एक बार एक संन्यासी ने राजा से कहा, ‘मुझे सोने की गंध आती है, इसलिए मैं राजमहल में नहीं जाऊंगा, क्योंकि वहां सर्वत्र सोना ही सोना है।’ राजा ने कहा, ‘सोने में गंध होती ही नहीं, फिर आएगी कैसे?’ राजा की इस बात पर संन्यासी राजा को वहां ले गया, जहां चमड़े का कारोबार होता था। चारों ओर चमड़े की तीव्र बदबू फैली हुई थी।राजा ने चर्मकारों से पूछा, क्या तुम्हें कभी बदबू का अनुभव होता है?’ उन्होंने कहा, ‘महाराज! चमड़े की बदबू होती ही नहीं।’ इस पर संन्यासी ने कहा, ‘राजन! चमड़े के बीच रहने वाले को कभी बदबू नहीं सताती। इसी प्रकार सोने के मध्य में जीने वालों को सोने की गंध नहीं आती। चमड़े की गंध उसे आएगी, जो चमड़े के बीच नहीं रहता। सोने की गंध उसे आएगी, जो सोने के बीच नहीं रहता, सोने से दूर रहता है। जो सोने से दूर रहता है, वही सोने की बुराई का अनुभव कर सकता है। जो सोने में रचा-बसा रहता है, वह सोने की बुराई का क्या अनुभव करेगा?’ इस कहानी का सार यह है कि जो व्यक्ति भीतर के जगत में प्रवेश नहीं करता, जो अपने चैतन्य का अनुभव नहीं करता, जो अपने भीतर विद्यमान आनन्द, शक्ति और ज्ञान का स्पर्श नहीं करता, उस व्यक्ति को कोई उपदेश बदल नहीं सकता। उस व्यक्ति का आकर्षण-केंद्र बाह्य में है और रहेगा। कोई परिवर्तन नहीं आएगा। ज्वलंत प्रश्न है कि आज धर्म के द्वारा वह घटित नहीं हो रहा है, जो होना चाहिए। सब कुछ वह हो रहा है, तो जिसे धर्म की आड़ में सही बताया जा रहा है। भीतर का साम्राज्य अनोखा है।

