Wednesday, May 27, 2026
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कीट को आकर्षित करने वाली फसलों को हानिकारक कीटों से बचाएं

KHETIBADI 2


फसल उत्पादन को प्रभावित करने वाले कारकों में कीटों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। विभिन्न प्रजाति के कीटों जैसे- काटने चबाने वाले, तना छेदक, भृंग व रस चूसने वाले कीट जैसे-माहू, थ्रिप्स, फुदके (लीफ हापर) आदि अपने मुखागों से फसलों के विभिन्न भागों जैसे कि फलों, सब्जियों एवं खाद्यान्नों का रस चूसकर, उन्हें कुतर-कुतर कर, खाकर एवं उसमें घुसकर,उनके अंदेर छेद बना कर तथा उनके अंदर हानिकारक पदार्थ छोडकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हंै। इसके साथ ही ये फसलों की गुणवत्ता व बाजार मूल्य को भी कम करते हैं जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। कीट आर्कषक फसलें एक औसत अनुमान के अनुसार 10 से 30 प्रतिशत तक किसानों की फसलों को कीटों के आक्रमण व कीटनाशी दवाओं के छिडकाव से बचा कर उसकी आय को बढ़ा सकती है तथा पर्यावरण को होने वाले नुकसान से भी बचा जा सकता है। कीट आर्कषक फसलें विभिन्न प्रकार के कीटों द्वारा विभिन्न फसल पद्धति को बचाने की एक रणनीति है। कीट आर्कषक फसलें एक प्रकार की रक्षक फसलें हैं जो कि एक निश्चित समय अवधि के दौरान कीटों को अपनी ओर आर्कषित कर मुख्य फसल को विभिन्न प्रकार के कीटों या अन्य जीव के प्रकोप से बचाने के लिये उगाई जाती हैं। यह या तो मुख्य फसल के बीच मे अंतरवर्तीय के रूप में या मुख्य फसल के चारों ओर बार्डर फसल (सीमा) या मुख्य फसल से पहले या बाद में लगाई जाती है। कीट आर्कषक फसलें प्राय: मुख्य फसल की कुल या समूह या उससे भिन्न कुल या समूह की हो सकती है।

कीट आकर्षक फसल लगाने के फायदे

-यह मुख्य फसल की गुणवत्ता को बनाये रखती है।
-मृदा स्वास्थ्य व पर्यावरण के संतुलन को बनाये रखती है।
फसल उत्पादकता को बढ़ाती है अथवा उस पर कोई प्रतिकूल असर नहीं डालती है।
-जैव विविधता को बढ़ाने में सहायक होती है।
-फसलों के मित्र कीटों को आर्कषक करती है जिससे उनकी संख्या में तेजी से बढ़ोतरी होती है।
-हानिकारक कीटों के प्रकोप से फसल की रक्षा करती है।
-कीटनाशी के अधिक मात्रा में उपयोग को कम करती है।

वास्तव में कीट आर्कषक फसलों को हानिकारक कीटों के लिए एक विकल्प के रूप में उगाया जाता है जिससे मुख्य फसल पर कीटों का आक्रमण कम किया जा सके। कीट आर्कषक फसलों को उनके स्थानिक वितरण एवं स्वाभाविक विशिष्ट लक्षणों के आधार पर वर्गीकृज किया गया है।

विशिष्ट लक्षणों के आधार पर वर्गीकरण : परंपरागत/पारंपरिक फसलें- यह सामान्य प्रयोग में लायी जाने वाली विधि है इस विधि में रक्षक फसलों को मुख्य फसल के आगे लगाया जाता है जिसमे रक्षक फसल मुख्य फसल की अपेक्षा प्राकृतिक रूप से अधिक से अधिक कीटों को भोजन व अण्डे देने के लिये आकर्षक करती है। उदहारण स्वरूप अरंडियां गेंदा को पर्ण सुरंगक (लीफ माइनर) की रोकथाम के लिये मूंगफली के साथ लगाना व रिजका (लूसर्न या अल्फा-अल्फा) को लाइगस बग की रोकथाम के लिये कपास के साथ उगाना।

प्रतिरोधी फसलें- इस प्रकार की रक्षक फसल कीटों को अधिक आकर्षक करने वाली होती है लेकिन इसका परिणाम ज्यादा समय तक अस्तित्व में नहीं रहता। उदहारण स्वरूप सरसों को हीरक पृष्ठ शलभ की रोकथाम के लिये गोभी के साथ उगाना।

अनुवांशिक रूप से परिवर्तित फसल : इस प्रकार की रक्षक फसल अनुवांशिक रूप से परिवर्तित रहती है जो कीटों को आकर्षक करती है। उदहारण स्वरूप अनुवांशिक अभियांत्रिकी विधि से परिवर्तित आलू (बीटी) आलू की फसल में कोलार्डो पोटाटो बीटल की रोकथाम के लिये लगाई जाती है।

स्थानिक वितरण के आधार पर वर्गीकरण

परिमाप फसलें : इस विधि में रक्षक फसलों को मुख्य फसलों के चारों ओर बार्डर के रूप में लगाया जाता है। उदहारण स्वरूप कपास के चारों ओर भिंडी लगाना।

क्रम के अनुसार : इस विधि में रक्षक फसलों को मुख्य फसलों के पहले या बाद में लगाया जाता है। उदहारण स्वरूप सरसों को हीरक पृष्ठ शलभ की रोकथाम के लिये गोभी के खेत में उगाना।

विविध/बहुरूपी फसलें : इस विधि में रक्षक फसलों की विभिन्न प्रजातियों को कीटों को आकर्षक करने के लिये मिश्रित करके या मुख्य फसल के साथ लगाया जाता है। उदहारण स्वरूप मूंगफली में लीफ माइनर की रोकथाम के लिये अरंडी, मिलेट्स व सोयाबीन को मिश्रित करके लगाना।

पुश पुल फसलें : इस विधि में रक्षक फसलों एवं निरोधक फसलों को मिश्रित रूप से मुख्य फसल के साथ लगाया जाता है। जिसमें रक्षक फसल कीटों को आकर्षक करती है व निरोधक फसलें कीटों का ध्यान हटाकर मुख्य फसल से दूर रखती है। उदहारण स्वरूप मिर्च के साथ गेंदा व प्याज को लगाना एवं मक्का/ ज्वार में तनाछेदक की रोकथाम के लिये नेपियर या सुडान घांस को रक्षक फसल के रूप में मक्का के चारों तरफ तथा डेस्मोडियम (पुष्पीय फसल) को मक्के के बीच में कतारों में निरोधक फसल के रूप लगाया जाता है। ये विधि केन्या स्थित कीट विज्ञान की एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान द्वारा विकसित की गई है तथा दुनिया के सभी भागों में अपनाई जा रही है।

कीट आकर्षक या रक्षक फसलों को लगाने के तरीके

-कपास की इल्ली/बॉलवर्म या बेधक की रोकथाम के लिये लोबिया को कपास के प्रत्येक 5 कतारों के बाद 1 कतारों में लगाना।
-चने में इल्ली की रोकथाम के लिये धनिया अथवा गेंदा को चना के प्रत्येक 4 कतारों के बाद 1 कतारों में लगाना।
-कपास की इल्ली/बॉलवर्म या बेधक की रोकथाम के लिये तंबाकू को कपास के प्रत्येक 20 कतारों के बाद 2 कतारों में लगाना।
-टमाटर में फल छेदक की रोकथाम के लिये अफ्रीकन गेंदे को टमाटर के प्रत्येक 14 कतारों के बाद 2 कतारों में लगाना।
-गोभी में हीरक पृष्ठ शलभ (डायमंड बेक मॉथ) की रोकथाम के लिये पीली बोल्ड सरसों को गोभी के प्रत्येक 25 कतारों के बाद 2 कतारों में लगाना।
-बैंगन में तना व फल छेदक की रोकथाम के लिये धनिया अथवा मेथी को बैंगन के प्रत्येक 2 कतारों के बाद 1 कतारों में लगाना।
-अरहर में फली की इल्ली की रोकथाम के लिये गेंदा को अरहर के चारों तरफ बार्डर में लगाना।
-मक्का में तना छेदक की रोकथाम के लिये नेपियर अथवा सुडान घास को मक्का के चारों तरफ बार्डर में लगाना।
-सोयाबीन में तंबाकू की इल्ली की रोकथाम के लिये सूरजमुखी/अरंडी को सोयाबीन के चारों तरफ 1 कतार में लगाना।
-ब्रजेश कुमार नामदेव, संजीव कुमार गर्ग, राहुल माझी


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