Saturday, March 21, 2026
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भागीरथपुरा से लें सबक

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हमारी सामूहिक फितरत कुछ ऐसी बन गई है कि किसी बड़े हादसे के बाद थोड़े समय के लिए हम जागते हैं—जागरूकता बढ़ती है, विरोध होता है, जिम्मेदारियों पर सवाल उठते हैं और विश्लेषण भी किया जाता है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, स्मृति धुंधली पड़ने लगती है, आक्रोश ठंडा हो जाता है और तंत्र फिर उसी पुरानी स्थिति में लौट आता है। सार्वजनिक संस्थाओं के व्यवहार में कोई ठोस बदलाव नहीं आता।

इंदौर के भागीरथपुरा में 21 से अधिक लोगों की मौत, हजारों का बीमार पड़ना और कई लोगों का आज भी जीवन-मृत्यु के बीच झूलना इसी दुखद चक्र का ताजा उदाहरण है। यदि इस त्रासदी को केवल एक और खबर बनकर नहीं गुजरने देना है, तो हमें अपनी इसी फितरत को बदलना होगा और भावनात्मक प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर ठोस, संरचनात्मक कदम उठाने होंगे।
इस संदर्भ में पहला काम होना चाहिए कि मध्यप्रदेश के हर नगर निगम की पानी की पाइप लाइनों का सर्वे किया जाए। यह पता चले कि कहाँ पाइप लाइन बदलनी है और कहाँ दुरुस्त करना है। लाइन में लीकेज का कारण पुरानी लाइनों का सड़ना हो सकता है या सड़क की खुदाई के दौरान पाइप लाइन का क्षतिग्रस्त होना आदि। सर्वे रिपोर्ट और उस पर की गई कार्यवाही सार्वजनिक होनी चाहिए। जैसा कि बताया जा रहा है, इंदौर में दो सालों से शिकायत होती रही, पर कार्यवाही कुछ नहीं हुई।

भ्रष्टाचार के अलावा एक बड़ा कारण तंत्र का लचर होना भी है। इंदौर के महापौर ने कहा कि अधिकारी नहीं सुनते हैं। यह तभी संभव होता है जब अधिकारियों की नियुक्ति राजनीतिक संरक्षण से होती है। ऐसे में अधिकारी बिना डर के अपने नियमित काम की उपेक्षा कर पाते हैं। चाहे सरकारी स्कूल हो, सरकारी अस्पताल या नगर निगम – यह परंपरा सार्वजनिक व्यवस्था को खोखला बना देती है। सार्वजनिक व्यवहार को बदलने और लोगों के बीच ठोस जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए नए नियमों की जरूरत है। सभी नगर निगमों के लिए आवश्यक होना चाहिए कि नियमित पानी की जांच हो और यह रपट सार्वजनिक तौर पर निगम की वेबसाइट पर उपलब्ध हो। इंदौर का उदाहरण देखें तो समझ आएगा कि पानी की जांच नगण्य है। एक रपट के अनुसार इंदौर में हर महीने 350 सैंपल लेने चहिए थे, यानी वर्ष में 4200 सैंपल, पर साल भार में केवल 491 सैंपल लिए गए। केंद्र सरकार की एक रपट ने 2024 में कहा था कि मध्यप्रदेश में लिए गए पानी के सैंपल में से केवल 63 प्रतिशत पीने योग्य पाए गए। चौंकाने वाली बात है कि इंदौर जिले में केवल 33 प्रतिशत सैंपल पीने योग्य थे। सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया।

पानी की जांच-रपट नगर के वार्ड अनुसार होनी चाहिए। इसके दो हिस्से हैं। एक रपट पानी के स्रोत यानी मुख्य लाइन या टंकी की होनी चाहिए और दूसरी उस वार्ड या जोन के कुछ घरों से लिए गए ‘रैंडम सैंपल’ की। यदि दोनों में कुछ फर्क है तो निगम द्वारा ‘एक्शन टेकन’ टीप जरूरी है। अधिकांश समय लीकेज निगम की वितरण लाइन में होते हैं। इस रपट को अपलोड करना एक नियमित कार्यवाही मानी जानी चाहिए। कोई भी व्यक्ति पानी की शिकायत करते समय इस रपट को देख सकता है और कार्यवाही की मांग कर सकता है।

ऐसे हादसे केवल जिंदगियां नहीं छीनते, वे धीरे-धीरे लोगों का ‘सार्वजनिक जल व्यवस्था’ से भरोसा भी खत्म कर देते हैं। नल से बहता पानी सुरक्षित न लगे तो स्वाभाविक है कि लोग बोतल का पानी खरीदने को मजबूर हों और इस मजबूरी से बोतल बंद पानी का बाजार कई गुना फलने-फूलने लगे। आज पीने के पानी के तीन प्रमुख स्रोत हैं: नगर निगम की आपूर्ति, सरकारी या निजी बोरिंग और निजी कंपनियों का बोतल बंद पानी। विडंबना यह है कि ये तीनों ही दूषण से अछूते नहीं हैं और इसके उदाहरण हमारे आसपास बिखरे पड़े हैं।

तीन वर्ष पहले देवास शहर की एक रिपोर्ट ने बताया था कि वहां 30 ‘आरओ प्लांट’ संचालित हो रहे हैं, लेकिन उनमें से केवल 3 ही पंजीकृत थे—यानी जिन पर कोई निगरानी संभव थी। शेष प्लांट क्या पानी बेच रहे हैं, उसकी गुणवत्ता कैसी है, इस पर न सरकार का नियंत्रण है और न उपभोक्ता को जानकारी। दूसरी ओर भूजल का संकट और गहराता जा रहा है। कई शहरों के बड़े हिस्सों में भूमिगत पानी दूषित हो चुका है और यह समस्या इसलिए भी गंभीर है क्योंकि भूजल बहता है—वह एक इलाके तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे क्षेत्र को चुपचाप जहर दे सकता है। इस पानी को साफ करना न आसान है, न त्वरित; यह काम केवल राज्य की क्षमता और इच्छा शक्ति से ही संभव है।

इन स्थितियों में जरूरी है कि लोगों के लिए अपने घर के पानी के सैंपल की निष्पक्ष जांच करवाने की आसान व्यवस्था हो। ‘लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग’ को नगर निगम परिसर में सार्वजनिक पेयजल जाँच के लिए एक लैब की व्यवस्था करनी चाहिए। यहाँ कोई भी व्यक्ति अपने घर का पेयजल जांच के लिए ले जा सकता हो। उस पानी का स्रोत चाहे नगर निगम हो या प्राइवेट बोतल डिस्ट्रीब्यूटर या प्राइवेट बोरिंग, उसे एक निष्पक्ष रपट मिलनी चाहिए। इसके लिए मामूली शुल्क लिया जा सकता है। यह दो स्वरूप से काम करेगा। एक किसी भी व्यक्ति को अपनी शिकायत दर्ज करने के लिए ठोस सबूत प्राप्त होगा। यदि इस सबूत पर गौर नहीं किया जाता है तो यह भी दर्ज हो जाएगा और इस प्रकार अधिकारी एवं नेताओं की जवाबदेही बनेगी। पानी की समस्या के लिए यह एक ‘एफआईआर’ की तरह काम करेगा। यह तंत्र के लिए जवाबदेही से काम करने का दबाव महसूस करवायेगा। दूसरा, इस लैब के डाटा का विश्लेषण बहुत उपयोगी होगा। हमें दूषित पानी के स्रोत का अंदाजा होगा और यह किन इलाकों में फैला हुआ है, उसका भी पता चलेगा।

पीने के पानी की पाइप लाइन केवल लोहे या प्लास्टिक की नालियां नहीं हैं, वे जीवन की धमनियां हैं। उनका सीधा संबंध संविधान के ‘अनुच्छेद 21’ से है, जो हर नागरिक को जीवन के अधिकार की गारंटी देता है। जिस तरह गैस पाइप लाइन के लिए अत्यंत कड़े मानक, स्पष्ट संकेत, सुरक्षा घेराबंदी और सतत निगरानी की व्यवस्था होती है, उसी गंभीरता से पानी की पाइप लाइनों को भी देखा जाना चाहिए। शहरों में जगह-जगह स्पष्ट ठिया बनाए जाएं, पाइप लाइन के मार्ग को विशेष रंगों और चिन्हों से चिह्नित किया जाए और लीकेज पहचानने की तकनीक को मजबूत, नियमित और अनिवार्य बनाया जाए। सड़क या भवन निर्माण के नाम पर यदि इन जीवनदायी लाइनों को क्षति पहुंचाई जाती है, तो उसे सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ माना जाना चाहिए—और ऐसी हरकतों पर कठोर, त्वरित और उदाहरणात्मक कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए।

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