
व्यंग्य लेखन के लिए यह सबसे मुफीद समय है। यही वह समय है, जब आप सीधे-सीधे सत्ता पर राजनीतिक टिप्पणी न करके व्यंग्य के माध्यम से अपनी बात कह सकते हैं। बीसवीं सदी के चर्चित जर्मन कवि, नाटककार ब्रेख्त ने एक बार कहा था कि जब आप सरकार से सीधे-सीधे कुछ न कह पाएं तो व्यंग्य आपको रास्ता दिखाएगा। इस लिहाज से भी व्यंग्य लेखन आज सबसे जरूरी हो जाता है। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां सांप्रदायिक सद्भाव लगातार छीज रहा है, मजहब आपस में तलवारें खींचकर खड़े हैं, राष्ट्रवाद के इतने चेहरे दिखाई दे रहे हैं कि आप उसे पहचान ही न पाएं, चारों तरफ मंदिर-मस्जिद का विवाद सिर उठा रहा है, महामारी ने अस्पतालों के विद्रूप चेहरों को अचानक बेनकाब कर दिया है। मॉब लिंचिंग जैसे नये-नये शब्द सुनाई देने लगे हैं। समाज में इनके अलावा भी बहुत-सी विसंगतियां बर्बस सतह पर आ गई हैं।
आपके सितारे क्या कहते है देखिए अपना साप्ताहिक राशिफल 29 May To 04 June 2022
बकौल व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई, व्यंग्यकार व्यक्ति जीवन की विडंबनाओं का ऐसा रेखाचित्र खींचता है, जिसे पढ़कर चेतन पाठक अपने आप से भी सवाल पूछने के लिए विवश हो जाता है। व्यंग्य वास्तव में जीवन से तो साक्षात्कार कराता ही है, जीवन की आलोचना भी करता है, विसंगतियों, अत्याचारों, मिथ्याचारों और पाखंडों का भी पदार्फाश करता है।
सुभाष चंदर का व्यंग्य संग्रह ‘माफ कीजिए श्रीमान’! (भावना प्रकाशन) पढ़ते हुए बराबर लगता रहा कि कितनी सहजता से, व्यंग्य में राजनीतिक टिप्पणी की जा सकती है। सुभाष हिन्दी ‘व्यंग्य का इतिहास’ समेत 40 से अधिक पुस्तकें लिख चुके हैं। व्यंग्य लिखते समय वह अपने आसपास, समाज में, राजनीतिक स्तर पर क्या हो रहा है, इस पर बारीक नजर रखते हैं। यही वजह है कि उनके व्यंग्य में तुर्शी और तीखापन दिखाई देता है।
‘माफ कीजिए श्रीमान’! में सुभाष ने जाति, धर्म, विचारधारा, कोरोना, निजी अस्पताल-प्राइवेट अस्पताल, सोशल मीडिया पर प्रेम और पुरस्कारों की राजनीति पर कलम चलाई है। यह अकारण नहीं है कि आज के दौर में इनसानियत, भाईचारे और धर्मनिरपेक्षता की बातें करने वालों को अपराधी (कमीना) की तरह देखा जाता है।
‘यासीन कमीना मर गया’ ऐसे ही एक शख्स पर लिखा गया व्यंग्य है। यासीन एक ऐसा शख्स था, जिसे गालिब से लेकर मीर तक सबको पढ़ना अच्छा लगता था। वह दोस्ती नाम की मिल्कियत को हिन्दू-मुसलमान वाले खांचे में बांटने का शौकीन नहीं था। उसे मंदिर जाने से भी कोई गुरेज नहीं था और वह इस बात पर भी कोई ऐतराज नहीं करता था कि उसकी बहन किसी हिन्दू लड़के से प्रेम करने लगे। अंत में अपनी इसी उदारता की वजह से वह भीड़ द्वारा मार दिया जाता है। बड़े सधे हुए अंदाज में सुभाष ने इस व्यंग्य को लिखा है और वह सब कुछ कहा है जो हम कहना चाहते हैं लेकिन कह नहीं पाते।
‘हिंदू-मुसलमान वार्ता उर्फ तेरी ऐसी की तैसी’ इसी विषय को थोड़ा अलग ढंग से उठाती है। वार्ताशैली में लिखे इस व्यंग्य में दिखाया गया है कि किस तरह राजनेताओं, चैनलों और धर्मगुरुओं के बीच धार्मिक विवाद आम आदमी तक पहुंच गया है। अब दो सामान्य, हिंदू और मुसलमान युवा भी एक दूसरे से लड़ने को तैयार हैं, लड़ रहे हैं। ‘मर्द की नाक’ उस पुरुषवादी मानसिकता पर चोट करती है, जो स्त्री को भोग की वस्तु समझता है, जो अपनी झूठा शान व मर्दानगी बनाए रखने के लिए अपनी पत्नी को गैर मर्द के पास भेजने से भी गुरेज नहीं करता।
इस व्यंग्य का एक संवाद है-कालांतर में छबीली रानी ने मन्नू पासी के सहयोग से पूरे नौ महीने बाद एक बच्चा पैदा किया, जिसका बाप कहलाने का सौभाग्य छंगा सिंह को प्राप्त हुआ। उसका सीना और नाक दोनों तन गए। यह कोई काल्पनिक स्थिति नहीं है, हमारे समाज में छंगा जैसे किरदार भरे पड़े हैं। यह व्यंग्य उन्हीं की कलई खोलता है।
पिछले दो साल से पूरी दुनिया महामारी की चपेट में है। लाखों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। अभी भी यह संकट खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में यह संभव नहीं है कि कोरोना रचना के बिना कुछ पूरा हो जाए। सुभाष ने ‘कोरोना के साथ मेरे कुछ प्रयोग’, ‘कुछ कोरोना कथाएं’, ‘चंपक लाल, कविता और कोरोना का इलाज’ और ‘अस्पताल बीमार है’ व्यंग्य लेखों में कोरोना के दौरान दी जा जाने वाली सलाहें, महामारी में भी अपनी कविता सुनाने की जिद और बीमार अस्पतालों की खबर ली है।
सुभाष यह भी देख रहे हैं कि किस तरह गली-गली में लेखकों की बाढ़ सी आई हुई है। केवल लेखक ही नहीं पुरस्कार देने और पाने वालों की भी भारी भीड़ जमा है। पुरस्कार लेने के लिए लेखक क्या-क्या जुगाड़ नहीं करते। लेखकों और पुरस्कारों की दुनिया पर सुभाष ने कलम चलाई है ‘पुरस्कार ले लो पुरस्कार’ में। इसी तरह आलोचकों को कठघरे में खड़ा करती है उनकी व्यंग्य रचना ‘आलोचना का तंबू।’
इसमें सुभाष ने सहज ढंग से दिखाया है कि आलोचकों की खेमेबंदी, आलोचना के प्रति आलोचकों की प्रतिबद्धता और आलोचना कर्म किस गर्त में जा रहा है। सुभाष की नजर से यह भी नहीं चूका कि किस तरह आज बड़े बूढ़ों का परिवारों में अपमान किया जा रहा है। इस अपमान को सुभाष ने ‘बूढ़ा बुढ़िया और आशिकी’ में दर्ज किया है।
‘माफ कीजिए श्रीमान’! व्यंग्य संग्रह पढ़ने के बाद आपको मौजूदा समय की पूरी तस्वीर दिखाई पड़ेगी। शायद ही कोई विषय ऐसा हो जो सुभाष की नजर से छूटा हो। इन अलग-अलग विषयों पर सुभाष ने वह सब कहा है, जिसे कहने से हम सब डरते हैं और किन्हीं भी वजहों से कह नहीं पाते। इसलिए भी यह संग्रह पढ़ने में आनन्द आता है। इस संग्रह में समाज की वे सारी विसंगतियां और पाखंड सतह पर दिखाई पड़ते हैं, जो अब तक शायद कालीनों के नीचे दुबके हुए थे।
निश्चित रूप से कुछ रचनाएं इस संग्रह में आपको ऐसी मिलेंगी जो बेचैन करने वाली हैं। सुभाष अपनी भूमिका में ये स्वीकार करते हैं, आलोचकों की परवाह न करते हुए, इस बार मैं व्यंग्य संग्रह लेकर आया हूं तो इसलिए क्योंकि मेरे पास कुछ बेचैन करने वाली रचनाएं थीं, जिन्हें मैं पाठकों तक पहुंचाना चाहता था, जब-जब ऐसी रचनाएं लिखूंगा व्यंग्य संग्रह आते रहेंगे।
निश्चित रूप से व्यंग्य में यदि पाठकों को बेचैन करने की क्षमता है तो वे श्रेष्ठ रचना हो सकती हैं और यह भी तय है कि जो बात आप सीधे-सीधे नहीं कह सकते, उसे आप व्यंग्य के जरिये बेहतर ढंग से कह सकते हैं। सुभाष चंदर ने यही काम किया। उनके इस संग्रह में मौजूदा समय पूरी शिद्दत और तीव्रता के साथ दर्ज होता है।
सुधांशु गुप्त


