Saturday, March 21, 2026
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सुनो सबकी करो अपने मन की

वर्तमान युग में एक कान से सुनो और दूसरे कान से बाहर निकाल दो का चलन है। आरोप लगाकर पलायन करने वाले इसी सिद्धांत पर अमल करते हैं, सुनो सबकी करो अपने मन की। कहीं भी खड़े होकर अपनी भड़ास निकालो और जब सामने वाला उत्तर देने के लिए सामने खड़ा हो जाए, तो दुम दबाकर पलायन कर जाओ। बात गंभीरता से की जाए, तो स्पष्ट है कि चिंतनशील व्यक्ति शब्दों के भाव और मर्यादा को समझता है। शब्दों को ओढ़ता बिछाता है। शब्दों की गरिमा का सम्मान करता है, मगर जिसे शब्दों के भाव ही समझ में न आएं, वह शब्दों का मोल क्या जाने। समाज में अंतमुर्खी, बाह्यमुखी, उभयमुखी जैसे चरित्रों वर्णन तो मिलता है, किंतु इन तीनों मुखी के अलावा किसी ऐसे बहुमुखी की वर्णन नहीं मिलता, जिसके चरित्र को ही परिभाषित नहीं किया जा सकता।

अपने एक मित्र हैं, सबसे विलक्षण, सामाजिक मूल्यों की परिधि से परे। उनके चरित्र चित्रण में बड़े से बड़े मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्र के अध्ययेता भी असफल हैं। उनका मानसिक परीक्षण करने में अनेक प्रश्नावलियां भी अक्षम हैं। झूठ पकड़ने वाली मशीन भी उनके शब्दों पर सटीक निर्णय नहीं ले सकती। मित्र की स्थिति घड़ी में तोला घड़ी में मासा सरीखी रहती है। पता नहीं कब क्रोध आ जाए और अपने ही योग्यता प्रमाण पत्रों को फाड़कर कचरे में फेंकने लगें। कब किस को बुरा कहने लगें, कब किसी शत्रु के घर चाय पीने चले जाएं। कब शत्रु की प्रशंसा करने लगें, अपने अपनों को गाली देने लगें। अनर्गल बातें करने लगें। कब अपने रक्षा कवचों के शौर्य पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने लगें। कब कहने लगें कि शत्रु ने घर के कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया है। कब किस को कायर कहने लगें। कब किसे चोर बताने लगें, कब विक्षिप्तों जैसी बातें करने लगें।

यदि मित्र महोदय से पूछा जाए कि आपके आरोप को किस आधार पर सत्य माना जाए तथा आपके आरोप की सत्यता परखकर दोषियों को दण्डित करने की कार्यवाही की जाए, तो मित्र महोदय चुप्पी साधकर अपने आप को ऐसा सिद्ध करते हैं, जैसे वह भोले हों, नासमझ हों, उन्होंने कोई आरोप ही न लगाया हो। कई बार उनके घर वालों, मित्रों, परिचितों, रिश्तेदारों को उनके आचरण पर हंसी भी आती है, मगर बेचारे बेबस रहते हैं। मित्र को कुछ कहते ही नहीं। ऐसा नहीं है कि मित्र महोदय को उनकी विलक्षण हरकतों पर कोई रोकता टोकता न हो। कभी न्याय का देवता उन्हें फटकार लगाता है, कभी कोई अच्छी सी नसीहत देता है। कोई कहता है कि अब तो बड़े बन जाइये। अपने घर के शौर्य और स्वाभिमान पर ऊंगली मत उठाइये।
पर मित्र हैं कि स्वाभिमान जैसे उनके जीवन मूल्यों की सूची में है ही नहीं। चिकने घड़े की तरह किसी भी प्रकार की सीख उनके मस्तिष्क में टिक ही नहीं पाती। कुछ दिन शांत रहते हैं, तदुपरांत उनके दिमाग में सनसनी फैलाने वाले आरोप लगाने का कीड़ा कुलबुलाता है। फिर आरोप लगाते हैं, बिना किसी प्रमाण के जो मन में आता है, अपनी भड़ास निकालते हैं। फिर फटकार खाते है और चिकने घड़े की परिभाषा में समा जाते हैं।

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