लिए दिया गया ‘नोबेल’ इसी दर्जे का-नीच और अधम-चयन है। यह बदबूदार जूतों को शू-रैक में सजाने और गाय पर जेब्रा जैसी काली-सफेद पट्टियां बनाने से भी आगे की ‘इग्नोबल’ योग्यता को दिया सम्मान है। एक ऐसी महिला को जिसकी राजनीति, विचारधारा और क्रियाकलापों में हिंसा, बर्बरता, लोगों को दु:ख पहुंचाने के सिवा कुछ भी न हो, जिसकी राजनीति में ‘शांति’ नाम का शब्द ही न हो, उसे ‘शान्ति का अंतर्राष्ट्रीय सम्मान’ दिया जाना ठीक वैसा ही है जैसे नाथूराम गोडसे को गाँधी की जीवन-रक्षा के लिए तमगा दिया जाना ! हालांकि इन दिनों ऐसा होना कोई अचम्भे की बात नहीं है, मगर ‘शान्ति के नोबेल’ का यह चयन ऐसा है जिसने शांति की उसकी नयी परिभाषा से इन साम्राज्यवादी देशों का पहले से ही नुचा-नुचाया मुखौटा भी उतारकर फेंक दिया है।
कौन है मारिया कोरिना माचाडो? वे प्रतिबंधों, निजीकरण और विदेशी हस्तक्षेप की ऐसी प्रवक्ता हैं जिसकी राजनीति हिंसा में डूबी हुई है। वे खुलेआम अपने लैटिन अमरीकी देश वेनेजुएला में विदेशी फौजें बुलाती है, गजा के विनाश के बाद विश्व-मानवता द्वारा नरसंहारी कहे जा रहे इजराइली प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू से वेनेजुएला पर बम बरसाने और वहां की निर्वाचित सरकार से ‘मुक्ति’ की गुहार लगाती हैं। ‘दुष्ट शेतन्याहू’ के नाम से कुख्यात हुए नेतन्याहू को लोकतंत्र का रक्षक मानती हैं और गजा में जिन प्रतिबंधों के चलते दवा, पानी, भोजन, ऊर्जा आदि के अभाव में युद्ध से भी ज्यादा लोग मारे गए हैं, ऐसे इजरायली प्रतिबंधों का न केवल समर्थन करती हैं, बल्कि ठीक वैसे ही प्रतिबन्ध अपने ही देश वेनेजुएला की जनता पर भी लगाए जाने की पैरवी करती हैं।
साम्राज्यवादी हुकूमतों और उनके मीडिया की चहेती माचाडो ने अपना पूरा राजनीतिक जीवन विभाजन को बढ़ावा देने, वेनेजुएला की संप्रभुता को कमजोर करने और अपने ही देश के लोगों के सम्मानजनक जीवन के अधिकार को नकारने में बिताया है। उसने 2002 के उस तख्तापलट का नेतृत्व किया, जिसने एक लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति ‘ूगो शावेज को कुछ समय के लिए हटा दिया था। माचाडो ने उस कुख्यात आदेश पर हस्ताक्षर किए थे जिसने रातों-रात संविधान और सभी सार्वजनिक संस्थानों को भंग कर दिया था।
माचाडो ने डोनाल्ड ट्रम्प की कथित नशे की तस्करी के नाम पर कैरिबियन खाड़ी में अमरीकी नौसैना की तैनाती का समर्थन किया था। ट्रम्प से वेनेजुएला में अमरीकी सेना भेजने की अपील करते हुए उसका मन्सबदार बनने की पेशकश की थी। यह जानते हुए भी कि इसकी सबसे बड़ी कीमत गरीबों, बीमारों और श्रमिक वर्ग को चुकानी पड़ेगी, उसने अमेरिका के उन प्रतिबंधों को आगे बढ़ाया जिन्होंने अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था।
माचाडो ने वेनेजुएला की कथित ‘अंतरिम सरकार’ बनाने में अमरीका की मदद की जिसका ‘स्वयंभू राष्ट्रपति’ विदेशों में वेनेजुएला की संपत्ति लूटता रहा, जबकि देश के बच्चे भूख से मर रहे थे। उसने उस यरूशलेम में वेनेजुएला का दूतावास फिर से खोलने की प्रतिज्ञा की, जिस पर इजरायल के कब्जे को दुनिया का लगभग कोई देश नहीं मानता। इस सबके आलावा अब उसका एजेंडा है, दुनिया के पांचवें तेल भण्डार वाले वेनेजुएला का तेल, जल और बुनियादी ढांचे को निजी कंपनियों को सौंपना। यह वही नुस्खा है जिसने दुनिया को कॉरपोरेट की चारागाह और विश्व मानवता के मकतल में बदल दिया है।
‘शान्ति का नोबेल’ प्राप्त करने वाली माचाडो 2014 के ‘ला सलिदा’ आंदोलन की योजनाकारों में से एक थीं। यह वह आन्दोलन था जिसने वेनेजुएला में हिंसक प्रदर्शनों, हमलों का आह्वान किया था। इन हमलों में उन मजदूरों की बसें जलाई गर्इं, जिन्हें शावेज का समर्थक-‘चाविस्ता’-समझा गया था। उन्हें मारा-पीटा गया और कई को मार दिया गया। एम्बुलेंसों और डॉक्टरों तक पर हमले हुए। कुछ क्यूबाई मेडिकल ब्रिगेड्स को जिÞंदा जलाने की कोशिश की गई। सार्वजनिक भवनों, खाद्यान्न से भरे ट्रकों और स्कूलों को नष्ट कर दिया गया। मचाडो ट्रंप के उन बर्बर ‘निर्णायक कदमों’ की तारीफ करती हैं जिनने प्रवासियों को जेल और शरणार्थी शिविरों में भर दिया था, परिवारों को तोड दिया था।
इस तरह माचाडो न तो शांति का प्रतीक हैं, न प्रगति का। वे फासीवाद, यहूदीवाद और नवउदारवाद के उस सांघातिक गठबंधन का हिस्सा हैं जो सिर्फ दक्षिण अमरीकी महाद्वीप को ही नहीं, समूची धरती को अपने चंगुल में लेना चाहता है। विचारधारा एक ही है, जिसके मुताबिक कारपोरेट पूँजी के मुनाफे की खातिर कुछ करोड़ लोग मर-मरा जाएँ तो कोई फर्क नहीं पड़ता, देशों की संप्रभुता नाम की कोई चीज नहीं होती, यह आसानी से खरीदी-बेची जा सकती है। वे मानती हैं कि हिंसा और बर्बरता को एक मान्य शासन प्रणाली, एक व्यवस्था के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इसी तरह ‘शान्ति का नोबेल’ भी शान्ति का प्रतीक नहीं है। वहशी पूँजीवाद मनुष्यता विरोधी धतकरमों को प्रामाणिकता और स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए हमेशा ऐसे सम्मान वापरता है।
‘शान्ति का नोबेल’ जब हिंसा के किसी ऐसे वास्तुकार को दिया जाता है जो खुद को कूटनीति के नाम पर छुपाता है तो यह सम्मान उन लोगों के चेहरे पर तमाचा होता है जो वास्तव में शांति के लिए लड़ते हैं। इस बार लालायित ट्रम्प की जगह लपलपाती माचाडो को चुनकर नोबल की निर्णायक कमेटी अपने रास्ते से नहीं भटकी है – उसने ‘रूप’ की जगह ‘सार’ को तवज्जो दी है। अल्फ्रेड नोबेल खुश ही हुए होंगे कि उनके न्यासियों ने हथगोले की जगह बारूद को चुना। हालांकि थोड़ा खुश तो ट्रम्प को भी होना चाहिए, आखिर शैतान की खाला ने अपना नोबेल ‘शैतन्याहू’ के आका-डोनाल्ड ट्रम्प-को ही तो समर्पित किया है।

