Monday, October 3, 2022
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झूठ और जीवन

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मनुष्य में सच बोलने के साथ झूठ बोलने की प्रवृत्ति भी उसमें निहित होती है। अपराध के अनेक औजार होते हैं, परंतु झूठ एक ऐसा हैंडिल है जो प्रत्येक औजार में फिट हो जाता हैं, ठीक बैठ जाता है। झूठ बोलने वाले व्यक्ति की कोई अहमियत नहीं होती, कोई उस पर विश्वास नहीं करता और न ही उसे सम्मान देता है। झूठ के सहारे एक निश्चित समय तक तो लोगों को बेवफूफ बनाया जा सकता हैं, परंतु आखिर में यह बुराई ही व्यक्ति के गले आकर पड़ती हैं। असत्य सबसे बड़ी बुराई है, एक बार व्यक्ति झूठा साबित हो जाने के बाद भले ही वह कितने भी सत्यवादी बनने के प्रयास करे लोग उसकी बात पर यकीन नही करते। झूठ हमारे रिश्तों से भरोसे और विश्वास को नष्ट कर देता है। हम अपने से जुड़े लोगों पर विश्वास और भरोसा करते हैं, ऐसा इसलिए कि वो भी उनपर खड़े रहते है।

हमारे अंदर यह विश्वास उनकी ईमानदारी और अच्छे व्यवहार से उत्पन्न होता है। हमारा उनसे झूठ बोलना या उनका हम से झूठ बोलना, हमारी और उनकी भावना को आहात करता है व हमेशा पीड़ादायी होता है। असत्य की अति कितने भी गहरे रिश्तों को नेस्तनाबुत कर देता है। बाद में हम उस झूठे व्यक्ति को कोई महत्व नही देते है, भले ही वह सत्य ही क्यों न बोल रहा हो। किसी भी व्यक्ति को हमेशा सत्य की राह पर चलना चाहिए। हालांकि ऐसा कहा जाता है कि किसी की भलाई के लिए बोला गया झूठ झूठ नहीं होता। लेकिन ऐसे झूठ को बोले जाने की परिस्थितियां भिन्न होती है। किसी भी व्यक्ति को जीवन में उतार-चढ़ाव का अनुभव कर उससे पार उतरने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। असत्य का सहारा लेकर कम समय में लोकप्रिय बनने से बेहतर है, सत्य के साथ अपनी पहचान बनाना। ताकि अंत में जब आप अपने जीवन का विश्लेषण करें तो शर्मिंदगी न उठानी पड़े।
-नृपेन्द्र अभिषेक नृप


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