- चौधरी चरण सिंह मेरठ में कांग्रेस के जिलाध्यक्ष भी रहे थे
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: क्रांतिधरा ने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह के उतार-चढ़ाव का साक्षी रहा हैं। उसूलों की राजनीति करने वाले चौधरी चरण सिंह मेरठ में कांग्रेस के जिलाध्यक्ष भी रहे हैं। उनका सख्त शासन भी लोगों ने देखा। जमीदारा खत्म किया, पटवारियों के इस्तीफे भी लिखवा लिये गए। पुलिस पर भी चाबुक चलते हुए क्रांतिधरा ने देखी हैं। यूपी के मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक का सफर उन्होंने तय किया, लेकिन अहकार मुक्त व्यक्तित्व भी देखा।
सर्किट हाउस उनकी मीटिंगों का भी साक्षी रहा हैं। साधारण भोजन करना, कमरे की बजाय गर्मी में खुले आकाश में चारपाई लगवाते थे, फिर वहां सोते थे। रात्रि में जल्दी विश्राम में चले जाते थे, लेकिन सुबह 4 बजे चारपाई छोड़ देते थे। उनकी सुरक्षा में जो पुलिस कर्मी लगे होते थे, उनको सोते हुए देखा तो रायफल उठाकर सर्किट हाउस के कमरे में रख देते थे। उनकी कहानी तो बहुत हैं, लेकिन उनकी ईमानदार पर कोई अंगुली नहीं उठा सकता।
बताते है कि जब वो कांग्रेस के जिलाध्यक्ष थे तो पार्टी की तरफ से कार मिली थी, इस कार को उनकी पत्नी चौधरी साहब के गांव ले गई। इसमें जो तेल खर्च हुआ, उसका पैसा भी चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस पार्टी कार्यालय में जमा करा दिया था। इतने ईमानदार थे चौधरी साहब। लॉ की डिग्री लेने के बाद चौधरी चरण सिंह ने गाजियाबाद से अपने पेशे की शुरूआत की। वो 1929 में मेरठ आ गये और बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए।

वे सबसे पहले 1937 में छपरौली से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए एवं 1946, 1952, 1962 एवं 1967 में विधानसभा में अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। चौधरी चरण सिंह 1946 में पंडित गोविंद बल्लभ पंत की सरकार में संसदीय सचिव बने और राजस्व, चिकित्सा और लोक स्वास्थ्य, न्याय, सूचना समेत कई विभागों में कार्य किया। जून 1951 में उन्हें राज्य के कैबिनेट मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया। उन्हें न्याय और सूचना विभागों का प्रभार दिया गया।
बाद में 1952 में वे डा. सम्पूर्णानन्द के मंत्रिमंडल में राजस्व एवं कृषि मंत्री बने। अप्रैल 1959 में जब उन्होंने पद से इस्तीफा दिया, उस समय उन्होंने राजस्व एवं परिवहन विभाग का प्रभार संभाला हुआ था। चौधरी चरण सिंह वर्ष 1960 में सीबी गुप्ता के मंत्रालय में गृह एवं कृषि मंत्री थे। वहीं सुचेता कृपलानी के मंत्रालय में वे कृषि एवं वन मंत्री 1962, 63 रहे। उन्होंने 1965 में कृषि विभाग छोड़ दिया एवं 1966 में स्थानीय स्वशासन विभाग का प्रभार संभाल लिया।
कांग्रेस विभाजन के बाद फरवरी 1970 में दूसरी बार वे कांग्रेस पार्टी के समर्थन से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। हालांकि राज्य में 2 अक्टूबर 1970 को राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था। चरण सिंह ने कई अलग-अलग पदों पर रहते हुए उत्तर प्रदेश की सेवा की। उनकी ख्याति एक ऐसे कड़क नेता के तौर पर हो गई थी जो प्रशासन में अक्षमताए भाई. भतीजावाद और भ्रष्टाचार को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते थे।
चौधरी चरण सिंह ने बेहद ही साधारण जीवन व्यतीत किया। खाली वक्त में वो किताबें पढ़ने लिखने में काफी रुचि रखते थे। उन्होंने कई किताबें लिखीं। जिसमें जिसमें जमींदारी उन्मूलन, भारत की गरीबी और उसका समाधान, प्रिवेंशन आॅफ डिवीजन आॅफ होल्डिंग्स बिलो ए सर्टेन मिनिमम प्रमुख हैं।
चौधरी साहब को मुलायम भी मानते थे सियासी गुरु
समाजवादी पार्टी के संस्थापक संरक्षक व पूर्व अध्यक्ष स्व. मुलायम सिंह यादव भी किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। यही वजह थी कि जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। तब उन्होंने ही 25 जनवरी 1994 को मेरठ विश्वविद्यालय का नाम परिवर्तित करके चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय किया था। इसके बाद जिला कारागार का नाम भी चौधरी चरण सिंह के नाम पर किया गया।

मुलायम सिंह यह भी कहने से गुरेज नहीं करते थे कि उन्होंने चौधरी चरण सिंह के चरणों में बैठकर राजनीति सीखी है। वर्ष 94 से पहले तक बागपत जनपद भी मेरठ जिले का ही हिस्सा था। जीवन पर्यंत किसानों नौजवानों व मजदूरों के लिए संघर्ष करने वाले चौधरी साहब की उपलब्धियों को देखते हुए मेरठ विश्वविद्यालय के नामांतरण का निर्णय लिया था। ताकि आने वाली पीढ़ी उन्हें सैकड़ों वर्षों तक याद रख सके। उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु के नाम पर मेरठ विश्वविद्यालय का नाम बदलकर एक तरह से विश्वविद्यालय उन्हें समर्पित किया था।

